प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक हिरासत) के संवैधानिक दायरों को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच, जिसमें जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू शामिल थे, ने माना कि पुलिस के समक्ष दर्ज किया गया कोई भी इकबालिया बयान अकेले प्रिवेंटिव डिटेंशन के आदेश के लिए जरूरी ‘आत्मनिष्ठ संतुष्टि’ (सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन) का आधार नहीं बन सकता। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले के आरोपी मुल्ला अफ़रोज़ के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका/एनएसए) के तहत जारी डिटेंशन और उसकी पुष्टि के आदेशों को पूरी तरह रद्द कर दिया। कोर्ट ने अफ़रोज़ को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया और अदालत द्वारा दी गई जमानत को निष्फल करने के लिए एनएसए का दंडात्मक इस्तेमाल करने पर उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट (मुकदमा खर्च) लगाई।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 24 नवंबर 2024 को उत्तर प्रदेश के संभल में एक मस्जिद के अदालत द्वारा निर्देशित सर्वे के दौरान भड़की हिंसा से जुड़ा है। उस दौरान हुई हिंसा में चार लोगों की जान चली गई थी। घटना के तुरंत बाद उसी दिन पहली एफआईआर (केस क्राइम संख्या 333/2024) दर्ज की गई, जिसके बाद कई अन्य जुड़ी हुई एफआईआर (केस क्राइम संख्या 306, 337, 338, 339 और 340 वर्ष 2024) भी दर्ज की गईं।
शुरुआती मुख्य एफआईआर में मुल्ला अफ़रोज़ का नाम नहीं था। घटना के 54 दिन बाद, यानी 17 जनवरी 2025 को पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और बाद में अन्य मुकदमों में भी हिरासत में ले लिया। पुलिस का दावा था कि हिरासत के दौरान अफ़रोज़ ने जुर्म कबूल किया, जिसके आधार पर .32 बोर की एक पिस्तौल बरामद की गई। हालांकि, मेडिकल रिपोर्ट से यह सामने आया था कि मृतकों की मौत .315 बोर की गोलियां लगने से हुई थी।
इसके बाद, 9 सितंबर 2025 को हाईकोर्ट ने केस क्राइम संख्या 340/2024 में अफ़रोज़ को जमानत दे दी। वे अन्य मामलों में न्यायिक हिरासत में ही थे कि 13 अक्टूबर 2025 को संभल के जिला मजिस्ट्रेट ने रासुका की धारा 3(2) के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश जारी कर दिया। अफ़रोज़ ने जेल से इस आदेश के खिलाफ प्रतिवेदन (रिप्रजेंटेशन) भेजा, जिसे डीएम ने देरी के आधार पर खारिज कर दिया। इसके बाद राज्य और केंद्र सरकार ने भी उनके प्रतिवेदन नामंजूर कर दिए।
सलाहकार बोर्ड (एडवाइजरी बोर्ड) की रिपोर्ट के बाद, उत्तर प्रदेश सरकार ने 28 नवंबर 2025 को रासुका की धारा 12 के तहत डिटेंशन की पुष्टि करते हुए इसे 12 महीने के लिए बढ़ा दिया। जून 2026 तक अफ़रोज़ अपने खिलाफ दर्ज सभी आपराधिक मामलों में हाईकोर्ट से नियमित जमानत हासिल कर चुके थे। इसके बाद उन्होंने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दायर की। 8 जून 2026 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि डीएम का फैसला प्रासंगिक सामग्रियों पर आधारित था और इसमें अदालत के दखल की जरूरत नहीं है। इसके खिलाफ अफ़रोज़ ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील दिव्येश प्रताप सिंह ने दलील दी कि डिटेंशन आदेश में जिन सामग्रियों का जिक्र किया गया था, वे कभी आरोपी को मुहैया ही नहीं कराई गईं। यह संविधान के अनुच्छेद 22 और रासुका के तहत मिले कानूनी अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने ‘अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य’ और ‘अन्नू उर्फ अनिकेत बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब अदालत से जमानत मिल गई, तो रिहाई रोकने के लिए ही एनएसए का सहारा लिया गया।
वकील ने आगे कहा कि केवल कई आपराधिक मामले दर्ज होना ही प्रिवेंटिव डिटेंशन का आधार नहीं बन सकता, जब तक कि लोक व्यवस्था (पब्लिक ऑर्डर) बिगड़ने का कोई सीधा संबंध साबित न हो। इसके लिए उन्होंने ‘विजय कुमार राजपूत बनाम छत्तीसगढ़ राज्य’, ‘रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य’ और ‘रोशनी देवी बनाम तेलंगाना राज्य’ के फैसलों पर भरोसा जताया। उन्होंने यह भी तर्क रखा कि हिरासत का पूरा आधार पुलिस प्रताड़ना और जान से मारने की धमकी देकर लिया गया बयान है, जो संविधान के अनुच्छेद 20(3) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 23 के तहत कानूनन अमान्य है। उन्होंने ‘पेबाम निंगोल मिकोई देवी बनाम मणिपुर राज्य’ और ‘डॉ. राम मनोहर लोहिया बनाम बिहार राज्य’ का हवाला देते हुए कहा कि यह मामला कानून-व्यवस्था का हो सकता है, न कि लोक व्यवस्था के गंभीर संकट का।
दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) नटराज ने डिटेंशन आदेश का बचाव किया। उन्होंने कहा कि संभल में हुई हिंसा में चार मौतें हुईं, पुलिसकर्मी घायल हुए और इंटरनेट सेवाएं बंद करनी पड़ीं, जिससे लोक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी। यह हालात ‘अरुण घोष बनाम पश्चिम बंगाल राज्य’ के सिद्धांत के तहत रासुका की धारा 3(2) की शर्तों को पूरा करते हैं।
सरकार ने तर्क दिया कि ‘हरधन साहा बनाम पश्चिम बंगाल राज्य’ और ‘कमरुन्निसा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ के मुताबिक, आपराधिक मुकदमे लंबित होना या जमानत मिलना प्रिवेंटिव डिटेंशन के आड़े नहीं आता। एएसजी ने ‘अरुणा कुमारी बनाम आंध्र प्रदेश सरकार’, ‘पंजाब राज्य बनाम सुखपाल’ और ‘खत्री (IV) बनाम बिहार राज्य’ के फैसलों का हवाला देकर कहा कि डीएम की आत्मनिष्ठ संतुष्टि की न्यायिक समीक्षा का दायरा बहुत सीमित होता है। इसके अलावा मद्रास हाईकोर्ट की फुल बेंच के ‘सुमन बनाम तमिलनाडु राज्य’ फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि पुलिस के सामने दिया गया कबूलनामा भी डिटेंशन का वैध आधार बन सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दो प्रमुख सवाल तय किए: पहला, क्या पुलिस के सामने दिए गए कबूलनामे के आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश दिया जा सकता है? और दूसरा, क्या जिन सामग्रियों के आधार पर डीएम ने संतुष्टि दर्ज की, वे कानूनी और संवैधानिक कसौटियों पर खरी उतरती हैं?
पुलिस के समक्ष कबूलनामे के मुद्दे पर बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 20(3) में मिले आत्म-दोषारोपण से संरक्षण के मौलिक अधिकार और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 23 के प्रावधानों की पड़ताल की। कोर्ट ने ‘अरुणा कुमारी’, ‘सेंथामिलसेल्वी’, ‘खत्री’ और ‘ई. सुब्बुलक्ष्मी’ के पुराने मामलों का अध्ययन किया और स्पष्ट किया कि उन मामलों में डिटेंशन आदेश को सिर्फ कबूलनामे के आधार पर चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए वहां की गई टिप्पणियां मात्र आनुषंगिक (ओबिटर डिक्टा) थीं। ‘करतार सिंह बनाम पंजाब राज्य’ के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि पुलिस कस्टडी में लिए गए बयानों पर हमेशा दबाव और प्रताड़ना का संदेह रहता है, इसलिए वे अविश्वसनीय माने जाते हैं।
इस कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए बेंच ने कहा:
“इसलिए, हमारी यह सुविचारित राय है कि पुलिस अधिकारी के समक्ष दिया गया कोई कबूलनामा, अपने आप में और उसके समर्थन में किसी स्वतंत्र सामग्री के अभाव में, प्रिवेंटिव डिटेंशन के आदेश को बरकरार रखने के लिए आवश्यक आत्मनिष्ठ संतुष्टि का आधार नहीं बन सकता।”
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट की फुल बेंच के ‘सुमन बनाम तमिलनाडु राज्य’ के उस पुराने फैसले को निरस्त (ओवररूल) कर दिया, जिसमें पुलिस के सामने दिए कबूलनामे को डिटेंशन का आधार माना गया था। बेंच ने कहा कि ‘सुमन’ फैसले के समय ‘करतार सिंह’ का फैसला नहीं आया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“इसके साथ ही, हम दोहराते हैं कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के मात्र इकबालिया बयान पर (बिना किसी अन्य ठोस आधार या सामग्री के) डिटेंशन आदेश पारित करने के एकमात्र आधार के रूप में भरोसा नहीं किया जा सकता।”
इसके बाद अदालत ने ‘पेबाम निंगोल मिकोई देवी’ और ‘अमीना बेगम’ के सिद्धांतों की कसौटी पर डीएम द्वारा इस्तेमाल की गई बाकी सामग्रियों की जांच की, जिसमें गंभीर खामियां सामने आईं:
- सीसीटीवी और वीडियो रिकॉर्डिंग का न होना: डिटेंशन के आधार में आरोप लगाया गया था कि सीसीटीवी फुटेज और वीडियो से अफ़रोज़ की मुख्य साजिशकर्ता के रूप में पहचान हुई। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि जिन 22 दस्तावेजों की सूची आरोपी को दी गई, उनमें यह फुटेज शामिल ही नहीं था, न ही इसे कोर्ट के सामने पेश किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि अगर घटना के समय ही यह फुटेज मौजूद था, तो पुलिस को गिरफ्तारी करने में 54 दिन क्यों लग गए?
- कथित मोबाइल कॉल का कोई रिकॉर्ड नहीं: आदेश में आरोप लगाया गया कि अफ़रोज़ किसी ‘बॉस’ नाम के व्यक्ति से फोन पर हत्याओं की साजिश रच रहे थे। मगर आदेश में ही यह भी लिखा था कि आरोपी के फोन का डेटा मिटा दिया गया था और उसे दोबारा हासिल नहीं किया जा सका। ऐसे में जब कोई संदेश या कॉल रिकॉर्ड फाइल में था ही नहीं, तो यह निष्कर्ष किस आधार पर निकाला गया, इसका कोई जवाब नहीं था।
- चार्जशीट को अपराध का पक्का सबूत मानना: डीएम ने केस क्राइम संख्या 337/2024 में चार्जशीट दाखिल होने को ही आरोपी की संलिप्तता और लोक व्यवस्था भंग होने का अंतिम सबूत मान लिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि चार्जशीट केवल जांच एजेंसी की एक राय होती है, वह अदालत का फैसला या दोष सिद्धि नहीं है।
- जमानत के आदेशों को बेअसर करने की कोशिश: डिटेंशन ऑर्डर में गोपनीय जेल रिपोर्ट का हवाला देकर कहा गया था कि अफ़रोज़ ने जमानत की अर्जी लगाई है और बाहर आते ही वे फिर हिंसा कर सकते हैं। ‘विजय नारायण सिंह बनाम बिहार राज्य’ और ‘अन्नू उर्फ अनिकेत’ का हवाला देते हुए बेंच ने इस रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा:
“इससे स्पष्ट है कि विवादित डिटेंशन जमानत देने वाले न्यायिक आदेश को निष्फल करने और हिरासत में लिए गए व्यक्ति को दूसरे रास्ते से जेल में रखने का एक प्रयास है। ऐसा डिटेंशन निवारक नहीं बल्कि दंडात्मक है और जमानत देने वाले आदेश को विफल करने के इरादे से किया गया प्रतीत होता है।”
बेंच ने स्पष्ट किया कि यद्यपि ‘हरधन साहा’ फैसले के तहत आपराधिक मुकदमा चलने के दौरान भी प्रिवेंटिव डिटेंशन लगाया जा सकता है, लेकिन जब वही आरोप, वही घटना और वही तथ्य हों जिन पर अदालत नियमित जमानत दे चुकी है, तब प्रशासन के इस कदम की बहुत कड़ी न्यायिक जांच जरूरी हो जाती है। ‘रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य’ का हवाला देते हुए बेंच ने कहा:
“यदि डिटेंशन के आदेश को एक निवारक उपाय के रूप में उचित ठहराना है, तो जिस सामग्री पर भरोसा किया गया है, उससे भविष्य में नुकसानदेह आचरण को रोकने की आवश्यकता स्पष्ट रूप से स्थापित होनी चाहिए, न कि केवल उन आरोपों को दोहराया जाना चाहिए जो पहले से ही चल रहे आपराधिक मुकदमे का हिस्सा हैं।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि डीएम द्वारा दर्ज की गई संतुष्टि और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के बीच कोई तार्किक संबंध नहीं था। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 8 जून 2026 के फैसले को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही 13 अक्टूबर 2025 का डिटेंशन आदेश और 28 नवंबर 2025 का पुष्टि आदेश पूरी तरह रद्द कर दिए गए।
अदालत ने निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में हिरासत की आवश्यकता न हो, तो अपीलकर्ता को तुरंत रिहा किया जाए।
यह देखते हुए कि सभी मामलों में जमानत मिलने के बावजूद आरोपी को पूरे एक साल तक हिरासत में रखा गया और उसकी तय अवधि अब खत्म होने ही वाली थी, बेंच ने तल्ख टिप्पणी की:
“ऐसी परिस्थितियों में, कानूनी प्रक्रिया को ही सजा बना दिया गया।”
सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुचित डिटेंशन के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट लगाई और आदेश दिया कि यह राशि एक महीने के भीतर अपीलकर्ता को दी जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने लंबित आपराधिक मुकदमों के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है और वे सामान्य कानून के तहत स्वतंत्र रूप से चलते रहेंगे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मुल्ला अफ़रोज़ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 4310/2026 [एसएलपी (क्रिमिनल) संख्या 12534/2026 से उत्पन्न]
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 29 सितंबर 2026

