कर्नाटक हाईकोर्ट: बिना ट्रायल 21 साल जेल में बीताने वाले मानसिक रूप से बीमार कैदी की फाइल गायब, विधिक सेवा प्राधिकरण बना पक्षकार

कर्नाटक हाईकोर्ट ने बिना किसी आपराधिक मुकदमे के पिछले 21 वर्षों से बेंगलुरु सेंट्रल जेल में बंद एक मानसिक रूप से अस्वस्थ विचाराधीन कैदी के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। यह मामला तब अदालत पहुंचा जब पता चला कि निचली अदालत के आधिकारिक रिकॉर्ड से कैदी के केस की फाइल ही गायब है।

जस्टिस सी. एम. पूनाचा ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कर्नाटक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (केएसएलएसए) को मामले में प्रतिवादी पक्षकार बनाने का निर्देश दिया। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई गुरुवार के लिए तय की है। याचिका में निचली अदालत को तत्काल प्रभाव से कैदी वी. श्रीनिवासा के अदालती दस्तावेज तलाशने और उन्हें जारी करने का आदेश देने की मांग की गई है।

निचली अदालत से रिकॉर्ड गायब, वकीलों ने बिना फीस उठाया मामला

कोलार ग्रामीण पुलिस ने श्रीनिवासा को वर्ष 2005 में अपनी पत्नी की कथित तौर पर हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार किया था। निचली अदालत द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद से वह लगातार जेल में ही बंद है। इस मामले को अधिवक्ता विक्रम राज ए. और अश्विन जॉयस्टन कुटिन्हा ने प्रो बोनो यानी बिना किसी फीस के स्वेच्छा से हाईकोर्ट के संज्ञान में लाया।

मामले के दस्तावेज गायब होने की बात अगस्त में उस समय उजागर हुई, जब दोनों वकीलों ने केस रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रतियों के लिए कोलार की निचली अदालत में अर्जी दी। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने उसी दिन अर्जी यह कहते हुए लौटा दी कि केंद्रीय रिकॉर्ड रूम से फाइल प्राप्त नहीं हुई है। इसके बाद 7 सितंबर को दोनों वकीलों ने बेंगलुरु की सेंट्रल जेल में श्रीनिवासा से मुलाकात की और फिर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने तथ्यात्मक रूप से गलत आधार पर याचिका दायर करने के लिए एओआर पर ₹10k का जुर्माना लगाया

अधिवक्ता अश्विन जॉयस्टन कुटिन्हा ने कहा कि निचली अदालत का रिकॉर्ड न ढूंढ पाना किसी भी कैदी को उसकी अपनी व्यक्तिगत आजादी से जुड़े मामले की कानूनी प्रक्रिया से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता। कानून के मुताबिक रिकॉर्ड तलाशना और प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराना अदालत की जिम्मेदारी है। वहीं अधिवक्ता विक्रम राज ने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह अर्जी यह जानने के लिए लगाई थी कि मामले की मौजूदा कानूनी स्थिति क्या है और क्या ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सुरक्षात्मक कदमों का पालन हुआ है।

2015 में मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित, फिर भी ई-कोर्ट्स पर केस ‘डिस्पोज्ड’

श्रीनिवासा के मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट की बात जेल प्रशासन ने वर्ष 2005 की अदालती कार्यवाही के दौरान ही दर्ज कराई थी। इसके बाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (निमहांस) की मेडिकल जांच के आधार पर निचली अदालत ने 3 सितंबर 2015 को यह माना कि श्रीनिवासा मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं और मुकदमे का सामना करने में सक्षम नहीं हैं।

उस समय अदालत ने आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाते हुए श्रीनिवासा को बेंगलुरु सेंट्रल जेल के मनोरोग वार्ड या धारवाड़ के मानसिक अस्पताल में स्थानांतरित करने और समय-समय पर उनकी मानसिक स्थिति की रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया था। न्यायिक रिकॉर्ड में 2015 का यह आदेश ही अंतिम प्रविष्टि है। हैरान करने वाली बात यह है कि बिना किसी अंतिम फैसले या सुनवाई के, ई-कोर्ट्स पोर्टल पर इस केस की स्थिति को ‘डिस्पोज्ड’ (निस्तारित) दर्शाया गया है।

READ ALSO  Amend Laws to Punish Rape of Dead Bodies: Karnataka HC Tells Centre

सुप्रीम कोर्ट के अनिवार्य दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन

हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट के उन अनिवार्य दिशा-निर्देशों का गंभीर उल्लंघन है, जो मनोरोग से ग्रस्त विचाराधीन कैदियों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए थे। ये नियम असम के मचल लालुंग मामले पर 2005 में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के बाद शीर्ष अदालत द्वारा तय किए गए थे। लालुंग ने एक विचाराधीन कैदी के तौर पर मानसिक अस्पताल में 38 साल बिता दिए थे।

READ ALSO  भारत के लोकपाल जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष ने डिजिटल प्लेटफॉर्म 'लोकपाल ऑनलाइन' लॉन्च किया- जानिए विस्तार से

सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के तहत गंभीर अपराधों के आरोपी मानसिक रूप से अस्वस्थ विचाराधीन कैदियों की नियमित चिकित्सकीय जांच अनिवार्य है। इसके अलावा उनकी मानसिक फिटनेस रिपोर्ट लगातार संबंधित सत्र अदालत को भेजी जानी चाहिए और संबंधित अदालत के लिए हर तीन महीने में कम से कम एक बार ऐसे मामलों की औपचारिक न्यायिक समीक्षा करना अनिवार्य है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles