सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी वादी के पास अनुबंध के विशिष्ट अनुपालन (स्पेसिफिक परफॉर्मेंस) की मांग करने का वाद-कारण (कॉज ऑफ एक्शन) उपलब्ध था, लेकिन उसने पूर्व में केवल स्थायी निषेधाज्ञा (परमानेंट इंजंक्शन) का मुकदमा दायर किया और उस समय अदालत से अनुमति नहीं ली, तो बाद में स्पेसिफिक परफॉर्मेंस के लिए दायर किया गया दूसरा मुकदमा सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) के ऑर्डर 2 रूल 2 के तहत पूरी तरह बाधित होगा। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने एक कथित मौखिक अनुबंध पर स्पेसिफिक परफॉर्मेंस की डिक्री देने वाले ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के समवर्ती फैसलों को रद्द कर दिया। पीठ ने रेखांकित किया कि पूर्व मुकदमे को वापस लेते समय मांगी गई छूट, मुकदमा शुरू करते समय वैधानिक अनुमति न लेने की चूक की भरपाई नहीं कर सकती।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अचल संपत्ति की बिक्री के लिए कथित मौखिक समझौते को साबित करने के कड़े कानूनी मानकों को दोहराते हुए कहा कि बचाव पक्ष के गवाहों के टालमटोल भरे जवाब वादी द्वारा संपन्न अनुबंध को स्थापित करने के प्राथमिक दायित्व का विकल्प नहीं हो सकते।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद बॉम्बे गैरेज अहमदाबाद लिमिटेड (प्रथम अपीलार्थी/प्रथम प्रतिवादी) के स्वामित्व वाली अचल संपत्ति की बिक्री के एक कथित मौखिक समझौते से उपजा था। वादी कंपनी जेपी इस्कॉन प्राइवेट लिमिटेड के अनुसार, संपत्ति को शुरुआत में 18.51 करोड़ रुपये में खरीदने के लिए बातचीत हुई थी, जिसके एवज में 11,000 रुपये का टोकन एडवांस नकद दिया गया था। वादी का दावा था कि बाद की बैठकों में कीमत बढ़ाकर 20.50 करोड़ रुपये कर दी गई, जिस पर 5,00,000 रुपये का अतिरिक्त नकद भुगतान किया गया और 11 जनवरी 2007 की तारीख का 5 करोड़ रुपये का चेक प्रतिवादियों को सौंपा गया।
वादी के अनुसार, 8 मई 2007 को प्रतिवादियों ने सेल डीड निष्पादित करने से साफ इनकार कर दिया और वादी को अदालत में मामला चुनौती देने को कहा। इसके बाद, वादी ने मिर्जापुर की अदालत में केवल स्थायी निषेधाज्ञा (इंजंक्शन सिम्प्लीसिटर) का वाद दायर किया, ताकि प्रतिवादियों को संपत्ति बेचने या तीसरे पक्ष के अधिकार सृजित करने से रोका जा सके। उस मुकदमे में स्पेसिफिक परफॉर्मेंस की कोई राहत नहीं मांगी गई और न ही भविष्य में इसके लिए वाद दायर करने हेतु सीपीसी के ऑर्डर 2 रूल 2(3) के तहत अदालत से कोई अनुमति ली गई।
बाद में, वादी ने एक पुरसिस (आवेदन) दाखिल कर यह कहते हुए इंजंक्शन वाद को वापस लेने की अनुमति मांगी कि पक्षों के बीच समझौते की बातचीत चल रही है। अदालत के औपचारिक आदेश में स्पष्ट रूप से नई राहत के लिए कोई अनुमति दर्ज नहीं की गई, लेकिन मुकदमे को वापस लेने के आधार पर खारिज कर दिया गया। इसके तुरंत बाद, वादी ने कथित मौखिक समझौते के स्पेसिफिक परफॉर्मेंस की मांग करते हुए एक नया मुकदमा दायर किया।
ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट, दोनों ने वादी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मुकदमे को डिक्री कर दिया। अदालतों का मानना था कि जिरह के दौरान बचाव पक्ष के गवाहों के टालमटोल वाले जवाबों के आधार पर उनके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष (एडवर्स इन्फेरेंस) निकाला जा सकता है और दूसरा मुकदमा चलने योग्य है। इन समवर्ती निष्कर्षों के खिलाफ अपीलार्थी कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलार्थियों की ओर से वरिष्ठ वकील मिहिर ठाकोर ने दलील दी कि स्पेसिफिक परफॉर्मेंस का बाद में दायर किया गया मुकदमा सीपीसी के ऑर्डर 2 रूल 2 के तहत पूरी तरह बाधित है। उन्होंने कहा कि स्पेसिफिक परफॉर्मेंस का कॉज ऑफ एक्शन पहले इंजंक्शन वाद के दायर होने से पहले ही (8 मई 2007 के इनकार के बाद) पूरी तरह उत्पन्न हो चुका था। चूंकि वादी ने पहला मुकदमा दायर करते समय अदालत की अनुमति के बिना स्पेसिफिक परफॉर्मेंस की राहत छोड़ दी थी, इसलिए उस राहत का दावा करने का अधिकार स्वतः समाप्त हो गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि दोनों पक्षों के बीच कोई संपन्न अनुबंध (कन्क्लूडेड कॉन्ट्रैक्ट) हुआ ही नहीं था; बातचीत कंपनी के प्रभारी व्यक्ति के दामाद के साथ हुई थी, जिसके पास कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 46 के तहत कंपनी को बाध्य करने का कोई अधिकार नहीं था, और 5 करोड़ रुपये का चेक कभी बैंक में भुनाया ही नहीं गया।
दूसरी ओर, वादी-प्रतिवादी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील देवेन पारिख ने दलील दी कि इस मामले में ऑर्डर 2 रूल 2 लागू नहीं होता क्योंकि वादी ने पुरसिस दाखिल करके नया वाद दायर करने की छूट स्पष्ट रूप से मांगी थी। उन्होंने कहा कि यहां सीपीसी का ऑर्डर 23 रूल 1(3) लागू होता है और वाद वापसी के आदेश से ही यह छूट मानी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरा मुकदमा परिसीमा अवधि (लिमिटेशन पीरियड) के भीतर दायर किया गया था और जब पहले मुकदमे में संशोधन के जरिए स्पेसिफिक परफॉर्मेंस की राहत जोड़ी जा सकती थी, तो नया मुकदमा खारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि 5.11 लाख रुपये नकद और 5 करोड़ रुपये का चेक देना सौदे की पुष्टि करता है, और बचाव पक्ष के गवाहों के टालमटोल भरे बयानों के आधार पर ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष सही था।
अचल संपत्ति के मौखिक अनुबंध पर कानूनी सिद्धांत
मौखिक समझौतों के आधार पर स्पेसिफिक परफॉर्मेंस के दावों पर विचार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने बृज मोहन बनाम श्रीमती सुगरा बेगम और के. नानजप्पा बनाम आर.ए. हमीद के नजीरों का हवाला दिया और फैसले से निम्नलिखित अंश उद्धृत किया:
“हम अपीलार्थियों के विद्वान वकील के इस तर्क से सहमत हैं कि कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है कि अचल संपत्ति की बिक्री का अनुबंध केवल लिखित में ही होना चाहिए। हालांकि, ऐसे मामले में जहां वादी केवल मौखिक समझौते के आधार पर अचल संपत्ति की बिक्री के अनुबंध के स्पेसिफिक परफॉर्मेंस की डिक्री मांगने आते हैं, वहां वादियों पर यह साबित करने का भारी दायित्व होता है कि अचल संपत्ति की बिक्री के लिए एक संपन्न मौखिक समझौते को लेकर दोनों पक्षों के बीच पूर्ण सहमति (कंसेंसस एड इडेम) थी। कोई संपन्न मौखिक अनुबंध हुआ था या नहीं, यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर निर्धारित किया जाने वाला तथ्य का प्रश्न है। वादियों को यह साबित करना होगा कि अचल संपत्ति की बिक्री के महत्वपूर्ण और बुनियादी नियम पक्षों के बीच मौखिक रूप से तय हो चुके थे और बाद में निष्पादित होने वाला कोई लिखित समझौता केवल एक औपचारिक समझौता होता, जिसमें उन शर्तों को शामिल किया जाता जो पहले ही मौखिक समझौते में तय और संपन्न हो चुकी थीं।”
पीठ ने जोर देकर कहा कि यद्यपि एक मौखिक अनुबंध कानूनी रूप से लागू करने योग्य है, लेकिन इसे साबित करने के लिए ठोस और पुख्ता सबूत अनिवार्य हैं; केवल अनुमान के आधार पर इसे सिद्ध नहीं माना जा सकता।
ऑर्डर 2 रूल 2 सीपीसी के तहत मुकदमे की पोषणीयता पर सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले गुरबक्स सिंह बनाम भूरालाल की कसौटी पर दूसरे मुकदमे की वैधता को परखा। संविधान पीठ के अनुसार, ऑर्डर 2 रूल 2(3) का प्रतिबंध लगाने के लिए तीन अनिवार्य तत्व सिद्ध होने चाहिए: दोनों मुकदमों में कॉज ऑफ एक्शन एक समान होना, उस कॉज ऑफ एक्शन के आधार पर वादी का एक से अधिक राहतों का हकदार होना, और अदालत की अनुमति के बिना किसी राहत की मांग छोड़ देना।
पीठ ने उन फैसलों में अंतर स्पष्ट किया जहां यह प्रतिबंध लागू नहीं हुआ था, जैसे इनबासागरन बनाम एस. नटराजन और रत्नावती बनाम कविता गणशामदास, जहां स्पेसिफिक परफॉर्मेंस का कॉज ऑफ एक्शन पहले इंजंक्शन वाद में लिखित बयान (रिटन स्टेटमेंट) दाखिल होने के बाद पैदा हुआ था। इसी प्रकार सुच्चा सिंह सोढ़ी बनाम बलदेव राज वालिया में भी संपत्ति से बेदखल करने के प्रयास और तीसरे पक्ष को बिक्री की जानकारी मिलने के बाद स्पेसिफिक परफॉर्मेंस की आवश्यकता उत्पन्न हुई थी।
दूसरी ओर, वर्गो इंडस्ट्रीज (इंजीनियरिंग) प्राइवेट लिमिटेड बनाम वेंचरटेक सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड और वुरीमी पुल्लाराव बनाम वेमरी व्यंकट राधारानी का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पहले मुकदमे के समय ही स्पेसिफिक परफॉर्मेंस मांगने का पूरा कॉज ऑफ एक्शन मौजूद था, तो अदालत की पूर्व अनुमति के बिना उसे छोड़ देना बाद के मुकदमे के लिए घातक साबित होगा।
तीन जजों की पीठ के फैसले गुरिंदरपाल बनाम जगमित्तर सिंह (जिसमें यह अनुमान लगाया गया था कि वाद वापसी का मतलब ही स्पेसिफिक परफॉर्मेंस का नया वाद दायर करना था) पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा कि यह अनुमान गुरबक्स सिंह मामले में संविधान पीठ के सिद्धांत के विपरीत है। अदालत ने यह भी पाया कि विमलेश कुमारी कुलश्रेष्ठ बनाम संभाजीराव का मामला वर्तमान विवाद पर लागू नहीं होता।
पीठ ने कुड्डालोर पावरजेन कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाम मैसर्स चेमप्लास्ट कुड्डालोर विनाइल्स लिमिटेड में दिए गए सिद्धांत को दोहराते हुए उद्धृत किया:
“इसलिए, ऑर्डर 2 रूल 2 के प्रयोजनार्थ ‘कॉज ऑफ एक्शन’ (वाद-कारण) का अर्थ वह कारण है जो मुकदमे का अवसर प्रदान करता है और उसकी नींव बनाता है। यदि वह कारण किसी व्यक्ति को उस राहत से अधिक बड़ी और व्यापक राहत मांगने में सक्षम बनाता है जिस तक उसने अपने दावे को सीमित कर रखा है, तो उसे बाद में स्वतंत्र कार्यवाही के माध्यम से शेष राहत प्राप्त करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, विशेष रूप से तब जब अदालत से अनुमति प्राप्त न की गई हो।”
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पहले मुकदमे के वादी के अपने अभिवचनों (प्लीडिंग्स) से स्पष्ट था कि 8 मई 2007 के कथित इनकार के साथ ही पूरा कॉज ऑफ एक्शन पैदा हो चुका था। कोर्ट ने स्पष्ट किया:
- ऑर्डर 2 रूल 2 का उप-नियम (3) किसी व्यक्ति को एक ही कॉज ऑफ एक्शन पर मिलने वाली कई राहतों में से किसी एक को भविष्य के लिए आरक्षित करने की अनुमति तभी देता है, जब मूल वाद दायर करते समय ही अदालत से अनुमति ले ली गई हो।
- बाद में ऑर्डर 23 रूल 1(3) के तहत मुकदमा वापस लेते समय मांगी गई छूट, मुकदमा दायर करते समय अनुमति न लेने की मूल विफलता को ठीक नहीं कर सकती।
- ऑर्डर 23 रूल 1(3) अदालत को केवल मूल मुकदमे की विषय-वस्तु (यानी इंजंक्शन) के लिए नया वाद दायर करने की अनुमति देने का अधिकार देता है, न कि उस नई व छोड़ी गई राहत (स्पेसिफिक परफॉर्मेंस) के लिए जो ऑर्डर 2 रूल 2 के तहत पहले ही त्यागी जा चुकी थी।
मौखिक अनुबंध के साक्ष्यों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
मामले के तथ्यों की पड़ताल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि कथित मौखिक अनुबंध के संबंध में वादी के बयानों में भारी विरोधाभास थे:
- अभिवचनों में अंतर्विरोध: दोनों मुकदमों के वादों में बैठकों की संख्या, उनकी तारीखों और उपस्थित लोगों को लेकर गंभीर विसंगतियां थीं। गवाही में यह कहा गया कि पहली बैठक एक गवाह के सरकारी आवास पर हुई थी, जबकि इस महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख किसी भी वादपत्र (प्लेन्ट) में नहीं था। कानून का सुस्थापित सिद्धांत है कि बिना अभिवचनों के कोई साक्ष्य स्वीकार नहीं किया जा सकता।
- चेक का न भुनाया जाना: वादी ने दावा किया कि 5 करोड़ रुपये का चेक एडवांस के रूप में सौंपा गया था। हालांकि, यह चेक कभी बैंक में भुगतान के लिए प्रस्तुत ही नहीं किया गया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि 5 करोड़ रुपये का अग्रिम चेक न भुनाया जाना सीधे तौर पर यह दर्शाता है कि कोई संपन्न अनुबंध अस्तित्व में नहीं आया था।
- गवाह का राजनीतिक कद और अनुश्रुत साक्ष्य: वादी ने पीडब्ल्यू-2 के रूप में वाजूभाई वाला की गवाही कराई, जो उस समय राज्य के मंत्री (और बाद में राज्यपाल) थे। वादी का दावा था कि सौदा उनके आवास पर उनके सामने हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने गवाह के राजनीतिक पद के आधार पर किसी विशेष साक्ष्यीय महत्व के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि कानून में ऐसी कोई धारणा नहीं है कि उच्च राजनीतिक पद पर बैठा व्यक्ति केवल सच ही बोलेगा, विशेषकर तब जब वादपत्र में उनकी उपस्थिति का कोई उल्लेख ही न हो। इसके अलावा, गवाह का यह बयान कि छठे प्रतिवादी ने उनके सामने फोन पर नौवें प्रतिवादी से बात की थी, पूरी तरह अनुश्रुत साक्ष्य (हियरसे एविडेंस) है, क्योंकि गवाह के पास यह पुष्टि करने का कोई जरिया नहीं था कि फोन के दूसरी तरफ वास्तव में कौन था।
- कंपनी के प्राधिकार का अभाव: छठा प्रतिवादी केवल नौवें प्रतिवादी का दामाद था और उसका कंपनी में कोई आधिकारिक पद या संपत्ति बेचने का बोर्ड प्रस्ताव नहीं था। केवल वैवाहिक संबंधों के आधार पर उस पर भरोसा करना वादी का अपना जोखिम था।
- सबूत का भार: ट्रायल कोर्ट ने बचाव पक्ष के गवाहों (डीडब्ल्यू-1 और डीडब्ल्यू-2) के टालमटोल भरे जवाबों पर अत्यधिक भरोसा करके गलती की। पीठ ने स्पष्ट किया कि बचाव पक्ष के आचरण की दुर्बलता वादी को अपने मामले को स्वतंत्र रूप से और बिना किसी संदेह के साबित करने के दायित्व से मुक्त नहीं करती।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के समवर्ती निष्कर्षों को कानूनन त्रुटिपूर्ण और विकृत (परवर्स) करार देते हुए अपील स्वीकार कर ली।
पीठ ने दोनों अधीनस्थ अदालतों के फैसलों और डिक्री को पूरी तरह निरस्त कर दिया और वादी के स्पेसिफिक परफॉर्मेंस के मुकदमे को खारिज कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि दोनों पक्ष अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: बॉम्बे गैरेज अहमदाबाद लिमिटेड व अन्य बनाम जेपी इस्कॉन प्राइवेट लिमिटेड व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या… वर्ष 2026 (@विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 25909/2024)
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 29 सितंबर 2026

