दिल्ली जिमखाना क्लब जमीन अधिग्रहण मामला: सुप्रीम कोर्ट ने सदस्यों को हाईकोर्ट जाने की दी छूट

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली जिमखाना क्लब के 27.3 एकड़ भूखंड को केंद्र सरकार द्वारा अपने नियंत्रण में लेने और बेदखली की कार्यवाही के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए क्लब के सदस्यों को दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की अनुमति दे दी है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने विपिन अग्रवाल समेत 11 सदस्यों की याचिका का निस्तारण करते हुए उन्हें हाईकोर्ट में नई याचिका दायर करने या वहां पहले से विचाराधीन मामले में पक्षकार बनने की छूट प्रदान की। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट इस मामले की सुनवाई अपने स्तर पर गुण-दोष के आधार पर करेगा।

प्रबंधन पर केंद्र के दोहरे नियंत्रण का विरोध

क्लब सदस्यों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने पीठ के समक्ष दलील दी कि वर्तमान में क्लब का संचालन केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक समिति कर रही है। ऐसी स्थिति में संस्था स्वयं सरकार के खिलाफ निष्पक्ष कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकती। उन्होंने कहा कि यहां पट्टादाता और पट्टेदार दोनों पक्षों की कमान सरकार के ही हाथों में है, जो क्लब पर अनुचित तरीके से कब्जा करने का प्रयास है। सिंह ने यह भी कहा कि सरकारी समिति ने एनसीएलएटी द्वारा चुनाव कराने और लोकतांत्रिक नियंत्रण बहाल करने के लिए तय की गई समयसीमा का उल्लंघन किया है।

अधिवक्ता नितिन सलूजा के माध्यम से पेश इस याचिका में आरोप लगाया गया कि अंतरिम प्रबंधन ने लीज निरस्तीकरण और बेदखली आदेशों के खिलाफ क्लब के हितों की रक्षा करने के बजाय सरकार से किसी वैकल्पिक भूखंड की मांग कर दी।

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लीज रद्दीकरण और बेदखली नोटिस को चुनौती

याचिकाकर्ताओं ने भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएंडडीओ) द्वारा 22 मई को जारी पुनर्ग्रहण अधिसूचना और संपदा अधिकारी द्वारा 29 जून को सार्वजनिक परिसर अधिनियम के तहत जारी कारण बताओ नोटिस को रद्द करने की मांग की है। सदस्यों का कहना है कि सरकार का यह कदम शक्तियों का दुरुपयोग है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों तथा अनुच्छेद 300ए के तहत संपत्ति के अधिकार का हनन करता है।

याचिका के मुताबिक, 22 मई के आदेश में वर्ष 1928 के स्थायी पट्टे को समाप्त कर परिसर में पुनः प्रवेश का निर्देश दिया गया था। सरकार ने इसके लिए रक्षा ढांचे की मजबूती, सार्वजनिक सुरक्षा, संस्थागत आवश्यकताओं, प्रशासनिक ढांचे और जनहित की योजनाओं का हवाला दिया था। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने रेखांकित किया कि अधिसूचना में किसी विशिष्ट परियोजना का उल्लेख नहीं है और न ही अधिग्रहण के औचित्य को साबित करने वाली सामग्री साझा की गई है। इसके अतिरिक्त, इस कदम के लिए न तो कोई मुआवजा दिया गया और न ही इसे रक्षा मंत्रालय का समर्थन प्राप्त था।

याचिका में कहा गया है कि यह कार्रवाई किसी भूस्वामी का सामान्य कदम नहीं है, बल्कि जिमखाना क्लब पर नियंत्रण हासिल करने की केंद्र सरकार की पच्चीस साल पुरानी योजना का परिणाम है। इसे उस समय अंजाम दिया जा रहा है जब क्लब की कमान सरकार द्वारा नियुक्त प्रबंधन के पास है, जिसकी वैधता का मामला खुद सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

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कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल की कार्यवाही और वित्तीय मांग

इस विवाद का आधार कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 241 और 242 के तहत सरकार का हस्तक्षेप रहा है। राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी) ने 1 अप्रैल 2022 को क्लब की निर्वाचित समिति को हटाकर केंद्र सरकार को 15 निदेशक नियुक्त करने की अनुमति दी थी। इसके बाद राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (एनसीएलएटी) ने 21 अक्टूबर 2024 के अपने आदेश में सुधार प्रक्रिया अपनाने और चुनाव कराने के निर्देश दिए थे, हालांकि यह मामला शीर्ष अदालत में अपील के चलते लंबित है।

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इसके साथ ही, एलएंडडीओ द्वारा ग्राउंड रेंट में पूर्वव्यापी संशोधन करते हुए 16 अप्रैल को 47.59 करोड़ रुपये के बकाए की मांग उठाई गई थी, जिसे हाईकोर्ट में अलग से चुनौती दी जा चुकी है।

हाईकोर्ट में पहले से लंबित मामलों की स्थिति

सफदरजंग रोड स्थित इस परिसर की बेदखली से जुड़ा मामला पहले से ही हाईकोर्ट के समक्ष विचाराधीन है। क्लब के सदस्य विजय खुराना और अन्य की याचिकाओं में 29 जून के बेदखली नोटिस पर रोक लगाने की मांग की गई है। इस प्रकरण में केंद्र सरकार ने 3 सितंबर को हाईकोर्ट में बयान दिया था कि वह 16 सितंबर तक क्लब के खिलाफ बेदखली की कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करेगी।

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