अवैध निर्माण ढहाने में अड़ंगा लगाने पर कलकत्ता हाईकोर्ट सख्त, इमारत मालिक पर जुर्माना बढ़ाकर 1 लाख रुपये किया

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अनधिकृत बहुमंजिला इमारत को गिराए जाने की कार्रवाई में बार-बार कानूनी अड़चनें पैदा करने पर कड़ा रुख अपनाते हुए इमारत के मालिक पर 1 लाख रुपये का भारी जुर्माना लगाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बार-बार याचिकाएं लगाकर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को टालना अदालती प्रक्रिया का खुला दुरुपयोग है। इसके साथ ही अदालत ने अवैध निर्माण को नियमित करने की मांग वाली अपील खारिज कर दी।

जस्टिस शंपा सरकार और जस्टिस अर्जुन राय मुखर्जी की खंडपीठ ने यह आदेश इमारत मालिक मोहम्मद रफीक की अपील पर दिया। पीठ ने रफीक को 1 लाख रुपये का जुर्माना पश्चिम बंगाल राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के पास जमा कराने का निर्देश दिया है। यह राशि बाद में हाईकोर्ट की जुवेनाइल जस्टिस कमेटी के फंड में ट्रांसफर की जाएगी। इससे पहले एक सिंगल जज बेंच ने रफीक की याचिका खारिज करते हुए उन पर 20,000 रुपये की कॉस्ट लगाई थी, जिसे खंडपीठ ने बढ़ाकर 1 लाख रुपये कर दिया।

खंडपीठ ने अपने 14 सितंबर के आदेश में कहा कि अपीलकर्ता ने अदालत की गरिमा और सम्मान के प्रति घोर अनादर और उपेक्षा दिखाई है और अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है। अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि प्रशासनिक अधिकारियों ने इतना लंबा इंतजार क्यों किया, जबकि स्पष्ट अदालती आदेशों के बावजूद अवैध ढांचा अभी भी जस का तस खड़ा है। पीठ ने रेखांकित किया कि इमारत मालिक नगर निगम और हाईकोर्ट में लगातार अर्जियां दाखिल कर ध्वस्तीकरण प्रक्रिया में लगातार रुकावट डाल रहा था।

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नियमितीकरण की आड़ में अदालती आदेश को दरकिनार करने की कोशिश खारिज

सुनवाई के दौरान इमारत मालिक की ओर से पेश वरिष्ठ वकील किशोर दत्ता ने दलील दी कि जब नियमितीकरण की अर्जी लंबित थी, तब निगम ध्वस्तीकरण की कार्रवाई नहीं कर सकता था।

खंडपीठ ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने पूर्व में दिए गए ध्वस्तीकरण के आदेश से बचने के लिए बेहद चालाकी से नियमितीकरण की नई अर्जी लगाई थी। पीठ ने स्पष्ट किया कि सिंगल जज ने पहले ही अवैध हिस्से को गिराने का निर्देश दिया था और इमारत में रह रहे लोगों को केवल उनके लिखित वादे (अंडरटेकिंग) के आधार पर ही परिसर खाली करने के लिए समय दिया गया था।

निगम कर्मियों को विरोध और जान से मारने की धमकियों का सामना

कोलकाता नगर निगम की ओर से अदालत में पेश वकील विश्वजीत मुखर्जी ने बताया कि विवादित स्थल पर आंशिक ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई थी। हालांकि, इमारत मालिक, उसके आदमियों और एजेंटों के भारी विरोध के कारण पूरे अनधिकृत हिस्से को नहीं गिराया जा सका। उन्होंने अदालत को यह भी अवगत कराया कि ध्वस्तीकरण अभियान में जुटे निगम अधिकारियों को अपनी जान का खतरा बना हुआ है और उन्हें जान से मारने की धमकियां दी जा रही हैं।

मंजूरी से दोगुनी ऊंचाई और मुकदमों का कानूनी इतिहास

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यह विवाद स्वीकृत योजना के गंभीर उल्लंघन के बाद शुरू हुआ था। नगर निगम ने केवल ग्राउंड फ्लोर और उसके ऊपर तीन मंजिलों के निर्माण की अनुमति दी थी। इसके उलट मोहम्मद रफीक ने नियमों को ताक पर रखकर ग्राउंड फ्लोर के साथ छह मंजिलों का ढांचा खड़ा कर दिया। इसके बाद नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।

सिंगल जज ने 24 जून 2024 को स्थानीय पुलिस की मदद से कोलकाता नगर निगम को अवैध ढांचा पूरी तरह ध्वस्त करने का आदेश दिया था। इसके बाद इमारत के निवासियों ने हाईकोर्ट का रुख कर वैकल्पिक व्यवस्था करने के लिए दो महीने की मोहलत मांगी और हलफनामा दिया कि वे तय समय में जगह खाली कर देंगे। रफीक ने 24 जून के आदेश को खंडपीठ में चुनौती दी थी, लेकिन खंडपीठ ने उसकी अपील खारिज करते हुए 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया था।

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इसके बाद रफीक ने अतिरिक्त मंजिलों को नियमित कराने के लिए सिंगल जज के समक्ष एक और याचिका दायर की। सिंगल जज ने 16 सितंबर 2025 को इस याचिका को खारिज करते हुए राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण को 20,000 रुपये का हर्जाना भरने का निर्देश दिया। रफीक ने इसी आदेश के खिलाफ खंडपीठ में अपील कर गुहार लगाई थी कि नगर निगम को अतिरिक्त मंजिलों या उनके बचे हुए हिस्से को नियमित करने का निर्देश दिया जाए, जिसे अब खंडपीठ ने जुर्माना बढ़ाकर खारिज कर दिया है।

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