सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी में छात्र प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस ज्यादतियों और हिंसा की पड़ताल के लिए गठित पांच सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति (एचपीईसी) के पुनर्गठन से इनकार कर दिया है। अदालत ने समिति की निष्पक्षता पर उठाए गए सवालों को खारिज करते हुए कहा कि यह याचिका पूरी तरह से निराधार आशंकाओं और पहले से तय पूर्वाग्रहों पर आधारित है।
पीठ ने कहा—जांच शुरू होने से पहले सवाल उठाना अनुचित
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने 10 सितंबर को पारित अपने आदेश में स्पष्ट किया कि समिति का गठन किसी एक पक्ष का पक्षपोषण करने के लिए नहीं, बल्कि निष्पक्षता, पारदर्शिता और तटस्थ दृष्टिकोण के साथ शीर्ष अदालत का सहयोग करने के लिए किया गया है। मंगलवार को सार्वजनिक किए गए इस आदेश में पीठ ने कहा कि जब समिति ने अभी अपनी जांच शुरू भी नहीं की है, तब केवल अनुमानों और कयासों के आधार पर उसकी संरचना में बदलाव करने का कोई औचित्य नहीं है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि इस समिति का गठन सदस्यों की व्यक्तिगत विशेषज्ञता, लंबे अनुभव और विविधता जैसे कई महत्वपूर्ण पहलुओं को ध्यान में रखकर किया गया है। पीठ ने भरोसा जताया कि समिति की सिफारिशें अदालत के लिए अत्यंत मूल्यवान साबित होंगी।
गवाहों को पुख्ता सुरक्षा और विशेष ऑनलाइन पोर्टल का निर्देश
जांच प्रक्रिया में गवाहों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने समिति को निर्देश दिया कि बयान दर्ज कराने के लिए आगे आने वाले संवेदनशील गवाहों को आवश्यक सुरक्षा दी जाए और उनकी पहचान को पूरी तरह गोपनीय रखा जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि गवाहों द्वारा दिए गए बयानों और सौंपे गए साक्ष्यों पर पूर्ण गोपनीयता बरती जानी चाहिए।
गवाहों और अन्य संबंधित पक्षों को अपने दस्तावेज व साक्ष्य सुरक्षित रूप से जमा करने की सुविधा देने के लिए अदालत ने एक अलग ऑनलाइन पोर्टल तैयार करने का सुझाव दिया। इसके अलावा, पीठ ने सीनियर एडवोकेट मोनिका गुसाईं और एडवोकेट सी. सोलोमन को समिति के प्रतिनिधि के रूप में अदालत की सहायता करने और दोनों पक्षों के बीच एक स्वतंत्र मध्यस्थ के रूप में कार्य करने की जिम्मेदारी सौंपी। समिति को अपने प्रशासनिक और लॉजिस्टिक कार्यों को सुचारू बनाने के लिए जल्द से जल्द एक सदस्य सचिव नियुक्त करने का भी निर्देश दिया गया।
हितों के टकराव के आरोप खारिज
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने समिति के एक सदस्य और पूर्व आईपीएस अधिकारी पर सवाल उठाए थे। भूषण ने दलील दी थी कि पूर्वोत्तर राज्य मेघालय के पूर्व डीजीपी एल. आर. बिश्नोई हितों के टकराव के दायरे में आते हैं, क्योंकि वे उस वरिष्ठ अधिकारी के करीबी मित्र हैं जिनकी भूमिका इस मामले में जांच के दायरे में आ सकती है।
सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने भी इस आपत्ति का समर्थन किया। दूसरी ओर, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन आपत्तियों का कड़ा विरोध करते हुए अदालत से ऐसे दावों को पूरी तरह नजरअंदाज करने और समिति को काम जारी रखने देने का आग्रह किया।
समिति की संरचना और जांच का दायरा
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता वाली यह समिति प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल, महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार व लक्षित हिंसा, दोनों पक्षों की ओर से की गई संपत्ति की तोड़फोड़ और पुलिसकर्मियों के खिलाफ हुई हिंसा के तमाम पहलुओं की समग्र जांच करेगी।
इस पांच सदस्यीय समिति में जस्टिस रेड्डी और मेघालय के पूर्व डीजीपी एल. आर. बिश्नोई के अलावा पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रवि शंकर झा, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व जज शालिंडर कौर और सीबीआई के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला शामिल हैं।
प्रदर्शन और विवाद की पृष्ठभूमि
यह न्यायिक जांच 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संसद मार्च के दौरान भड़की झड़पों से जुड़ी है। उस दौरान प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाबलों ने लाठीचार्ज किया था और आंसू गैस के गोले दागे थे।
छात्रों का यह आंदोलन 20 जून को जंतर-मंतर पर शुरू हुआ था। इसके बाद तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के अपने पद से इस्तीफा देने और केंद्र सरकार द्वारा आंदोलनकारियों की शेष मांगें स्वीकार किए जाने के बाद 25 जुलाई को यह धरना समाप्त घोषित किया गया था।

