जमीन मालिक के जरिए कब्जे का दावा करने वाले किरायेदार दूसरी रिट दाखिल कर कब्जे की सुरक्षा नहीं मांग सकते: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जमीन मालिक के जरिए संपत्ति पर कब्जे का दावा करने वाले किरायेदार उस स्थिति में कब्जे की सुरक्षा के लिए नई रिट याचिका दाखिल नहीं कर सकते, जब जमीन मालिक के खिलाफ हाईकोर्ट का पहले का फैसला बरकरार हो और उसके खिलाफ दाखिल विशेष अनुमति याचिका (SLP) वापस ली जा चुकी हो। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें किरायेदारों को बेदखली से संरक्षण देते हुए एम.ए. गार्डन फंक्शन हॉल का ताला खोलने का निर्देश दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट अपने पहले के डिवीजन बेंच के फैसले और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद दोबारा रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकता था, खासकर तब जब कब्जे और मालिकाना हक से जुड़ा विवाद सिविल कोर्ट के समक्ष उठाया जाना था।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद हैदराबाद के गगनमहल गांव में टी.एस. नंबर 19, वार्ड नंबर 54, ब्लॉक-एल स्थित 4,678 वर्ग मीटर जमीन से जुड़ा है। मेसर्स किशन चंद फाउंडेशन ट्रस्ट ने वर्ष 1968 में अपने पक्ष में हुई रजिस्टर्ड सेल डीड के आधार पर जमीन पर मालिकाना हक का दावा किया था।

जून 1997 में मंडल राजस्व अधिकारी, हिमायतनगर ने आंध्र प्रदेश लैंड एनक्रोचमेंट एक्ट, 1905 की धारा 7 के तहत ट्रस्ट को नोटिस जारी कर पूछा था कि उसे जमीन से बेदखल क्यों न किया जाए।

ट्रस्ट ने 1997 में सिविल मुकदमा दाखिल किया, जिसे जुलाई 2001 में आर्थिक क्षेत्राधिकार के आधार पर खारिज कर दिया गया। इसके बाद दायर अपील भी अगस्त 2002 में पैरवी नहीं किए जाने के कारण खारिज हो गई। इसके बाद अधिकारियों ने 1905 के कानून की धारा 6 के तहत कार्यवाही शुरू कर ट्रस्ट को जमीन का कब्जा सौंपने का निर्देश दिया।

ट्रस्ट ने इस कार्यवाही को हाईकोर्ट में चुनौती दी। अप्रैल 2005 में सिंगल जज ने उसकी रिट याचिका स्वीकार करते हुए कानून की धारा 6 और 7 के तहत जारी नोटिस और आदेश को रद्द कर दिया।

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ट्रस्ट के खिलाफ आया था डिवीजन बेंच का फैसला

राज्य सरकार ने सिंगल जज के फैसले को चुनौती दी। 7 सितंबर 2022 को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य की रिट अपील स्वीकार करते हुए सिंगल जज का आदेश रद्द कर दिया।

डिवीजन बेंच ने पाया था कि जमीन के कब्जे को लेकर गंभीर विवाद था और राज्य का दावा था कि यह सरकारी जमीन है। ऐसे विवादित सवालों का फैसला रिट कार्यवाही में नहीं किया जा सकता।

डिवीजन बेंच की टिप्पणी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में उद्धृत किया:

“संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट कोर्ट किसी व्यक्ति के कब्जे या मालिकाना हक की घोषणा करने का मंच नहीं है, खासकर तब जब तथ्यों को लेकर गंभीर विवाद मौजूद हों।”

ट्रस्ट ने 2022 के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। 26 सितंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों को विवादित संपत्ति के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया।

हालांकि, 9 सितंबर 2025 को ट्रस्ट को नई सिविल वाद दाखिल करने की स्वतंत्रता के साथ SLP वापस लेने की अनुमति दे दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने अपने मौजूदा फैसले में खास तौर पर दर्ज किया कि SLP वापस लेने की अनुमति देते समय ट्रस्ट को आगे कोई अंतरिम संरक्षण नहीं दिया गया था।

इसके बाद किरायेदार पहुंचे हाईकोर्ट

इसके तुरंत बाद एम.ए. गार्डन फंक्शन हॉल की ओर से मोहम्मद ओमेर और दो अन्य तथा मोहम्मद वासिक वहाज उद्दीन ने खुद को ट्रस्ट का किरायेदार बताते हुए हाईकोर्ट में दो रिट याचिकाएं दाखिल कीं। उन्होंने परिसर का कब्जा लेने की राज्य अधिकारियों की कार्रवाई को चुनौती दी।

12 सितंबर 2025 को सिंगल जज ने ट्रस्ट को सुप्रीम कोर्ट से मिली स्वतंत्रता के अनुसार दस दिनों के भीतर नया सिविल मुकदमा दाखिल करने की अनुमति दी। इस दौरान अधिकारियों को रिट याचिकाकर्ताओं को संपत्ति से बेदखल नहीं करने का निर्देश दिया गया।

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सिंगल जज ने मंडल राजस्व अधिकारी को एम.ए. गार्डन फंक्शन हॉल का ताला खोलने का भी निर्देश दिया। ट्रस्ट को दस दिनों के भीतर सिविल कोर्ट जाकर उचित अंतरिम राहत मांगने की स्वतंत्रता दी गई। ऐसा नहीं करने पर राज्य अधिकारियों को कानून के अनुसार कार्रवाई की छूट दी गई थी।

राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ अपील की, लेकिन हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 30 दिसंबर 2025 को अपीलें खारिज कर सिंगल जज के आदेश को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि 16 सितंबर 2025 को सिविल मुकदमा दाखिल कर दिया गया था, लेकिन निर्धारित दस दिनों की अवधि के भीतर ट्रायल कोर्ट ने कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह सिंगल जज द्वारा दी गई स्वतंत्रता का दस दिनों की अवधि के भीतर प्रभावी रूप से लाभ नहीं उठाया गया।

बेंच ने कहा कि ट्रस्ट की SLP वापस लिए जाने के बाद 7 सितंबर 2022 का डिवीजन बेंच का फैसला बरकरार रहा। ट्रस्ट को केवल नया सिविल मुकदमा दाखिल करने की स्वतंत्रता मिली थी। ऐसी स्थिति में ट्रस्ट के जरिए कब्जे का दावा करने वाले किरायेदार उसी कब्जे की सुरक्षा के लिए नई रिट कार्यवाही शुरू नहीं कर सकते थे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“सिंगल जज और डिवीजन बेंच पहले डिवीजन बेंच और इस कोर्ट द्वारा पारित आदेशों के विपरीत रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे।”

कोर्ट ने आगे कहा:

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“जब हाईकोर्ट पहले ही रिट अपील नंबर 1243/2005 में यह निष्कर्ष दर्ज कर चुका था कि रिट कोर्ट के लिए कब्जे के संबंध में निष्कर्ष दर्ज करना उचित नहीं था, तब केवल कब्जे की सुरक्षा के लिए किरायेदारों द्वारा दाखिल दूसरी रिट याचिका पर विचार नहीं किया जाना चाहिए था।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी गौर किया कि ट्रस्ट की SLP वापस लिए जाने के कुछ ही समय बाद किरायेदारों ने नई रिट याचिकाएं दाखिल की थीं।

बेंच ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि ट्रस्ट खुद नई रिट याचिका दाखिल नहीं कर सकता था, इसलिए किरायेदार अंतरिम आदेश हासिल करने के लिए आगे आए। पहले के डिवीजन बेंच के निष्कर्षों को देखते हुए ऐसी अंतरिम राहत पर सिविल कोर्ट ही विचार कर सकता था।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अपीलें स्वीकार करते हुए सिंगल जज के 12 सितंबर 2025 के आदेश और डिवीजन बेंच के 30 दिसंबर 2025 के फैसले को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने परिसर में ताला लगाने की राज्य सरकार की कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि सिविल मुकदमा पहले ही दाखिल हो चुका है और ट्रायल कोर्ट के समक्ष लंबित है। बेंच ने स्पष्ट किया कि सिविल मुकदमे का फैसला उसके अपने गुण-दोष के आधार पर किया जाएगा।

केस टाइटल: द स्टेट ऑफ तेलंगाना एंड अदर्स बनाम एम.ए. गार्डन फंक्शन हॉल एंड अदर्स आदि

केस नंबर: सिविल अपील नंबर 12895-12896/2026

बेंच: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर

तारीख: 16 सितंबर 2026

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