51 लाख रुपये के ड्रग्स मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने खारिज की जमानत याचिका, कहा- सुनवाई में अपनी देरी का फायदा नहीं उठा सकते आरोपी

गुजरात हाईकोर्ट ने 51.22 लाख रुपये कीमत की मेफेड्रोन तस्करी के एक मामले में मुख्य आरोपी की चौथी जमानत याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे हर आरोपी के लिए मुकदमे में होने वाली देरी कोई रामबाण इलाज नहीं हो सकती, खासकर तब जब खुद बचाव पक्ष ने कार्यवाही टालने में भूमिका निभाई हो।

2 सितंबर को दिए अपने आदेश में जस्टिस हंसमुख डी. सुथार ने सूरत की ट्रायल कोर्ट को यह निर्देश भी दिया कि मामले की सुनवाई 10 सप्ताह के भीतर पूरी की जाए। इसके लिए कोर्ट ने दोनों पक्षों को सहयोग करने और जरूरत पड़ने पर आरोपियों की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी सुनिश्चित करने की छूट दी है।

देरी के लिए खुद आरोपी जिम्मेदार

सूरत में दर्ज एनडीपीएस एक्ट के तहत मार्च 2024 से जेल में बंद बदरुद्दीन बांगड़ीवाला ने अपनी चौथी जमानत अर्जी में यह तर्क दिया था कि वह दो साल से अधिक समय से हिरासत में है और मुकदमे की कार्यवाही में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। आरोपी के वकीलों जुबिन भारदा और किशन दैया ने यह भी दलील दी कि तलाशी के दौरान बांगड़ीवाला के निजी पास से कोई मादक पदार्थ बरामद नहीं हुआ था।

हालांकि, सूरत के 11वें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की रिपोर्ट पर गौर करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि सुनवाई में देरी की मुख्य वजह खुद आरोपी रहे हैं। कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, बांगड़ीवाला ने गिरफ्तारी के नौ महीने बाद 3 दिसंबर 2024 को अपना वकील तय किया, जबकि एक अन्य सह-आरोपी ने 30 जनवरी 2025 को वकील नियुक्त किया। इसके बाद आरोपियों ने फरवरी से मई 2025 के बीच अलग-अलग तारीखों पर डिस्चार्ज अर्जी दाखिल कर मामले को और लंबा खींच दिया।

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कोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी को भी न्यायिक व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने या अपनी ही गलती का लाभ उठाने का कोई अधिकार नहीं है।

वाहन मालिक होने के नाते माना गया ‘सचेत कब्जा’

राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त लोक अभियोजक वृंदा शाह ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि परिस्थितियों में बिना किसी बदलाव के यह चौथी बार जमानत मांगी गई है। अभियोजन पक्ष ने बताया कि बांगड़ीवाला अपनी निजी कार से मध्य प्रदेश से नशीला पदार्थ ला रहा था और वह सप्लायर व माल मंगाने वाले दोनों फरार आरोपियों के सीधे संपर्क में था।

बचाव पक्ष की दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने माना कि बांगड़ीवाला एनडीपीएस कानून के तहत बरामद नशीले पदार्थ के ‘सचेत कब्जे’ (कॉन्शियस पजेशन) में था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह सह-आरोपियों के साथ यात्रा कर रहा था, गाड़ी उसी की थी, वह खुद गाड़ी चला रहा था और ड्रग्स की खेप लेने मध्य प्रदेश गया था।

वाणिज्यिक मात्रा और धारा 37 के कड़े प्रावधान

हाईकोर्ट ने कहा कि मामला वाणिज्यिक मात्रा से जुड़ा है, जिस पर एनडीपीएस कानून की धारा 37 के सख्त नियम लागू होते हैं। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया कि अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई का अधिकार धारा 37 की अनिवार्य शर्तों को दरकिनार नहीं कर सकता। कोर्ट ने दोहराया कि जब अपराध वाणिज्यिक मात्रा का हो, तो जमानत खारिज करना एक नियम है और राहत देना एक अपवाद।

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इसके अलावा कोर्ट ने सह-आरोपी (आरोपी नंबर 5) को मिली जमानत के आधार पर समानता (पैरिटी) की मांग भी ठुकरा दी। कोर्ट ने पाया कि संबंधित बेंच ने उस आदेश में धारा 37 की कानूनी शर्तों की पूर्ति दर्ज नहीं की थी, जबकि इस पूरे प्रकरण में बांगड़ीवाला की भूमिका कहीं अधिक गंभीर है।

भाटिया चेक पोस्ट पर हुई थी जब्ती

अभियोजन पक्ष के अनुसार, एक गुप्त सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने भाटिया चेक पोस्ट के पास पंच गवाहों की मौजूदगी में एक सिल्वर रंग की वरना कार को रोका था। मध्य प्रदेश से आ रही इस गाड़ी में बांगड़ीवाला सहित तीन लोग सवार थे। तलाशी के दौरान दो आरोपियों के पास से 512.2 ग्राम मेफेड्रोन बरामद की गई, जिसकी कुल कीमत 51.22 लाख रुपये आंकी गई।

एफआईआर में बांगड़ीवाला को आरोपी नंबर 1 बनाया गया है, जबकि कथित सप्लायर इलियास उर्फ इलू अब्दुल हनीफ उर्फ अन्नूभाई अब्दुल हामिद शाह (आरोपी नंबर 4) अभी भी फरार चल रहा है।

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