इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर उस पुनर्विचार याचिका (Review Application) को खारिज कर दिया है, जिसमें एक पुलिस कांस्टेबल की कोविड-19 से मृत्यु होने पर उसकी विधवा को 50 लाख रुपये का अनुग्रह मुआवजा देने के पुराने आदेश को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार अपने कर्मचारियों के बीच भेदभाव नहीं कर सकती, विशेषकर तब जब समान परिस्थितियों वाले अन्य व्यक्तियों को पहले ही लाभ दिया जा चुका हो।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला श्रीमती कृष्णा सिंह द्वारा दायर एक रिट याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें उन्होंने अपने पति स्वर्गीय विजय बहादुर सिंह की मृत्यु के एवज में 50 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की थी। स्वर्गीय विजय बहादुर सिंह यूपी पुलिस में हेड कांस्टेबल थे और कोविड-19 प्रोटोकॉल सुनिश्चित करने व सार्वजनिक कर्तव्यों का पालन करने के दौरान कोरोना संक्रमित होने के कारण उनका निधन हो गया था।
2 नवंबर, 2023 को हाईकोर्ट ने श्रीमती चम्पा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (रिट-सी संख्या 32178/2023) के फैसले का हवाला देते हुए इस याचिका का निपटारा किया था। उस फैसले में हाईकोर्ट ने माना था कि जो कर्मचारी कोविड-19 की रोकथाम और सुरक्षा के कर्तव्यों में लगे थे, वे 11 अप्रैल, 2020 के सरकारी आदेश (G.O.) के तहत मुआवजे के हकदार हैं। राज्य सरकार ने इसी आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की थी।
पक्षों के तर्क
राज्य की ओर से पेश अपर महाधिवक्ता (AAG) ने तर्क दिया कि श्रीमती चम्पा देवी के मामले में आए फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। उन्होंने दावा किया कि याचिकाकर्ता का मामला 11 अप्रैल, 2020 के सरकारी आदेश के दायरे में नहीं आता है और सक्षम प्राधिकारी ने उनके दावे को सही तरीके से खारिज किया था। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि यदि इस आदेश पर पुनर्विचार नहीं किया गया, तो सरकारी खजाने पर “भारी वित्तीय बोझ” पड़ेगा।
इसके विपरीत, याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि राज्य सरकार ने श्रीमती चम्पा देवी को पहले ही लाभ दे दिया है और सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने में अत्यधिक देरी की है। उन्होंने कहा कि 11 अप्रैल, 2020 का सरकारी आदेश एक कल्याणकारी कदम था, जिसका उद्देश्य उन कर्मचारियों के परिवारों को राहत देना था जिन्होंने भयानक परिस्थितियों में सेवा की। उन्होंने विभिन्न खंडपीठों के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस कर्मियों और अन्य आवश्यक सेवा प्रदाताओं को इस लाभ से वंचित करने के लिए “कृत्रिम भेदभाव” नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी और जस्टिस प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने नोट किया कि राज्य ने चम्पा देवी मामले के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में “अत्यधिक देरी” के साथ चुनौती दी, लेकिन साथ ही उन्हें वित्तीय लाभ भी प्रदान कर दिया।
हाईकोर्ट ने अदालत के आदेश के महीनों बाद एक समिति की बैठक बुलाकर दावे को खारिज करने की राज्य की कोशिश की कड़ी आलोचना की:
“हमने पाया कि अत्यधिक देरी और खामियों को छिपाने के लिए, आवेदकों/राज्य प्रतिवादियों द्वारा 26.06.2024 को बैठक बुलाकर याचिकाकर्ता के उचित दावे को नकारने और खारिज करने के लिए एक ‘नोबल डिवाइस’ (नया तरीका) तैयार किया गया है… इस तरह के अभ्यास को स्वीकार नहीं किया जा सकता।”
अनुच्छेद 226 के तहत पुनर्विचार क्षेत्राधिकार के दायरे पर हाईकोर्ट ने दोहराया कि यह शक्ति केवल “गंभीर और प्रत्यक्ष त्रुटियों” या “रिकॉर्ड पर स्पष्ट गलतियों” को सुधारने तक सीमित है। मीरा भांजा बनाम निर्मला के. चौधरी मामले का जिक्र करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पुनर्विचार याचिका “छद्म रूप में अपील” (Appeal in disguise) नहीं है और इसका उपयोग योग्यता के आधार पर मामले की दोबारा जांच के लिए नहीं किया जा सकता।
“कोविड ड्यूटी” की व्याख्या के संबंध में हाईकोर्ट ने श्रीमती पुष्पा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में लिए गए दृष्टिकोण का समर्थन किया:
“हम राज्य सरकार द्वारा कोविड ड्यूटी की बहुत संकीर्ण व्याख्या को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, जिसमें केवल उन लोगों को शामिल किया गया है जिन्हें अस्पतालों में शारीरिक रूप से लोगों के इलाज के लिए विशेष रूप से तैनात किया गया था।”
हाईकोर्ट ने माना कि पुलिस जैसे आवश्यक सेवाओं में काम करने वाले कर्मचारी, जिन्होंने महामारी को नियंत्रित करने में मदद की, उन्हें 11 अप्रैल, 2020 के लाभकारी सरकारी आदेश के तहत कोविड ड्यूटी पर माना जाएगा।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मूल रिट याचिका के निपटारे के दौरान मामले के हर पहलू पर विचार किया गया था और फैसले में कोई “स्पष्ट गलती” नहीं है। याचिकाकर्ता के साथ भेदभाव करने का कोई उचित कारण न पाते हुए, हाईकोर्ट ने पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य बनाम श्रीमती कृष्णा सिंह
- केस संख्या: सिविल मिस. रिव्यू एप्लीकेशन संख्या 409 ऑफ 2024
- पीठ: जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी और जस्टिस प्रशांत कुमार
- दिनांक: 30 अप्रैल, 2026

