वास्तविक मालिक के हक को चुनौती दिए बिना सिर्फ लंबे कब्जे से प्रतिकूल कब्जा साबित नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट

जमीन के राजस्व रिकॉर्ड, प्रतिकूल कब्जे (एडवर्स पजेशन) और धार्मिक समर्पण (डेडिकेशन) से जुड़े विधिक सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल लंबे और निर्बाध भौतिक कब्जे से कोई संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता, जब तक कि वास्तविक मालिक के स्वामित्व के खिलाफ खुलकर और स्पष्ट रूप से शत्रुतापूर्ण दावा (होस्टाइल असर्शन) न किया गया हो। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने एक स्थानीय डेरे द्वारा धर्म-अर्थ और प्रतिकूल कब्जे के दावों को खारिज करते हुए, रजिस्टर्ड सेल डीड के आधार पर जमीन खरीदने वाले वादियों के पक्ष में फैसला सुनाने वाले हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह विवाद पंजाब के मुक्तसर में स्थित 4 कनाल 18 मरला कृषि भूमि से जुड़ा है, जिसकी शुरुआत 1981 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन/सबऑर्डिनेट जज फर्स्ट क्लास), मुक्तसर की अदालत में दायर सिविल वाद संख्या 183-ए से हुई थी। मूल वादियों ने 13 मई 1965 को निष्पादित एक रजिस्टर्ड सेल डीड के आधार पर मालिकाना हक और स्थायी निषेधाज्ञा (परमानेंट इंजंक्शन) की मांग की थी। यह सेल डीड विक्रेता गज्जन सिंह और बग्गू सिंह द्वारा उनके पूर्वजों के पक्ष में की गई थी। वादियों का कहना था कि सेल डीड के समय ही उन्हें कब्जा सौंप दिया गया था। हालांकि, राजस्व रिकॉर्ड के कब्जा कॉलम में अत्तर सिंह चेला भाई गुलाब सिंह का नाम ही दर्ज रहा, जबकि उनकी मृत्यु मुकदमा दायर होने से लगभग बीस वर्ष पूर्व ही हो चुकी थी।

डेरा भाई मस्तान सिंह का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिवादियों ने मुकदमे का विरोध किया। उनका दावा था कि यह जमीन 1965 की सेल डीड से बहुत पहले ही निजी संपत्ति नहीं रह गई थी, क्योंकि इसे डेरे के पक्ष में धार्मिक और धर्मार्थ कार्यों (धर्म-अर्थ) के लिए स्थायी रूप से समर्पित कर दिया गया था। उन्होंने राजस्व रिकॉर्ड का हवाला दिया, जिसमें अत्तर सिंह का कब्जा “गैर मौरूसी बिला लगान बवजह धर्म अर्थ” (धार्मिक उद्देश्य के कारण बिना लगान दिए गैर-मौरूसी काश्तकार) के रूप में दर्ज था। प्रतिवादियों का तर्क था कि अत्तर सिंह के निधन के बाद डेरे के उत्तराधिकारी महंतों—किशन सिंह, संता सिंह और उसके बाद भाग सिंह—ने चार दशकों से अधिक समय तक इस जमीन पर निरंतर खेती और कब्जा बनाए रखा, जिससे उन्होंने प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक प्राप्त कर लिया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि विक्रेताओं के पास केवल आधा हिस्सा था (शेष आधा प्रीतम सिंह का था), इसलिए वे पूरी संपत्ति बेचने के हकदार नहीं थे।

जनवरी 1983 में ट्रायल कोर्ट ने 1945-46 की जमाबंदी पर भरोसा करते हुए वादियों का मुकदमा खारिज कर दिया और माना कि जमीन डेरे को समर्पित थी तथा उत्तराधिकारी महंतों के माध्यम से कब्जा जारी रहा। जनवरी 1985 में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, फरीदकोट (प्रथम अपीलीय अदालत) ने भी इस फैसले की पुष्टि करते हुए कहा कि कब्जा सौंपते ही समर्पण पूरा हो गया था और इसके लिए अलग से रजिस्टर्ड दस्तावेज की आवश्यकता नहीं थी।

मार्च 2011 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 100 के तहत नियमित दूसरी अपील में इन दोनों अदालतों के फैसलों को पलट दिया। हाईकोर्ट ने माना कि केवल राजस्व प्रविष्टियां पूर्ण समर्पण या प्रतिकूल कब्जा साबित नहीं करतीं, विशेष रूप से तब जब बाद के महंतों के नाम कोई म्यूटेशन या वास्तविक कब्जा साबित न हुआ हो। हाईकोर्ट ने वादियों के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसके खिलाफ प्रतिवादियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने सीपीसी की धारा 100 के तहत क्षेत्राधिकार का गलत इस्तेमाल करते हुए तथ्यों के समवर्ती निष्कर्षों को पलटा है। उन्होंने दलील दी कि 1945-46 से चले आ रहे राजस्व रिकॉर्ड यह साबित करते हैं कि जमीन डेरे को समर्पित थी, या वैकल्पिक रूप से, कई दशकों के खुले और निर्बाध कब्जे के कारण डेरे ने प्रतिकूल कब्जे से मालिकाना हक हासिल कर लिया था। उन्होंने यह भी कहा कि विक्रेता केवल आधे हिस्से के मालिक थे, इसलिए 1965 की सेल डीड से पूरी संपत्ति का मालिकाना हक नहीं दिया जा सकता था।

वहीं, प्रतिवादी-वादियों के वकील ने दलील दी कि राजस्व रिकॉर्ड मुख्य रूप से वित्तीय (मालगुजारी) उद्देश्यों के लिए तैयार किए जाते हैं और वे मालिकाना हक का पुख्ता सबूत नहीं हो सकते, न ही वे वास्तविक मालिक के हक को खत्म कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि अपीलकर्ता यह साबित करने या अपनी दलीलों में दिखाने में पूरी तरह विफल रहे कि उनका अनुमेय (परमिसिव) कब्जा कब और किस समय वास्तविक मालिकों के खिलाफ शत्रुतापूर्ण कब्जे में बदल गया। उन्होंने यह भी कहा कि निचली अदालतों ने कानूनी सिद्धांतों को लागू करने में गंभीर भूल की थी, इसलिए हाईकोर्ट का हस्तक्षेप पूरी तरह उचित था।

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अदालत का विश्लेषण और विधिक निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने कब्जे के प्रमाण और मालिकाना हक के प्रमाण के बीच मूलभूत अंतर को रेखांकित करते हुए टिप्पणी की:

“इस अदालत का यह सुसंगत मत रहा है कि राजस्व रिकॉर्ड में प्रविष्टियां मुख्य रूप से वित्तीय उद्देश्यों के लिए रखी जाती हैं और वे कब्जे के साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य हैं, लेकिन वे अचल संपत्ति पर मालिकाना हक प्रदान नहीं करती हैं। स्वामित्व का निर्धारण अनिवार्य रूप से उस मूल साक्ष्य के आधार पर किया जाना चाहिए जो स्वामित्व के स्रोत को स्थापित करता हो।”

सूरज भान बनाम फाइनेंशियल कमिश्नर और वादियाला प्रभाकर राव बनाम आंध्र प्रदेश सरकार के मामलों का संदर्भ देते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में “गैर मौरूसी बिला लगान बवजह धर्म अर्थ” की प्रविष्टि होना मात्र यह साबित नहीं करता कि संपत्ति का स्वामित्व हमेशा के लिए समाप्त हो गया था। धार्मिक समर्पण का दावा करने वाले पक्ष पर यह साबित करने का भार होता है कि संपत्ति के मालिक की मंशा अपने स्वामित्व को स्थायी रूप से समाप्त करने की थी।

पीठ ने अपीलकर्ताओं के तर्कों में अंतर्विरोध को भी रेखांकित किया, जिसमें उन्होंने एक साथ समर्पण और प्रतिकूल कब्जे दोनों के आधार पर मालिकाना हक का दावा किया था। अदालत ने समझाया कि यदि कोई संपत्ति समर्पण के जरिए पहले ही डेरे में निहित हो चुकी थी, तो प्रतिकूल कब्जे का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि प्रतिकूल कब्जा इस पूर्वधारणा पर आधारित होता है कि मालिकाना हक पहले किसी अन्य व्यक्ति का था जिसे बाद में शत्रुतापूर्ण कब्जे के जरिए समाप्त किया गया।

टी. अंजनप्पा बनाम सोमलिंगप्पा और केरल सरकार बनाम जोसेफ के मामलों में स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:

“प्रतिकूल कब्जे का सिद्धांत केवल कब्जे की लंबी अवधि को मान्यता नहीं देता। यह केवल उसी कब्जे को संरक्षण प्रदान करता है जिसके साथ वास्तविक मालिक के अधिकारों को नकारते हुए स्वामित्व का एक सचेत और शत्रुतापूर्ण दावा जुड़ा हो। जब तक शत्रुतापूर्ण इरादे का यह तत्व ठोस रूप से स्थापित नहीं होता, तब तक ऐसा दावा अनिवार्य रूप से खारिज होने योग्य है।”

पीठ ने पाया कि चूंकि अपीलकर्ताओं ने अपने कब्जे का आधार धार्मिक समर्पण को बताया था, इसलिए उनके कब्जे की शुरुआत कभी भी शत्रुतापूर्ण नहीं थी। इसके अतिरिक्त, अपीलकर्ताओं ने किसी विशिष्ट तारीख, घटना या ऐसे प्रत्यक्ष कार्य का उल्लेख नहीं किया जिससे यह साबित हो सके कि उनका कब्जा वास्तविक मालिकों की जानकारी में कब प्रतिकूल हुआ।

विक्रेताओं के पास केवल आधा हिस्सा होने की अपीलकर्ताओं की दलील पर, अदालत ने रामचंद्र सखाराम महाजन बनाम दामोदर त्रिंबक तानसाले और धर्मपाल बनाम पंजाब वक्फ बोर्ड के निर्णयों का उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाद में प्रत्येक पक्ष को अपने स्वयं के मालिकाना हक की ताकत के बल पर सफल होना होता है, न कि दूसरे पक्ष की कमजोरियों के आधार पर। भले ही विक्रेता अपने हिस्से से अधिक जमीन नहीं बेच सकते थे, लेकिन सेल डीड की इस तकनीकी कमी मात्र से डेरे को मालिकाना हक नहीं मिल जाता, क्योंकि डेरा अपना स्वतंत्र स्वामित्व साबित करने में विफल रहा।

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अंत में, कोंडीबा दगडू कदम बनाम सावित्रीबाई सोपान गुजर और ए. शाहुल हमीद बनाम एन. मल्लिगार्जुन के फैसलों के आधार पर अदालत ने कहा कि निचली अदालतों ने स्थापित कानूनी सिद्धांतों को लागू करने में गंभीर विधिक त्रुटि की थी, इसलिए हाईकोर्ट द्वारा सीपीसी की धारा 100 के तहत हस्तक्षेप करना पूरी तरह न्यायोचित था।

निर्णय

हाईकोर्ट के फैसले और डिक्री की पुष्टि करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और माना कि अपीलकर्ता न तो वैध धार्मिक समर्पण साबित कर सके और न ही प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: भाग सिंह (मृतक) द्वारा कानूनी प्रतिनिधि महंत कश्मीर सिंह बनाम बसंत कौर (मृतक) द्वारा कानूनी प्रतिनिधि एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 1718 / 2016
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर
निर्णय की तिथि: 10 सितंबर 2026

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