सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस अरविन्द कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे, ने यह स्पष्ट किया है कि भले ही किसी सरकारी कर्मचारी या सेवा मांगने वाली संस्था के पास प्रतिनियुक्ति या विदेश यात्रा का कोई पूर्ण अथवा अविभाज्य अधिकार नहीं होता, फिर भी प्रशासनिक अधिकारी संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत ऐसे अनुरोधों पर निष्पक्ष, उचित, गैर-मनमाने और समयबद्ध तरीके से विचार करने के लिए बाध्य हैं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए शीर्ष अदालत ने सरकारी आदेश संख्या 25-जेके(वाईएसएस)/2026 को उस सीमा तक रद्द कर दिया, जिसके तहत अंतरराष्ट्रीय वाटर स्पोर्ट्स कोच बिलकिस मीर को अनुमति देने से इनकार किया गया था। अदालत ने केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन को निर्देश दिया कि वह 15 सितंबर 2026 तक या उससे पहले आवश्यक रिलीविंग ऑर्डर और अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी करे, ताकि वह एशियाई खेल 2026 के लिए भारतीय राष्ट्रीय कयाकिंग और कैनोइंग टीम को कोचिंग दे सकें।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता, इंडियन कयाकिंग एंड कैनोइंग एसोसिएशन—जो कि युवा मामले और खेल मंत्रालय द्वारा 31 दिसंबर 2026 तक मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय खेल महासंघ है—ने बिलकिस मीर (प्रतिवादी संख्या 3) को एशियाई खेल 2026 के तैयारी कार्यक्रम के लिए 15 फरवरी 2026 से 30 सितंबर 2026 की अवधि के लिए भारतीय राष्ट्रीय टीम का कोच चुना था। मीर जम्मू-कश्मीर के युवा सेवा और खेल विभाग में शारीरिक शिक्षा शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं। उन्हें एशियाई खेल नागोया 2026 के लिए कैनो स्प्रिंट स्पर्धा में अंतरराष्ट्रीय तकनीकी अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया था और हंगरी के सेजेड में 8 से 10 मई 2026 तक आयोजित 2026 आईसीएफ कैनो स्प्रिंट वर्ल्ड कप के लिए चीफ फिनिश लाइन जज के रूप में भी चुना गया था।
एसोसिएशन ने 3 फरवरी 2026 को जम्मू-कश्मीर प्रशासन से राष्ट्रीय कोचिंग कैंप के लिए उनकी सेवाएं उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था। इसके बाद 1 मार्च और 2 अप्रैल 2026 को रिमाइंडर भी भेजे गए। जब प्रशासन की ओर से कोई निर्णय नहीं लिया गया, तो एसोसिएशन ने 30 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और परमादेश (रिट ऑफ मैंडमस) की मांग की।
हाईकोर्ट के एकल जज ने 6 मई 2026 को एक अंतरिम आदेश पारित कर मीर को अपने जोखिम और खर्च पर राष्ट्रीय टीम के कोच के रूप में कार्य करने और हंगरी यात्रा करने की अनंतिम अनुमति देने का निर्देश दिया। हालांकि, इस आदेश का अनुपालन नहीं हुआ और मीर हंगरी विश्व कप में भाग लेने से वंचित रह गईं। इसके बाद 19 जून 2026 को जम्मू-कश्मीर सरकार ने एक आदेश जारी कर लंबित विभागीय जांच, सतर्कता अनापत्ति के दस्तावेजों की कमी, पूर्व विदेश यात्राओं और बी.पी.एड. योग्यता से जुड़े मुद्दों का हवाला देते हुए अनुमति के अनुरोध को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 11 अगस्त 2026 को एसोसिएशन की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि प्रतिनियुक्ति पूरी तरह प्रशासनिक विवेक का मामला है, इसका कोई कानूनी अधिकार नहीं बनता और बाद में आदेश जारी होने से देरी की शिकायत का महत्व समाप्त हो गया। हालांकि, हाईकोर्ट ने खेल मंत्रालय को उत्कृष्ट खिलाड़ियों की सेवाओं के उपयोग हेतु एक नीति बनाने का निर्देश दिया था। इस फैसले के खिलाफ एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता एसोसिएशन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील नजमी वजीरी ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने मामले को गलत दिशा में समझा और यह मान लिया कि एसोसिएशन कर्मचारी की सेवाओं पर पूर्ण अधिकार का दावा कर रही थी। उन्होंने कहा कि मुख्य शिकायत समयबद्ध मामले में कार्यपालिका की लंबी निष्क्रियता को लेकर थी, जिससे राष्ट्रीय टीम की तैयारी पर सीधा असर पड़ा। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि 19 जून 2026 का अस्वीकृति आदेश पिछली निष्क्रियता को समाप्त नहीं कर सकता, विशेषकर तब जब हंगरी की प्रतियोगिता पहले ही समाप्त हो चुकी थी, और न ही कार्यपालिका अदालत के 6 मई 2026 के प्रभावी अंतरिम आदेश की अनदेखी कर सकती थी।
वहीं, जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश की ओर से पेश वकील पार्थ अवस्थी ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि मीर एक सरकारी कर्मचारी हैं जो सेवा और आचरण नियमों से बंधी हैं और विदेश यात्रा या प्रतिनियुक्ति उनका कोई निहित अधिकार नहीं है। उन्होंने दलील दी कि विभागीय जांच लंबित थी और सतर्कता मंजूरी के लिए निर्धारित माध्यम से जरूरी दस्तावेज जमा नहीं किए गए थे।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने इस सीमित बिंदु से सहमति जताई कि किसी कर्मचारी या संबंधित खेल संगठन के पास प्रतिनियुक्ति या विदेश यात्रा की अनुमति पाने का कोई पूर्ण या अंतिम अधिकार नहीं होता, और नियोक्ता सेवा की अनिवार्यताओं व अनुशासनात्मक मामलों को ध्यान में रख सकता है। इसके बावजूद, पीठ ने प्रशासनिक शक्तियों और जिम्मेदारियों के संबंध में एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर रेखांकित किया:
“अनुकूल प्रशासनिक निर्णय पाने का पूर्ण अधिकार न होने को किसी अनुरोध पर निष्पक्ष, उचित, गैर-मनमाने और समयबद्ध तरीके से विचार किए जाने के अधिकार का अभाव नहीं माना जा सकता; हमारी सुविचारित राय में ये दोनों पूरी तरह अलग बातें हैं। यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि केवल इसलिए कि अंतिम राहत कार्यपालिका के विवेक के अधीन है, प्रशासनिक विवेक न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं हो जाता। संविधान का अनुच्छेद 14 वैधानिक निर्णयों की तरह ही प्रशासनिक विवेक के प्रयोग पर भी समान रूप से लागू होता है। जहां किसी प्राधिकरण के पास विवेकाधीन अधिकार हैं, वहां उसे प्रासंगिक तथ्यों पर विचार करना चाहिए, अप्रासंगिक बातों को बाहर रखना चाहिए, उस उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए जिसके लिए अनुरोध किया गया है और उचित समय सीमा के भीतर काम करना चाहिए।”
हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष पर कि बाद में आए सरकारी आदेश ने पहले की देरी को निष्प्रभावी कर दिया, पीठ ने कड़ी टिप्पणी की:
“समयबद्ध मामलों में देरी स्वयं उस उद्देश्य को विफल कर सकती है जिसके लिए प्रशासनिक शक्ति का उपयोग आवश्यक होता है। प्रासंगिक अवसर पूरी तरह बीत जाने के बाद लिया गया निर्णय पहले की विफलता या निष्क्रियता को दुरुस्त नहीं कर सकता, और वर्तमान मामला इसका स्पष्ट उदाहरण है।”
न्यायालय ने न्यायिक आदेशों की बाध्यता पर बल देते हुए कहा कि 6 मई 2026 को हाईकोर्ट का एक अंतरिम आदेश पहले से लागू था:
“किसी संवैधानिक न्यायालय का आदेश, जब तक प्रभावी रहता है, मामले के सभी पक्षों पर बाध्यकारी होता है। यदि सरकारी अधिकारियों को लगता था कि इसका पालन असंभव है या सेवा नियमों के विरुद्ध है, तो उनके पास सक्षम अदालत के समक्ष स्पष्टीकरण, संशोधन या रोक की मांग करने का विकल्प था। कोई प्रशासनिक अधिकारी किसी न्यायिक निर्देश के प्रभावी रहने के दौरान केवल उसके विपरीत प्रशासनिक निर्णय लेकर उस अदालती निर्देश को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।”
पीठ ने यह भी पाया कि 19 जून 2026 का सरकारी आदेश एसोसिएशन के घरेलू कोचिंग कैंप के अनुरोध पर स्वतंत्र रूप से विचार करने में विफल रहा और पूरे मामले को केवल सामान्य विदेश यात्रा की अनुमति के तौर पर देखा गया। इसके अलावा, अदालत ने लंबित जांच को सीधे तौर पर अयोग्यता मानने के दृष्टिकोण को अनुचित ठहराया और कहा कि जांच एक प्रासंगिक तथ्य हो सकती है, लेकिन वैधानिक नियम के अभाव में इसे स्वतः पूर्ण अयोग्यता में नहीं बदला जा सकता।
हाईकोर्ट द्वारा मीर की मूल नियुक्ति और शैक्षणिक योग्यता पर की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह हटा दिया और कहा कि जो विषय अदालत के समक्ष मुख्य विवाद का हिस्सा नहीं थे, उन पर की गई टिप्पणियों से स्वतंत्र विभागीय कार्यवाहियों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
खेल आयोजनों की समयबद्धता को रेखांकित करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“हमारी राय में, खेल प्रशासन अनिवार्य रूप से सख्त समय-सीमा से जुड़ा होता है। चयन, प्रशिक्षण शिविर, क्वालिफाइंग स्पर्धाएं और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार चलती हैं, जिन्हें सामान्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं के पूरा होने तक टाला नहीं जा सकता। यह व्यवस्था अपने कर्मचारियों पर नियोक्ता के अधिकार को कम नहीं करती, बल्कि केवल यह अपेक्षा करती है कि ऐसे अधिकार का उपयोग मामले की संवेदनशीलता के अनुरूप शीघ्रता के साथ किया जाए।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के 11 अगस्त 2026 के आदेश को उस सीमा तक रद्द कर दिया, जहां तक उसने राहत देने से इनकार किया था। साथ ही 19 जून 2026 के उस सरकारी आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसके जरिए अनापत्ति और कार्यमुक्ति की अनुमति रोकी गई थी।
पीठ ने संबंधित सरकारी अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे बिलकिस मीर के पक्ष में आवश्यक रिलीविंग ऑर्डर, अनापत्ति प्रमाण पत्र और अनुमति तुरंत और हर हाल में 15 सितंबर 2026 तक जारी करें, ताकि वह भारतीय राष्ट्रीय टीम के कोच के रूप में अपनी भूमिका निभा सकें और एशियाई खेल 2026 में टीम के साथ जा सकें। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस अवधि के दौरान उनकी अनुपस्थिति को अनधिकृत नहीं माना जाएगा, बशर्ते वह खेल आयोजन पूरा होते ही अपने मूल विभाग में तुरंत रिपोर्ट करें।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश किसी भी सरकारी कर्मचारी को प्रतिनियुक्ति का कोई सामान्य अधिकार नहीं देता, न ही यह मीर के खिलाफ कानून के अनुसार चल रही किसी स्वतंत्र विभागीय कार्यवाही में हस्तक्षेप करता है। इसके अलावा, उत्कृष्ट खिलाड़ियों की सेवाओं के संबंध में एक प्रवर्तनीय नीति तैयार करने का जो निर्देश हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को दिया था, उसे सुप्रीम कोर्ट ने यथावत रखा है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: इंडियन कयाकिंग एंड कैनोइंग एसोसिएशन बनाम केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 [विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 28855/2026 से उद्भूत]
पीठ: जस्टिस अरविन्द कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
निर्णय की तिथि: 10 सितंबर 2026

