मोटर दुर्घटना दावा केवल उस जगह दाखिल नहीं किया जा सकता जहां बीमा कंपनी कारोबार करती हो: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया क्षेत्राधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर किसी मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) को क्षेत्राधिकार नहीं मिल जाता कि संबंधित बीमा कंपनी उस स्थान पर कारोबार करती है। मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166(2) की व्याख्या करते हुए जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें मोटर दुर्घटना दावा मामले को चेन्नई से चित्तूर ट्रिब्यूनल स्थानांतरित कर दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 166(2) में दावेदार के संबंध में उस स्थान को भी शामिल किया गया है जहां वह रहता है या कारोबार करता है। लेकिन प्रतिवादी के मामले में कानून केवल उस स्थान की बात करता है जहां वह रहता है। प्रतिवादी जहां कारोबार करता है, उस स्थान को क्षेत्राधिकार का आधार नहीं बनाया गया है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला 25 अक्टूबर 2022 की एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा था। अपीलकर्ता अपने भाई के साथ दोपहिया वाहन पर जा रहा था, तभी आंध्र प्रदेश के तिरुपति जिले में एक मिनी ट्रक ने उनके वाहन को टक्कर मार दी। दुर्घटना के बाद अपीलकर्ता का तिरुपति के एक अस्पताल में इलाज हुआ और उसके भाई ने येर्रावरिपालेम पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई।

अपीलकर्ता ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 के तहत चेन्नई के मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल में मुआवजे के लिए दावा दायर किया।

नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने ट्रिब्यूनल के क्षेत्राधिकार पर आपत्ति जताते हुए कहा कि मामले का कोई भी कारण चेन्नई की क्षेत्रीय सीमा में उत्पन्न नहीं हुआ था।

11 जुलाई 2025 को ट्रिब्यूनल ने बीमा कंपनी की आपत्ति खारिज कर दी। ट्रिब्यूनल का कहना था कि बीमा कंपनी चेन्नई में भी कारोबार करती है, इसलिए उसे मामले की सुनवाई का क्षेत्राधिकार प्राप्त है।

बीमा कंपनी ने इस आदेश को संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 16 मार्च 2026 को माना कि चेन्नई ट्रिब्यूनल के पास क्षेत्राधिकार नहीं था और मामले को चित्तूर ट्रिब्यूनल भेजने का निर्देश दिया। इसके बाद दावेदार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट में पक्षों की दलीलें

दावेदार की ओर से सीनियर एडवोकेट ए. सिराजुद्दीन ने दलील दी कि दावेदार चेन्नई में रह रहा था और वहीं काम भी कर रहा था, इसलिए धारा 166(2) के तहत चेन्नई में दावा दायर करना सही था।

उन्होंने यह भी कहा कि मोटर वाहन अधिनियम एक लाभकारी कानून है और इसकी व्याख्या दावेदारों के हितों की रक्षा करने वाले तरीके से की जानी चाहिए। बीमा कंपनी का चेन्नई में कार्यालय होने के कारण वहां मामले की सुनवाई से उसे कोई नुकसान भी नहीं होता। इस दलील के समर्थन में कलकत्ता हाईकोर्ट के National Insurance Co. Ltd. v. Alpana Jana & Others फैसले पर भरोसा किया गया।

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वहीं, बीमा कंपनी की ओर से एस.एल. गुप्ता ने कहा कि दुर्घटना तिरुपति में हुई थी और दावा आवेदन में दिए गए पते के अनुसार दावेदार चित्तूर जिले का निवासी था। ऐसे में चेन्नई में मामले का कोई कारण उत्पन्न नहीं हुआ और वहां के ट्रिब्यूनल को क्षेत्राधिकार नहीं था।

बीमा कंपनी क्षेत्राधिकार पर उठा सकती है आपत्ति

सुप्रीम कोर्ट ने दावेदार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि बीमा कंपनी चेन्नई में कार्यालय होने के कारण क्षेत्राधिकार पर आपत्ति नहीं उठा सकती थी।

United India Insurance Co. Ltd. v. Shila Datta & Others में तीन जजों की बेंच के फैसले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 166 के तहत दावा याचिका में बीमा कंपनी को प्रतिवादी बनाना अनिवार्य नहीं है। हालांकि, यदि दावेदार खुद बीमा कंपनी को पक्षकार बनाता है तो बीमा कंपनी कानून के तहत उपलब्ध सभी आधारों पर कार्यवाही का विरोध कर सकती है।

इसलिए मौजूदा मामले में बीमा कंपनी को ट्रिब्यूनल के क्षेत्राधिकार पर आपत्ति उठाने का अधिकार था।

कहां दाखिल किया जा सकता है मोटर दुर्घटना मुआवजा दावा?

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 166(2) की व्याख्या करते हुए कहा कि दावेदार के पास मुआवजा आवेदन दाखिल करने के लिए अलग-अलग विकल्प उपलब्ध हैं।

दावा उस ट्रिब्यूनल में दाखिल किया जा सकता है जिसके क्षेत्र में दुर्घटना हुई हो, जहां दावेदार रहता हो, जहां दावेदार कारोबार करता हो या जहां प्रतिवादी रहता हो।

कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि संसद ने दावेदार और प्रतिवादी के लिए अलग-अलग शब्दों का इस्तेमाल किया है। दावेदार के मामले में कानून उसके रहने और कारोबार करने, दोनों स्थानों की बात करता है। लेकिन प्रतिवादी के मामले में केवल उसके निवास स्थान का उल्लेख किया गया है।

“ट्रिब्यूनल के क्षेत्राधिकार को निर्धारित करते समय उस स्थान को विशेष रूप से छोड़ दिया गया है जहां प्रतिवादी कारोबार करता है।”

कोर्ट ने कहा कि धारा 166(2) की भाषा सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 20 से अलग है। धारा 20 CPC में वह स्थान भी क्षेत्राधिकार के लिए प्रासंगिक हो सकता है जहां प्रतिवादी कारोबार करता है, लेकिन मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166(2) में ऐसी व्यवस्था नहीं है।

इस संदर्भ में बीमा कंपनी ‘प्रतिवादी’ नहीं

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सुप्रीम कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि धारा 166(2) में इस्तेमाल किए गए शब्द ‘जहां प्रतिवादी रहता है’ का उद्देश्य बीमा कंपनी को प्रतिवादी के रूप में शामिल करना नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना दावा मामले में बीमा कंपनी को पक्षकार बनाना दावेदार की इच्छा पर निर्भर करता है और यह अनिवार्य नहीं है। दावा मामले में मुख्य प्रतिवादी सामान्य रूप से दुर्घटना करने वाले वाहन का मालिक और/या चालक होता है।

शुरुआत में उठी क्षेत्राधिकार की आपत्ति और अवॉर्ड के बाद की चुनौती में अंतर

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल के सामने शुरुआती चरण में क्षेत्राधिकार पर उठाई गई आपत्ति और अवॉर्ड पारित होने के बाद अपील में उठाई गई आपत्ति के लिए अलग-अलग परिस्थितियां लागू होती हैं।

यदि क्षेत्राधिकार की आपत्ति कार्यवाही के शुरुआती चरण में ट्रिब्यूनल के सामने उठाई जाती है तो धारा 166(2) की शर्तों को पूरा करना जरूरी होगा।

इसके विपरीत, यदि अवॉर्ड पारित होने के बाद अपीलीय स्तर पर क्षेत्राधिकार का मुद्दा उठाया जाता है तो CPC की धारा 21(1) के तहत यह भी दिखाना होगा कि क्षेत्राधिकार की कमी के कारण न्याय की विफलता हुई।

कोर्ट ने इस संदर्भ में Mantoo Sarkar v. Oriental Insurance Co. Ltd. and Others, Malati Sardar v. National Insurance Company Limited and Others और Balveer Batra v. The New India Assurance Company and Another के फैसलों पर चर्चा की। कोर्ट ने कहा कि उन मामलों में क्षेत्राधिकार की आपत्ति अपीलीय स्तर पर विचार के लिए आई थी, इसलिए CPC की धारा 21(1) लागू हुई थी।

मौजूदा मामले में बीमा कंपनी ने ट्रिब्यूनल के सामने ही शुरुआती चरण में आपत्ति उठा दी थी और मुआवजा दावा अभी मेरिट पर तय नहीं हुआ था। इसलिए मामले में धारा 166(2) की शर्तें लागू होंगी।

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चेन्नई में दावा दाखिल करने का कोई आधार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि दावा आवेदन में दावेदार ने अपना निवास चित्तूर बताया था। दुर्घटना तिरुपति जिले में हुई थी और ऐसा कोई उल्लेख नहीं था कि दावेदार किसी अन्य स्थान पर कारोबार करता था। दुर्घटना करने वाले वाहन का चालक भी चित्तूर जिले का निवासी बताया गया था।

इस आधार पर कोर्ट ने माना कि चेन्नई की क्षेत्रीय सीमा में मामले का कोई कारण उत्पन्न नहीं हुआ था और वहां के ट्रिब्यूनल को धारा 166(2) के तहत क्षेत्राधिकार प्राप्त नहीं था।

कोर्ट ने माना कि मोटर वाहन अधिनियम दुर्घटना से पैदा होने वाली कठिनाइयों को दूर करने के उद्देश्य वाला कानून है और इसकी व्याख्या इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। हालांकि, बेंच ने स्पष्ट किया:

“ऐसी व्याख्या स्वीकार नहीं की जा सकती जिसका कानून में कोई वैधानिक आधार न हो और उस व्याख्या को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो कानून की स्पष्ट भाषा के अनुरूप हो।”

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के 16 मार्च 2026 के आदेश को बरकरार रखा और चेन्नई ट्रिब्यूनल से पूरी कार्यवाही चित्तूर ट्रिब्यूनल भेजने के निर्देश को सही माना।

कोर्ट ने चित्तूर ट्रिब्यूनल को मुआवजा दावा कानून के अनुसार शीघ्र तय करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही अपील खारिज कर दी गई और लागत के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।

केस टाइटल: के. राशिक बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड एवं अन्य
केस नंबर: सिविल अपील नंबर 10706 ऑफ 2026
बेंच: जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
तारीख: 16 सितंबर 2026

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