इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्रकार सत्यम वर्मा की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका/एनएसए) के तहत हिरासत को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और नोएडा के जिलाधिकारी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने मामले में प्रतिवादियों से जवाब तलब करते हुए अगली सुनवाई 7 अक्टूबर के लिए तय की है। अपनी याचिका में सत्यम वर्मा ने हिरासत आदेश और उससे जुड़े सभी निर्देशों को रद्द करने, तत्काल रिहाई और कथित अवैध हिरासत के एवज में मुआवजे की मांग की है।
गौरतलब है कि प्रशासन ने इस वर्ष अप्रैल में नोएडा में श्रमिकों के आंदोलन के दौरान हुई हिंसा में कथित संलिप्तता का आरोप लगाते हुए वर्मा के खिलाफ रासुका, 1980 के तहत निरोधात्मक कार्रवाई की थी।
घटनास्थल से 500 किमी दूर होने और साक्ष्य छिपाने का दावा
सत्यम वर्मा की याचिका में सबसे प्रमुख आधार यह बनाया गया है कि उनके खिलाफ जारी हिरासत आदेश तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह असंभव आधार पर टिका है। याचिका के अनुसार, 13 अप्रैल को जब नोएडा में हिंसा हुई, तब वर्मा घटनास्थल से करीब 500 किलोमीटर दूर लखनऊ में मौजूद थे।
कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) और सीसीटीवी फुटेज के हवाले से याचिका में कहा गया है कि घटना वाले दिन दोपहर 2:14 बजे लखनऊ के हसनगंज थाने की पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया था। इसे अकाट्य साक्ष्य बताते हुए दलील दी गई है कि ऐसे भौतिक रूप से असंभव और पूरी तरह असत्य आधार पर जारी किया गया निरोधात्मक आदेश रद्द किए जाने योग्य है।
याचिका में जांच अधिकारी पर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। आरोप है कि जांच अधिकारी ने जानबूझकर हसनगंज थाने के सीसीटीवी फुटेज और सीडीआर को हिरासत प्राधिकारी के सामने पेश नहीं किया और इसे छिपाए रखा। याचिकाकर्ता ने यह तथ्य भी अदालत के समक्ष रखा कि राज्य सरकार ने जिस घटना को आधार बनाकर यह कार्रवाई की है, उससे जुड़ी 11 एफआईआर में से किसी में भी सत्यम वर्मा का नाम शामिल नहीं है।
हिरासत में दर्ज बयान, कमाई पर सवाल और समानता के आधार पर राहत की मांग
याचिका में हिरासत आदेश के कानूनी आधारों को भी चुनौती दी गई है। याचिका के अनुसार, प्रशासन का पूरा आदेश सह-आरोपी व गवाह मंगल द्वारा पुलिस हिरासत में दिए गए बयानों पर निर्भर करता है। कानून के मुताबिक पुलिस कस्टडी में दिए गए ऐसे बयान साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं हैं और इनके आधार पर निरोधात्मक कार्रवाई के लिए जरूरी वैधानिक संतुष्टि हासिल नहीं की जा सकती।
इसके साथ ही, राज्य द्वारा वर्मा की पेशेवर आय को “दंगा फंडिंग” बताए जाने का भी कड़ा विरोध किया गया है। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि वर्मा की आमदनी पिछले करीब 20 वर्षों के उनके पेशेवर कार्य से जुड़ी वैध आय है, जो औपचारिक बैंकिंग माध्यमों से प्राप्त हुई है और नियमित आयकर रिटर्न (आईटीआर) में दर्ज है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि श्रमिकों की स्वाभाविक और वैध मांगों को कुचलने के लिए रासुका का सहारा लिया गया।
वर्मा ने समानता (पैरिटी) के सिद्धांत पर भी राहत की गुहार लगाई है। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस पूर्व आदेश का हवाला दिया, जिसमें अदालत ने इसी आंदोलन से जुड़ी सह-हिरासत में ली गईं आकृति चौधरी के खिलाफ जारी रासुका आदेश को रद्द कर दिया था। वह आदेश भी उसी तारीख को, उसी प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क है कि उनका मामला कानूनी रूप से और भी मजबूत स्थिति में है, इसलिए उनके खिलाफ जारी हिरासत आदेश को भी तत्काल निरस्त किया जाना चाहिए।

