आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि रूढ़िवादी परंपराओं या धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन न करना वैवाहिक क्रूरता के दायरे में नहीं आता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आस्था से जुड़े अलग विचार किसी भी वैवाहिक संबंध को खत्म करने का कानूनी आधार नहीं बन सकते।
जस्टिस बट्टू देवानंद और जस्टिस सुनीता गंधम की खंडपीठ ने 20 अगस्त के अपने फैसले में एक व्यक्ति की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की मांग की थी। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को तलाक देने से इनकार करने वाले फैमिली कोर्ट के साल 2006 के आदेश को बरकरार रखा।
कानूनी क्रूरता का दायरा और शर्तें
पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कानूनी तौर पर क्रूरता का अर्थ ऐसा गंभीर आचरण है, जिसके चलते किसी भी जीवनसाथी के लिए वैवाहिक रिश्ते में बने रहना संभव न हो। कोर्ट के अनुसार, किसी धार्मिक अनुष्ठान या प्रथा में भाग न लेना जीवनसाथी को प्रताड़ित करने या नुकसान पहुँचाने का जानबूझकर किया गया कृत्य नहीं माना जा सकता।
जजों ने उल्लेख किया कि यदि किसी प्रथा को अस्वीकार करने का व्यवहार सार्वजनिक अपमान, लगातार अपमानजनक व्यवहार या दुर्भावनापूर्ण आचरण में बदल जाता है, तब कोर्ट समग्र आचरण का मूल्यांकन कर सकता है। हालांकि, मौजूदा मामले में ऐसा कोई साक्ष्य सामने नहीं आया। अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता पति के दावे स्वार्थ से प्रेरित थे, जिनमें विश्वसनीयता का अभाव था और वे वास्तविकता से दूर प्रतीत होते थे।
विवाद की पृष्ठभूमि और आरोप
इस मामले की शुरुआत साल 1999 में हिंदू रीति-रिवाज से संपन्न हुए विवाह से हुई थी। शादी के कुछ समय बाद ही पति ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक की अर्जी दाखिल कर दी।
पति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी उसके परिवार की रूढ़िवादी परंपराओं का पालन नहीं करती और उसकी बुजुर्ग माँ की देखभाल में भी कोताही बरतती है। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी का व्यवहार असभ्य, झगड़ालू और अपमानजनक था। याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से यह आरोप लगाया कि पत्नी ने परिवार की प्रथा के अनुसार ‘मदी’ की रस्म निभाने के लिए गीली साड़ी पहनने से मना कर दिया था। इसके अलावा, उस पर वर्ष 2000 में स्थायी रूप से घर छोड़ने से पहले भी कई बार ससुराल छोड़कर चले जाने का आरोप था।
दूसरी ओर, पत्नी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वह स्वयं एक पारंपरिक परिवार से आती हैं, रीति-रिवाजों से भलीभाँति परिचित हैं और उनका पालन भी करती रही हैं। उन्होंने बताया कि पारिवारिक विवादों के लिए वास्तव में उनके जेठ और जेठानी जिम्मेदार थे।
लंबा अलगाव और सुप्रीम कोर्ट का नज़ीर
अदालत ने दर्ज किया कि अलग रह रहे दोनों पति-पत्नी अब क्रमशः 76 वर्ष और 66 वर्ष के हो चुके हैं और वे वर्ष 2000 से ही एक-दूसरे से अलग रह रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का संदर्भ देते हुए खंडपीठ ने दोहराया कि वैवाहिक जीवन को समग्रता में देखा जाना चाहिए। कई वर्षों की अवधि के दौरान घटी इक्का-दुक्का घटनाओं को कानूनी आधार पर क्रूरता करार नहीं दिया जा सकता। हाईकोर्ट ने माना कि केवल ‘मदी’ अनुष्ठान से इनकार करने को किसी भी सूरत में क्रूरता नहीं माना जा सकता। तथ्यों के विश्लेषण के बाद कोर्ट ने अपील को सारहीन पाते हुए खारिज कर दिया।

