मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के पशु चिकित्सा सहायक शल्यज्ञों (वेटेरिनरी डॉक्टरों) को इंसानी स्वास्थ्य सेवा में कार्यरत मेडिकल अफसरों और डेंटल सर्जनों के समान समयमान वेतनमान (क्रमोन्नति) देने के फैसले पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है। राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब दोनों संवर्गों का मूल वेतन और कार्य की मूल प्रकृति समान है, तो केवल इलाज कराने वाले वर्ग के अलग होने के आधार पर करियर की प्रगति में कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।
जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी. पी. शर्मा की खंडपीठ ने सिंगल बेंच के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पशुपालन एवं डेयरी विभाग को वेटेरिनरी डॉक्टरों को भी दंत चिकित्सकों के समकक्ष उच्च समयमान वेतनमान का लाभ देने का निर्देश दिया गया था।
सेवा शर्तों और समयसीमा के अंतर पर छिड़ा था विवाद
यह पूरा मामला पशु चिकित्सा सहायक शल्यज्ञ विष्णु कुमार गुप्ता और उनके अन्य साथी चिकित्सकों द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि उन्हें भी लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अधीन काम करने वाले मेडिकल अफसरों और डेंटल सर्जनों की तर्ज पर समयमान वेतनमान यानी क्रमोन्नति का लाभ दिया जाए। समयमान वेतनमान वह व्यवस्था है, जिसमें कर्मचारी का वेतन एक निश्चित न्यूनतम स्तर से शुरू होता है और तय समयसीमा पर निर्धारित वेतनवृद्धि (इंक्रीमेंट) के साथ बढ़ता हुआ अधिकतम सीमा तक पहुंचता है।
याचिका में बताया गया था कि प्रदेश में जहां डेंटल सर्जनों और मेडिकल अफसरों को 5, 10, 15 और 30 साल की सेवा पूरी करने पर समयमान वेतनमान का लाभ दिया जाता है, वहीं पशु चिकित्सकों के लिए पहली क्रमोन्नति की अर्हता ही 8 वर्ष की सेवा रखी गई थी। पशु चिकित्सकों ने इस असमानता को सीधे तौर पर मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया था।
सिंगल बेंच द्वारा याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय सुनाए जाने के बाद राज्य सरकार ने इसके खिलाफ खंडपीठ में अपील की थी। सरकार की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता मणिकांत शर्मा ने दलील दी कि याचिकाकर्ता पशुपालन एवं डेयरी विभाग के अंतर्गत काम करते हैं और उन पर अलग सेवा नियम लागू होते हैं। सरकार का तर्क था कि मेडिकल और डेंटल सर्जन लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अंतर्गत आते हैं, इसलिए अलग नियमों से संचालित होने के कारण वेटेरिनरी डॉक्टर उनके समान लाभ का दावा नहीं कर सकते।
‘जब मूल वेतन समान, तो पदोन्नति के लाभ में भेदभाव अनुचित’
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सरकार के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि मध्य प्रदेश सरकार पहले से ही पशु चिकित्सकों को मेडिकल और डेंटल सर्जनों के बराबर मूल वेतन और भत्ते प्रदान कर रही है। अदालत ने कहा कि जब शासन स्वयं प्रवेश स्तर पर इन पदों को समकक्ष मान चुका है, तो आगे चलकर उच्च समयमान वेतनमान देने के मामले में उनके साथ दोहरे मापदंड नहीं अपनाए जा सकते।
अदालत ने रेखांकित किया कि एक नियोक्ता के रूप में सरकार दो ऐसे संवर्गों के बीच पक्षपात नहीं कर सकती जिनका काम एक ही प्रकृति का है, भले ही उनके मरीज अलग-अलग हों। पीठ ने कहा कि इंसानों का इलाज करने वाले डॉक्टर हों या बेजुबानों की देखभाल करने वाले पशु चिकित्सक, दोनों ही समाज के हीलर यानी उपचारक हैं।
‘मूक पशुओं का इलाज सबसे कठिन चुनौती’
फैसले में पशु चिकित्सकों के कार्य की जटिलता को विशेष रूप से रेखांकित किया गया। अदालत ने कहा कि इंसानों का इलाज करने वाले डॉक्टरों के सामने मरीज खुद अपनी तकलीफ और लक्षण बयां कर सकते हैं, लेकिन वेटेरिनरी डॉक्टरों के पास यह सुविधा नहीं होती। एक पशु चिकित्सक को अपनी गहरी अंतर्दृष्टि, उत्कृष्ट नैदानिक कौशल, असीम धैर्य और सूक्ष्म अवलोकन के दम पर बेजुबान जीव की बीमारी का पता लगाना होता है।
इस संदर्भ में अदालत ने अमेरिकी व्यंग्यकार और सामाजिक टिप्पणीकार विल रोजर्स के उस कथन को उद्धृत किया जिसमें उन्होंने कहा था, “व्यक्तिगत रूप से मुझे हमेशा लगता है कि दुनिया में सबसे बेहतरीन डॉक्टर पशु चिकित्सक ही हैं। वे अपने मरीज से यह नहीं पूछ सकते कि उन्हें क्या परेशानी है, उन्हें खुद ही सब समझना पड़ता है।”
अदालत ने यह भी जोड़ा कि पशु चिकित्सकों को अक्सर दूरदराज के बीहड़ इलाकों, दुर्गम रास्तों और विषम मौसम में जाकर सेवाएं देनी पड़ती हैं। इसके अलावा पशुपालन आज केवल आजीविका न रहकर एक बड़े उद्योग का रूप ले चुका है और प्रदेश की 80 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण आबादी पशु चिकित्सा सेवाओं पर निर्भर है। ऐसे में राज्य के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने में महती भूमिका निभाने वाले वेटेरिनरी डॉक्टरों की सेवाओं को किसी भी सूरत में कमतर नहीं आंका जा सकता।

