सुप्रीम कोर्ट ने काशी मठ संस्थान की संपत्तियों और बहुमूल्य धार्मिक वस्तुओं की बरामदगी से जुड़ी निष्पादन प्रक्रिया के मामले में राघवेंद्र तीर्थ स्वामी की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी है। शीर्ष अदालत के इस फैसले से केरल हाईकोर्ट का वह आदेश प्रभावी रहेगा, जिसने संस्थान के मौजूदा प्रमुख संयमींद्र तीर्थ स्वामी को पूर्व मठाधीश के स्थान पर डिक्री धारक के रूप में वसूली प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति दी थी।
याचिका में सुनवाई का कोई ठोस आधार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने मंगलवार, 15 सितंबर को राघवेंद्र तीर्थ स्वामी की ओर से केरल हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय सुनाया। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उसे इस याचिका पर विचार करने का कोई उचित या मजबूत आधार नजर नहीं आता, इसलिए इसे खारिज किया जाता है।
वाराणसी में मुख्यालय रखने वाले इस संस्थान को आमतौर पर गौड़ सारस्वत ब्राह्मण काशी मठ के नाम से जाना जाता है।
केरल हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराया
मामले की सुनवाई के दौरान संयमींद्र तीर्थ स्वामी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार और अधिवक्ता लक्ष्मीश एस. कामथ ने पक्ष रखा। वकीलों ने दलील दी कि केरल हाईकोर्ट का निर्णय पूरी तरह वैधानिक था, जिसने मूल डिक्री जारी करने वाली तिरुपति अदालत की नई मंजूरी के बिना ही संयमींद्र तीर्थ स्वामी को पूर्व मठाधीश की जगह कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में शामिल करने की मंजूरी दी थी।
यह अदालती आदेश संयमींद्र तीर्थ स्वामी को संस्थान के दिवंगत प्रमुख और मूल डिक्री धारक सुधींद्र तीर्थ स्वामी के स्थान पर निष्पादन प्रक्रिया आगे बढ़ाने का अधिकार प्रदान करता है।
दो दशक पुराना उत्तराधिकार और संपत्ति विवाद
इस कानूनी टकराव की जड़ें संस्थान के प्रमुख पद और उसकी संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर सुधींद्र तीर्थ स्वामी और राघवेंद्र तीर्थ स्वामी के बीच छिड़े विवाद से जुड़ी हैं। राघवेंद्र तीर्थ स्वामी ने स्वयं को संस्थान का अधिकृत उत्तराधिकारी होने का दावा किया था।
वर्ष 2000 में राघवेंद्र तीर्थ स्वामी ने तिरुपति की अतिरिक्त जिला अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने याचिका दायर कर खुद को मठ का 21वां वैध प्रमुख घोषित करने तथा सुधींद्र तीर्थ स्वामी और मठ की तिरुमला शाखा को संस्थान के दैनिक कामकाज व प्रबंधन में दखल देने से रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की थी।
तिरुपति की निचली अदालत ने 28 जनवरी 2009 को राघवेंद्र तीर्थ स्वामी का दावा पूरी तरह खारिज कर दिया था। अदालत ने उन पर मठ के प्रशासन में हस्तक्षेप करने पर स्थायी रोक लगाते हुए आदेश दिया था कि वे सभी देव-प्रतिमाएं, पूजा सामग्री, धार्मिक वस्तुएं और संस्थान की संपत्तियां सुधींद्र तीर्थ स्वामी को सौंप दें। इस आदेश को राघवेंद्र तीर्थ स्वामी ने हैदराबाद स्थित हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां भी 1 जून 2015 को उनकी अपील खारिज हो गई और निचली अदालत का फैसला बरकरार रहा।
अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति, स्थानांतरण और वसीयत पर तकरार
फैसले पर अमल की प्रक्रिया के दौरान राघवेंद्र तीर्थ स्वामी ने तिरुपति अदालत के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए। इसके बाद मामले की निष्पादन कार्यवाही को एर्नाकुलम की अतिरिक्त जिला अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया, जिस पर केरल हाईकोर्ट ने 5 सितंबर 2011 को अपनी मुहर लगाई थी।
कार्यवाही लंबित रहने के दौरान ही 16 जनवरी 2017 को सुधींद्र तीर्थ स्वामी का हरिद्वार में देहावसान हो गया। उन्होंने अपनी वसीयत के जरिए संयमींद्र तीर्थ स्वामी को अपना उत्तराधिकारी नामित किया था। राघवेंद्र तीर्थ स्वामी ने इस वसीयत की वैधता, उसके कानूनी प्रभाव और क्रियान्वयन पर आपत्ति जताते हुए उसे चुनौती दी।
इसके बाद संयमींद्र तीर्थ स्वामी ने एर्नाकुलम अदालत में अर्जी देकर दिवंगत स्वामी की जगह स्वयं को निष्पादन कार्यवाही में पक्षकार बनाने का आग्रह किया। हालांकि, एर्नाकुलम अदालत ने कहा कि उन्हें इसके लिए पहले मूल डिक्री पारित करने वाली तिरुपति अदालत से अनुमति लेनी होगी।
संयमींद्र तीर्थ स्वामी ने इस निर्देश को केरल हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 3 अगस्त 2026 के आदेश में एर्नाकुलम अदालत के निर्देश को निरस्त करते हुए संयमींद्र तीर्थ स्वामी को सीधे डिक्री धारक के रूप में कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपील खारिज किए जाने के साथ ही हाईकोर्ट का वह फैसला अब अंतिम रूप से मान्य हो गया है।

