सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मेडिकल नेग्लिजेंस (चिकित्सीय लापरवाही) के आरोपी डॉक्टर की मृत्यु के बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को उपभोक्ता कार्यवाही में पक्षकार बनाया जा सकता है। अदालत ने कहा कि हालांकि ‘पर्सनल इंजरी’ (व्यक्तिगत क्षति) के दावे मौत के साथ समाप्त हो जाते हैं, लेकिन मृतक की संपत्ति से जुड़े आर्थिक हित या नुकसान के दावे बरकरार रहते हैं और उन्हें कानूनी प्रतिनिधियों के खिलाफ जारी रखा जा सकता है।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) के उन आदेशों को चुनौती देने वाली अपीलों पर यह फैसला सुनाया, जिसमें डॉक्टर की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारियों को कार्यवाही में शामिल करने की अनुमति दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 1997 में डॉ. पी.बी. लाल के खिलाफ दर्ज एक उपभोक्ता शिकायत से शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि फरवरी 1990 में डॉ. लाल द्वारा किए गए “गलत इलाज और ऑपरेशन” के कारण उनकी पत्नी की दाहिनी आंख की रोशनी चली गई। मुंगेर (बिहार) के जिला फोरम ने 2003 में शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए डॉक्टर को सेवा में कमी का दोषी पाया और ₹2,60,000 का मुआवजा देने का आदेश दिया।
हालांकि, 2005 में पटना स्थित राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (SCDRC) ने इस फैसले को पलट दिया। आयोग ने कहा कि आंखों की रोशनी ग्लूकोमा के कारण गई थी और लापरवाही साबित करने के लिए कोई विशेषज्ञ चिकित्सा साक्ष्य पेश नहीं किया गया था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने NCDRC के समक्ष पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) दायर की।
पुनरीक्षण याचिका लंबित रहने के दौरान 4 अगस्त 2009 को डॉ. लाल का निधन हो गया। NCDRC ने उनके कानूनी वारिसों (पत्नी और बेटे) को पक्षकार बनाने की अनुमति दे दी। वारिसों ने इस आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि चूंकि डॉक्टर की मृत्यु के समय उनके खिलाफ कोई प्रभावी डिक्री नहीं थी, इसलिए कार्यवाही समाप्त (abate) हो जानी चाहिए।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ताओं (डॉक्टर के उत्तराधिकारियों) ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 306 का हवाला देते हुए कहा कि “व्यक्तिगत चोट” से संबंधित दावे व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही खत्म हो जाते हैं। उनका तर्क था कि चूंकि मामला चिकित्सीय लापरवाही से जुड़ी व्यक्तिगत क्षति का था, इसलिए उनके खिलाफ कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता के प्रतिनिधियों ने तर्क दिया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश XXII नियम 4 के प्रावधान उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पर भी लागू होते हैं। उन्होंने दलील दी कि चूंकि उत्तराधिकारियों को डॉक्टर की संपत्ति विरासत में मिली है, इसलिए लापरवाही के लिए निर्धारित कोई भी जवाबदेही उस संपत्ति से वसूली योग्य होनी चाहिए।
कोर्ट ने इस मामले में एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) वरिष्ठ अधिवक्ता रघेंथ बसंत की सहायता भी ली, जिन्होंने सुझाव दिया कि “संपत्ति को होने वाला नुकसान” एक अलग श्रेणी का दावा है जो धारा 306 के कड़े प्रावधानों के बावजूद जीवित रहता है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य कानून के सिद्धांत ‘actio personalis moritur cum persona’ (व्यक्तिगत कार्रवाई व्यक्ति के साथ ही समाप्त हो जाती है) और भारतीय कानूनों में संशोधनों का विश्लेषण किया।
बेंच ने कहा कि भारत में इस सिद्धांत को लीगल रिप्रेजेंटेटिव्स सूट्स एक्ट, 1855 और भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 306 जैसे कानूनों के माध्यम से संशोधित किया गया है। कोर्ट ने ‘संपत्ति के अधिकार’ (Proprietary rights) और ‘व्यक्तिगत अधिकार’ (Personal rights) के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया।
कोर्ट ने उल्लेख किया:
“सामान्यतः, वाद चलाने के सभी अधिकार और उत्तरदायित्व भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 306 के तहत कानूनी प्रतिनिधि को हस्तांतरित हो जाते हैं। हालांकि, जब धारा 306 के पहले अपवाद के तहत दावों का फैसला किया जाता है… तो व्यक्तिगत चोट के दावे समाप्त हो जाते हैं, जबकि मृतक की संपत्ति के पक्ष में या उसके खिलाफ दावे जीवित रहते हैं।”
चिकित्सीय लापरवाही के संदर्भ में, अदालत ने NCDRC के एक पुराने फैसले (बलबीर सिंह मकोल केस) को गलत बताते हुए कहा कि उस मामले में कानून की गलत व्याख्या की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘दर्द और पीड़ा’ जैसे व्यक्तिगत दावे भले ही समाप्त हो जाएं, लेकिन संपत्ति को प्रभावित करने वाला कोई भी आर्थिक दावा जारी रहता है।
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चिकित्सीय लापरवाही के आरोपी डॉक्टर की मृत्यु पर उनके कानूनी वारिसों को कार्यवाही में शामिल किया जा सकता है। हालांकि, उनकी जवाबदेही केवल डॉक्टर द्वारा छोड़ी गई संपत्ति (Estate) की सीमा तक ही सीमित होगी।
अदालत ने NCDRC के पुराने आदेशों को रद्द कर दिया और मामले को छह महीने के भीतर नए सिरे से निपटाने के लिए वापस भेज दिया। आयोग को निर्देश दिया गया है कि वह पहले डॉक्टर की लापरवाही स्थापित करे और फिर यह तय करे कि कौन से दावे 1925 के अधिनियम की धारा 306 के तहत संपत्ति के खिलाफ वसूली योग्य हैं।
कोर्ट ने सचेत करते हुए कहा:
“अदालत को केवल उन दावों को देखना चाहिए जो संपत्ति के खिलाफ बनाए रखने योग्य हैं, न कि उन व्यक्तिगत दावों का फैसला करना चाहिए जो डॉक्टर की मृत्यु के साथ समाप्त हो चुके हैं।”
मामले का विवरण:
- मामले का शीर्षक: कुमुद लाल बनाम सुरेश चंद्र रॉय (मृत) कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से और अन्य
- केस संख्या: 2026 की सिविल अपील (2018 की SLP (C) संख्या 33646-33647 से उत्पन्न)
- बेंच: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
- दिनांक: 04 मई, 2026

