उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक दिल दहला देने वाले मामले में अपनी 13 वर्षीय नाबालिग बेटी को यौन शोषण के लिए मजबूर करने वाली आरोपी मां को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया है। गुरुवार को न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आरोपों की गंभीरता और पीड़िता पर इसके संभावित मनोवैज्ञानिक असर को देखते हुए आरोपी महिला को राहत नहीं दी जा सकती।
यह विवाद हरिद्वार से शुरू हुआ था, जहां पीड़िता के पिता ने अपनी पत्नी के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी मां ने अपनी ही नाबालिग बेटी को शराब पिलाने के बाद उसे उत्तर भारत के विभिन्न शहरों में ले जाकर सह-आरोपी के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया। जांच में सामने आया है कि शोषण का यह सिलसिला हरिद्वार, आगरा, गाजियाबाद और वृंदावन जैसे शहरों में फैला हुआ था।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया कि पुलिस की कहानी में कई खामियां हैं। उन्होंने दावा किया कि कथित घटना के दौरान पीड़िता एक आवासीय स्कूल (Residential School) में पढ़ रही थी। साथ ही, प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने में हुए पांच महीने के विलंब को भी आधार बनाते हुए महिला की रिहाई की मांग की गई। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि आरोपी जून 2025 से जेल में है, इसलिए उसे जमानत मिलनी चाहिए।
हालांकि, राज्य सरकार ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। सरकारी वकील ने कोर्ट को बताया कि एक मां द्वारा अपने ही बच्चे के साथ किए गए इस विश्वासघात ने समाज और पीड़िता की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है।
न्यायमूर्ति आलोक मेहरा ने बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि स्कूल रिकॉर्ड या एफआईआर में देरी जैसे तथ्यों की गहन जांच ट्रायल कोर्ट का विषय है, इसे जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे जघन्य अपराधों में केवल जेल में बिताए गए समय (Incarceration period) के आधार पर रियायत नहीं दी जा सकती। बेंच ने इस बात पर भी चिंता जताई कि यदि आरोपी को रिहा किया गया, तो वह पारिवारिक संबंधों का फायदा उठाकर गवाहों को प्रभावित कर सकती है या साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ कर सकती है।
फिलहाल आरोपी महिला जेल में ही रहेगी और निचली अदालत में मामले की कार्यवाही जारी रहेगी।

