उड़ीसा हाईकोर्ट ने मेडिकल असेसमेंट बोर्ड के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें ‘बीटा थैलेसीमिया ट्रेट’ से पीड़ित एक नीट (NEET) अभ्यर्थी को दिव्यांग मानने से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने सक्षम अधिकारियों को एक नया मेडिकल बोर्ड गठित कर छात्रा की दिव्यांगता के प्रतिशत का नए सिरे से आकलन करने का आदेश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश हरीश टंडन और जस्टिस चितरंजन दास की खंडपीठ ने 10 सितंबर को यह आदेश जारी किया। पीठ नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (नीट) में दिव्यांग कोटे के तहत प्रवेश की मांग करने वाली एक छात्रा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण निदेशक (DMET), ओडिशा को निर्देश दिया कि वे एक नया मेडिकल असेसमेंट बोर्ड बनाएं। इसके साथ ही याचिकाकर्ता को नए बोर्ड के समक्ष पेश होने को कहा गया है, ताकि मेडिकल पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए उसकी पात्रता तय की जा सके।
निर्दिष्ट दिव्यांगता और कानूनी दायरे पर हाईकोर्ट का रुख
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि मेडिकल असेसमेंट बोर्ड का निष्कर्ष दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के मूल प्रावधानों और भावना के विपरीत है। पीठ ने कहा कि जब कानून के तहत किसी बीमारी को ‘निर्दिष्ट दिव्यांगता’ (स्पेसिफाइड डिसेबिलिटी) की श्रेणी में शामिल कर लिया गया है, तब मेडिकल बोर्ड का काम सिर्फ उसी दायरे में रहकर जांच करना है। बोर्ड अपनी तय सीमाओं से बाहर जाकर किसी अन्य दिव्यांगता श्रेणी के मानक थोपकर प्रमाण पत्र देने से इनकार नहीं कर सकता।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि मेडिकल बोर्ड का निष्कर्ष लोकोमोटर दिव्यांगता (शारीरिक गतिशीलता संबंधी अक्षमता) के मानकों पर आधारित था, जबकि थैलेसीमिया शरीर की सामान्य गतिशीलता को प्रभावित नहीं करता। ऐसे में इस आधार पर छात्रा के दावे को खारिज करना गलत था। खंडपीठ ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) के स्थान पर गठित बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की 13 मई 2019 की अधिसूचना का भी संदर्भ दिया, जिसके तहत थैलेसीमिया को निर्दिष्ट दिव्यांगता की सूची में रखा गया है और मेडिकल दाखिले के लिए प्रतिशत आधारित पात्रता मानदंड तय किए गए हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ने सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी 40 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता प्रमाण पत्र के आधार पर नीट में दिव्यांग श्रेणी के तहत आवेदन किया था। बाद में जांच के लिए उसे राज्य के मेडिकल बोर्ड के पास भेजा गया। हालांकि, बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि छात्रा ‘बीटा थैलेसीमिया ट्रेट’ से पीड़ित है, जो एक लक्षणहीन वाहक स्थिति (असिम्प्टोमैटिक कैरियर स्टेट) है और इससे शरीर की कार्यक्षमता पर कोई गंभीर प्रभाव नहीं पड़ता। इसी आधार पर बोर्ड ने उसे दिव्यांगता प्रमाण पत्र के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था।
बीटा थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रक्त विकार है, जो शरीर में हीमोग्लोबिन बनाने के लिए आवश्यक मुख्य प्रोटीन के निर्माण को बाधित करता है।
छात्रा ने इससे पहले भी मेडिकल बोर्ड के रुख को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अदालत ने 20 अगस्त को उसे ओडिशा संयुक्त प्रवेश परीक्षा (OJEE), 2026 के अध्यक्ष के समक्ष अभ्यावेदन देने की अनुमति दी थी। इसके बाद अपीलीय प्राधिकारी ने नोटिस जारी कर यह कह दिया कि छात्रा 2016 के अधिनियम के तहत आरक्षण लाभ पाने की हकदार नहीं है। इसके बाद छात्रा ने दोबारा खंडपीठ का दरवाजा खटखटाया, जिस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की पुरानी रिपोर्ट को निरस्त कर दिया और नए सिरे से जांच कराने के निर्देश दिए।

