नशे की हालत में कोर्ट पहुंचने, जज पर चिल्लाने और कार्यवाही बाधित करने पर वकील को कर्नाटक हाईकोर्ट ने आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया

कर्नाटक हाईकोर्ट ने करवार की एक अदालत में नशे की हालत में पहुंचने, पीठासीन अधिकारी पर चिल्लाने और चल रही अदालती कार्यवाही में बाधा डालने के मामले में एक वकील को आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया है। जस्टिस अनु सिवारमन और जस्टिस वेंकटेश नाइक टी की बेंच ने वकील को कोर्ट उठने तक एक दिन के साधारण कारावास की सजा सुनाई और उस पर 2,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।

अवमानना की कार्यवाही अप्रैल 2022 की दो घटनाओं से जुड़ी थी। वकील एक घरेलू हिंसा के मामले में पार्टी-इन-पर्सन के रूप में एडिशनल सिविल जज एवं JMFC-II, करवार की अदालत में पेश हो रहा था।

केस लिस्ट में नहीं था, फिर भी कोर्ट पहुंचकर जज पर चिल्लाया

8 अप्रैल 2022 को वकील का मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं था। इसके बावजूद वह अदालत पहुंचा और पीठासीन अधिकारी पर यह कहते हुए चिल्लाने लगा कि उसके मामले में तारीख नहीं दी गई है। उसने केस नहीं पुकारने को लेकर बेंच क्लर्क पर भी चिल्लाया।

फैसले के मुताबिक, चेतावनी दिए जाने के बावजूद उसने अपना व्यवहार जारी रखा। उसने पीठासीन अधिकारी पर आरोप लगाया कि उन्होंने घरेलू हिंसा के मामले में उसकी पत्नी से पैसे लिए और उसके पक्ष में आदेश पारित किए। इस घटना की जानकारी प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज, करवार को दी गई।

इसके तीन दिन बाद, 11 अप्रैल को वकील ने माफीनामा दिया। उसने कहा कि उसका इरादा अदालत को ठेस पहुंचाने या परेशानी पैदा करने का नहीं था। उसने हुई असुविधा पर खेद जताते हुए अपने खिलाफ शिकायत वापस लेने का अनुरोध किया।

शराब पीकर दोबारा कोर्ट पहुंचा, वकील की बहस बीच में रोकी

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20 अप्रैल को दोपहर करीब 3.30 बजे एक और घटना हुई। सीनियर काउंसल के.आर. देसाई अदालत में बहस कर रहे थे। इसी दौरान वकील ने बीच में उनकी बहस रोक दी और अपमानजनक लहजे में उनसे कहा कि वे अपनी बहस बंद करें ताकि उसका मामला लिया जा सके।

पीठासीन अधिकारी के हस्तक्षेप के बावजूद उसने उनकी बात नहीं मानी और चिल्लाने लगा। फैसले के अनुसार, उसके मुंह से शराब की गंध आ रही थी और वह अस्थिर था। इसके बाद उसे मेडिकल जांच के लिए सिविल हॉस्पिटल, करवार भेजा गया। कार्यवाही के दौरान करवार इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज द्वारा जारी नशे से संबंधित प्रमाणपत्र को भी साक्ष्य के रूप में पेश किया गया।

न्यायिक अधिकारी ने हाईकोर्ट के समक्ष यह भी कहा कि पहले माफी मांगने और खेद जताने के बावजूद वकील ने दोबारा अदालती कार्यवाही में हस्तक्षेप किया और गैर-पेशेवर व्यवहार किया।

वकील ने आपराधिक अवमानना के आरोपों से किया इनकार

वकील ने कार्यवाही का विरोध करते हुए कहा कि उसने आपराधिक अवमानना नहीं की। उसका तर्क था कि शराब पीने के आरोप को 8 अप्रैल की घटना से गलत तरीके से जोड़ा गया, जबकि नशे से संबंधित प्रमाणपत्र 20 अप्रैल का था।

उसने यह भी कहा कि वह 18 वर्षों से करवार की अदालतों में प्रैक्टिस कर रहा था। उसने बताया कि वह 35 वर्षों से अधिक समय से मिर्गी से पीड़ित है और कभी-कभी उसे स्ट्रोक और दौरे पड़ते हैं। उसने यह भी कहा कि उसकी 75 वर्षीय मां बिस्तर पर हैं और उनकी देखभाल करने वाला वही अकेला है। वकील ने आरोप लगाया कि उसे परेशान करने के उद्देश्य से जानबूझकर अवमानना की कार्यवाही शुरू की गई और इसे खारिज करने की मांग की।

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हाईकोर्ट ने माना, आचरण आपराधिक अवमानना के दायरे में

हाईकोर्ट ने Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 2(c) पर विचार किया। यह प्रावधान अदालत की गरिमा को कम करने, न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने या न्याय प्रशासन में बाधा डालने वाले कृत्यों को आपराधिक अवमानना के दायरे में लाता है।

बेंच ने Rajendra Sail v. M.P. High Court Bar Association, Prashant Bhushan and another, In Re और Vijay Kurle, In Re में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख किया। हाईकोर्ट ने इन फैसलों के आधार पर निष्पक्ष आलोचना की सीमा और न्यायपालिका को बदनाम करने या न्यायिक व्यवस्था में जनता के विश्वास को कमजोर करने वाले आचरण पर विचार किया।

साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने वकील के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित पाया।

बेंच ने कहा:

“उसने न्यायिक अधिकारियों के साथ-साथ कोर्ट के जजों के खिलाफ अपमानजनक, निंदात्मक और निराधार बयान देकर कोर्ट के समक्ष गंभीर अवमानना की है।”

हाईकोर्ट ने अवमानना की कार्यवाही के दौरान उसके व्यवहार पर भी गौर किया और कहा:

“शुरुआती आपराधिक अवमानना पर किसी तरह का पश्चाताप व्यक्त करने के बजाय उसने अपने कृत्यों को सही ठहराने की कोशिश की और पूरी न्यायिक संस्था के खिलाफ निंदात्मक और निराधार बयान देना जारी रखा।”

एक दिन की जेल और 2,000 रुपये का जुर्माना

हाईकोर्ट ने आरोपों को साबित पाते हुए वकील को Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 12(1) के तहत आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया।

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सजा पर सुनवाई के दौरान बेंच ने दर्ज किया कि वकील ने कोई खेद व्यक्त नहीं किया और अपने रुख पर कायम रहा। कोर्ट ने यह भी कहा कि सजा कम करने के लिए कोई परिस्थिति नहीं बताई गई। अवमानना की गंभीरता, उसके आचरण, उम्र और पेशे को देखते हुए हाईकोर्ट ने उसे कोर्ट उठने तक एक दिन के साधारण कारावास की सजा सुनाई और 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया, जिसे 15 दिनों के भीतर जमा करना होगा।

जुर्माना नहीं चुकाने पर उसे एक दिन का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा। हाईकोर्ट ने उसे सजा भुगतने के लिए तत्काल हिरासत में लेने का निर्देश दिया और रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) को High Court of Karnataka (Contempt of Court Proceedings) Rules, 1981 के नियम 16 के तहत दोषसिद्धि वारंट जारी करने का आदेश दिया।

केस टाइटल: High Court of Karnataka v. Pankaj Kaushik
केस नंबर: Criminal Contempt Petition No. 10 of 2022
बेंच: जस्टिस अनु सिवारमन और जस्टिस वेंकटेश नाइक टी
तारीख: 11 सितंबर 2026

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