उत्तर प्रदेश गिरोहबंद और असामाजिक क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1986 (यूपी गैंगस्टर्स एक्ट) पर एक महत्वपूर्ण निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को “मृतप्राय” करार दिया है। जस्टिस जे. बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि यह अधिनियम अपने आप में किसी नए या विशिष्ट वैधानिक अपराध का निर्माण या परिभाषा नहीं करता है। अदालत ने दो वकीलों के खिलाफ यूपी एक्ट की धारा 2 और 3 के तहत शुरू की गई आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द करते हुए माना कि बिना किसी मूल वैधानिक अपराध के केवल कार्यपालिका द्वारा तैयार गैंग चार्ट के आधार पर सजा तय करना अवैध और संवैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं है।
मामलों की पृष्ठभूमि
यह निर्णय यूपी एक्ट, 1986 और उत्तर प्रदेश गिरोहबंद और असामाजिक क्रियाकलाप (निवारण) नियमावली, 2021 के तहत दर्ज मामलों को चुनौती देने वाली दो आपराधिक अपीलों पर आया है।
पहले मामले में, अपीलकर्ता शिव प्रताप सिंह फतेहगढ़, फर्रुखाबाद स्थित बार एसोसिएशन के चुनाव से जुड़े विवादों में शामिल एक वकील हैं। उत्तर प्रदेश बार काउंसिल द्वारा शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई के बाद उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत एक एफआईआर (एफआईआर संख्या 377/2023) दर्ज की गई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने बार काउंसिल के निर्देश पर रोक लगा दी थी और बाद में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी उस आदेश को शून्य घोषित कर दिया था। इसके बावजूद, स्थानीय पुलिस ने यूपी एक्ट की धारा 2 के तहत एफआईआर संख्या 41/2024 दर्ज कर ली। यह कार्रवाई एक गैंग चार्ट के आधार पर की गई, जिसमें उन्हें दो अन्य लोगों के साथ शामिल करते हुए आईपीसी के अध्याय XVI, XVII और XXII के तहत असामाजिक गतिविधियों का आरोप लगाया गया। इस मामले में 12 फरवरी, 2025 को चार्जशीट दाखिल की गई थी।
दूसरे मामले में, अपीलकर्ता हिमांशु श्रीवास्तव (जो स्वयं एक वकील हैं) ने अपने, अपने भाई और अपने पिता के खिलाफ पुलिस स्टेशन लोनी बॉर्डर, जिला गाजियाबाद देहात में दर्ज केस क्राइम संख्या 740/2022 (धारा 2 व 3, यूपी एक्ट) की कार्यवाही को चुनौती दी। यह कार्यवाही आईपीसी और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धाराओं के तहत दर्ज एक पुराने मामले (केस क्राइम संख्या 61/2022) के आधार पर शुरू की गई थी।
दोनों मामलों में, अपीलकर्ताओं ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के तहत चार्जशीट रद्द करने के लिए हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। हाईकोर्ट द्वारा याचिकाएं खारिज किए जाने के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं का तर्क था कि केवल गैंग चार्ट के आधार पर यूपी एक्ट और नियमों के तहत कार्यवाही शुरू करना अवैध है। अधिनियम स्वयं कोई नया वैधानिक अपराध निर्मित नहीं करता, जिससे धारा 3 के तहत बिना किसी वास्तविक अपराध के मनमानी सजा का मार्ग प्रशस्त होता है।
दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश राज्य ने अपीलों का कड़ा विरोध किया। राज्य ने दलील दी कि अपीलकर्ता ज्ञात अपराधी हैं और उनके आपराधिक इतिहास को देखते हुए 2021 के नियमों के तहत नियमानुसार गैंग चार्ट तैयार किया गया था। राज्य ने एफआईआर में लगाए गए आरोपों का हवाला दिया, जिसमें अदालत परिसर में सुरक्षा व्यवस्था में बाधा डालना, गोला-बारूद लाना, विस्फोट करना और अवैध हथियारों से गोलीबारी करना शामिल था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि जिला जज या किसी भी पीठासीन अधिकारी द्वारा अदालत परिसर के भीतर ऐसी किसी कथित घटना के संबंध में कोई औपचारिक शिकायत दर्ज कराने का कोई प्रमाण रिकॉर्ड में नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय की शुरुआत जॉर्ज ऑरवेल के इस कथन से की: “जो लोग हिंसा का त्याग करते हैं, वे केवल इसलिए ऐसा कर पाते हैं क्योंकि दूसरे उनकी ओर से हिंसा कर रहे होते हैं।” इसके बाद अदालत ने अधिनियम और 2021 के नियमों की विस्तृत समीक्षा की।
अदालत ने _ “nulla poena sine lege” _ (बिना कानून के कोई सजा नहीं) के मूल सिद्धांत और साधारण खंड अधिनियम (जनरल क्लॉजेज एक्ट) में ‘अपराध’ की परिभाषा का उल्लेख किया, जिसके अनुसार अपराध का अर्थ है “तत्समय लागू किसी कानून द्वारा दंडनीय बनाया गया कोई कृत्य या लोप”।
कानूनी ढांचे की जांच करते हुए अदालत ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु रेखांकित किए:
- वैधानिक अपराध का अभाव: हालांकि धारा 2(बी) और 2(सी) अन्य कानूनों (जैसे आईपीसी, यूपी आबकारी अधिनियम, एनडीपीएस एक्ट और शस्त्र अधिनियम) के तहत आने वाली असामाजिक गतिविधियों की सूची बनाकर ‘गिरोह’ और ‘गैंगस्टर’ को परिभाषित करती हैं, लेकिन यूपी एक्ट स्वयं किसी विशिष्ट आपराधिक कृत्य को अपने तहत अपराध के रूप में परिभाषित नहीं करता।
- कार्यपालकीय नियमों का अतिलंघन: धारा 23 के तहत नियम बनाने की शक्ति का उपयोग अप्रत्यक्ष रूप से अपराध बनाने या प्रशासनिक गैंग चार्ट के जरिए आपराधिक दायित्व तय करने के लिए नहीं किया जा सकता। किसी व्यक्ति को सजा देने के लिए गैंगस्टर का दर्जा तय करने का काम अधीनस्थ विधायन (सबऑर्डिनेट लेजिस्लेशन) पर छोड़ना विधायी कार्यों का अनुचित हस्तांतरण है।
- अनुच्छेद 20 के तहत संवैधानिक संरक्षण: सुप्रीम कोर्ट ने राव शिव बहादुर सिंह बनाम विंध्य प्रदेश राज्य, एस. ए. वेंकटरमन बनाम भारत संघ, मकबूल हुसैन बनाम बॉम्बे राज्य, केशवन माधव मेनन बनाम बॉम्बे राज्य, सोनी देवराजभाई बाबूभाई बनाम गुजरात राज्य, महीपाल सिंह बनाम सीबीआई, भारत संघ बनाम गणपति डीलकॉम प्राइवेट लिमिटेड, और सीबीआई बनाम आर. आर. किशोर जैसे पूर्ववर्ती फैसलों का हवाला दिया। अदालत ने दोहराया कि संविधान का अनुच्छेद 20(1) भूतलक्षी आपराधिक दायित्व तय करने और बिना किसी पूर्व विद्यमान दंड कानून के सजा देने पर रोक लगाता है।
- अन्य कानूनों से तुलना: महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम, 1999 (मकोका) या गुजरात आतंकवाद और संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम, 2015 (गुजसीटॉक) की धारा 3 स्पष्ट रूप से ‘संगठित अपराध’ या ‘आतंकी कृत्यों’ को नए अपराध के रूप में परिभाषित और दंडित करती है। इसके विपरीत, यूपी एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
- पूर्वनिर्णय का अभाव: पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि इलाहाबाद हाईकोर्ट की फुल बेंच ने अशोक कुमार दीक्षित बनाम यूपी राज्य में इस एक्ट को बरकरार रखा था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के धर्मेंद्र कीर्थल, करतार सिंह, सुभाष यादव, और श्रद्धा गुप्ता से जुड़े मामलों में अधिनियम में अपराध के निर्माण के अभाव के इस विशिष्ट प्रश्न पर निर्णय नहीं हुआ था। इसलिए यह कानूनी मुद्दा इस फैसले के लिए खुला हुआ था।
कानून के क्रियान्वयन पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बिना किसी वैधानिक अपराध के केवल प्रशासनिक गैंग चार्ट के आधार पर विचारण और सजा की अनुमति देना अंग्रेजी की कहावत “किसी कुत्ते को बदनाम करो और उसे फांसी दे दो” के समान है। अदालत ने कहा कि इस व्यवस्था में निवारक निरोध (प्रिवेंटिव डिटेंशन) कानूनों जैसे प्रक्रियात्मक संरक्षण भी मौजूद नहीं हैं, जिससे “निर्दोष, धर्मनिष्ठ, गुणवान, व्हिसलब्लोअर या सीधे शब्दों में कहें तो आंख की किरकिरी” बन चुके किसी भी नागरिक को मनमानी कार्रवाई का शिकार बनाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यूपी एक्ट, 1986 ‘मृतप्राय’ है क्योंकि इसके तहत कोई नया अपराध निर्मित नहीं किया गया है। इसलिए इसके आधार पर शुरू की गई कार्यवाहियां कायम नहीं रह सकतीं।
अदालत ने दोनों अपीलों को स्वीकार करते हुए फतेहगढ़ कोतवाली की एफआईआर संख्या 41/2024 से उत्पन्न चार्जशीट संख्या 1 (2025) तथा थाना लोनी बॉर्डर, गाजियाबाद देहात की एफआईआर संख्या 740/2022 से उत्पन्न सत्र मामला संख्या 73/2024 की पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि अपीलकर्ता हिरासत में हैं, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए यदि वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों।
अपने आदेश का समापन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि “समीक्षाधीन अधिनियम हिंसा का त्याग करने के बहाने वास्तव में अनजान नागरिकों पर हिंसा को ही बढ़ावा दे रहा है।” पीठ ने यह भी साफ किया कि इस फैसले का असर अन्य दंड कानूनों के तहत दर्ज आरोपों पर नहीं पड़ेगा और उनके तहत स्वतंत्र रूप से कानून के अनुसार कार्यवाही जारी रहेगी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: शिव प्रताप सिंह उर्फ चीनू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 3979/2026
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 20 अगस्त, 2026

