सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल स्कूल परिसर के भीतर कथित तौर पर जातिसूचक अपशब्द कहे जाने मात्र से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत “सार्वजनिक दृश्य में” (within public view) स्थान होने की वैधानिक शर्त पूरी नहीं होती। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए एक स्कूल प्रबंधक के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया। अदालत ने निर्णय दिया कि यदि कथित घटना बिना किसी आम नागरिक की मौजूदगी या सुनवाई के एक बंद कमरे में हुई हो, तो उसे सार्वजनिक दृश्य के भीतर हुआ नहीं माना जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 25 जनवरी 2020 को दर्ज एफआईआर संख्या 37/2020 से जुड़ा है, जिसे शिकायतकर्ता (प्रतिवादी संख्या 2) ने अपीलकर्ता रामकृष्ण चौहान और अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ दर्ज कराया था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि 24 जनवरी 2020 को उनके बेटे, जो उस स्कूल में पढ़ते थे जहां अपीलकर्ता प्रबंधक के रूप में कार्यरत थे, अन्य छात्रों के साथ झगड़े में उलझ गए, जिसमें उनके एक बेटे को चोटें आईं।
जब शिकायतकर्ता स्कूल पहुंचे, तो उन्होंने आरोप लगाया कि अपीलकर्ता और स्कूल के कर्मचारियों ने लाठी, डंडों और घूंसों से उनके साथ मारपीट की और जातिसूचक गालियां दीं। पुलिस ने 17 मार्च 2020 को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147, 323, 342 और 504 के साथ-साथ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत चार्जशीट दाखिल की। विशेष न्यायाधीश, SC/ST एक्ट ने 8 अगस्त 2022 को सत्र मामला संख्या 642/2022 में संज्ञान लिया।
दूसरी ओर, अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि उनकी पत्नी ने भी 25 जनवरी 2020 को शिकायतकर्ता के खिलाफ एक क्रॉस एफआईआर (एफआईआर संख्या 39/2020) दर्ज कराई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि शिकायतकर्ता ने स्कूल कार्यालय में प्रवेश कर उनकी पत्नी से गाली-गलौज और मारपीट की, जिसके बाद अपीलकर्ता को बचाव के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा था। उस मामले में शिकायतकर्ता के खिलाफ 27 अप्रैल 2020 को चार्जशीट दाखिल हुई थी और मजिस्ट्रेट ने 3 दिसंबर 2020 को संज्ञान लिया था।
अपीलकर्ता ने SC/ST एक्ट की धारा 14A(1) के तहत हाईकोर्ट में समनिंग ऑर्डर को चुनौती दी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल 2023 को आपराधिक अपील संख्या 930/2023 को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि क्रॉस-केस का होना चार्जशीट रद्द करने का आधार नहीं है और प्रथम दृष्टया मामला बनता है। इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकालने में गलती की कि घटना सार्वजनिक दृश्य के भीतर हुई थी। जांच अधिकारी द्वारा 25 फरवरी 2020 को तैयार किए गए साइट प्लान का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि घटना स्कूल परिसर के कमरा ‘ए’ में हुई थी—जो खिड़कियों या सार्वजनिक पहुंच से रहित एक बंद कमरा था।
कौंसिल ने यह भी कहा कि एफआईआर में अपीलकर्ता द्वारा कहे गए किसी विशिष्ट जातिसूचक शब्द या गाली का उल्लेख नहीं है। दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 161 के तहत दर्ज गवाहों के बयानों से केवल एक हाथापाई साबित होती है। साथ ही, अपीलकर्ता की शिकायतकर्ता से कोई पूर्व पहचान नहीं थी और न ही उनकी जाति की जानकारी थी।
राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया और कहा कि घटना सार्वजनिक दृश्य के भीतर हुई थी। उन्होंने तर्क दिया कि संज्ञान लेने के चरण में अदालत को केवल एफआईआर, चार्जशीट और जांच सामग्री के आधार पर यह देखना होता है कि क्या प्रथम दृष्टया मामला बनता है। नोटिस की तामील के बावजूद शिकायतकर्ता अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं हुए।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और पूर्व निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात की जांच की कि क्या रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के मुख्य कानूनी तत्वों को पूरा करती है। “सार्वजनिक दृश्य के भीतर स्थान” की कानूनी परिभाषा को स्पष्ट करते हुए पीठ ने करुप्पुदैयार बनाम राज्य मामले में दिए अपने फैसले को दोहराया, जिसमें हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य के फैसले पर भरोसा जताया गया था:
“सार्वजनिक दृश्य के भीतर किसी स्थान को तब माना जा सकता है, जब वह खुला स्थान हो और जहां जनता के सदस्य आरोपी द्वारा पीड़ित को कही गई बातों को देख या सुन सकें। यदि कथित अपराध चार दीवारों के भीतर होता है, जहां जनता के लोग मौजूद नहीं हैं, तो यह नहीं कहा जा सकता कि यह घटना सार्वजनिक दृश्य में हुई है।”
इस सिद्धांत को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि न तो एफआईआर में और न ही शिकायतकर्ता के बयान में यह कहा गया है कि कथित जातिसूचक गालियां जनता के लोगों की उपस्थिति या सुनवाई में दी गई थीं। इसके विपरीत, साइट प्लान में घटना स्थल कमरा ‘ए’ दर्शाया गया है, जो सार्वजनिक पहुंच से बाहर एक बंद स्थान था।
अदालत ने चार निजी गवाहों—शिक्षकों प्रदीप कुमार, शूरवीर, सुधा और पूजा चौहान—के CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज बयानों का भी विश्लेषण किया। शिक्षकों ने पुष्टि की कि स्कूल कार्यालय में विवाद और हाथापाई हुई थी, लेकिन उनमें से किसी ने यह नहीं कहा कि वे जातिसूचक अपशब्दों के दौरान कार्यालय के भीतर मौजूद थे या उन्होंने कोई जातिसूचक शब्द सुना था।
पीठ ने जोर देकर कहा:
“सार्वजनिक दृश्य की आवश्यकता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या कथित टिप्पणी ऐसी परिस्थितियों में की गई थी जिन्हें जनता के लोग देख या सुन सकते थे। महज यह तथ्य कि घटना किसी स्कूल परिसर के भीतर हुई, अपने आप में इस आवश्यकता को पूरा नहीं करता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि संज्ञान के चरण में साक्ष्यों का सूक्ष्म मूल्यांकन आवश्यक नहीं है, फिर भी अपराध के मूलभूत वैधानिक तत्व रिकॉर्ड से स्पष्ट होने चाहिए।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता के खिलाफ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत प्रथम दृष्टया अपराध नहीं बनता है।
तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 10 अप्रैल 2023 के आदेश को रद्द कर दिया। एफआईआर संख्या 37/2020 के तहत अपीलकर्ता के खिलाफ SC/ST एक्ट के आरोपों की सीमा तक आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आईपीसी के तहत शेष अपराधों के संबंध में आपराधिक कार्यवाही जारी रहेगी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: रामकृष्ण चौहान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 3394/2026
पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
निर्णय की तिथि: 20 अगस्त 2026

