उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के प्रस्तावित स्टिंग ऑपरेशन से जुड़े मामले में एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज रंगदारी और आपराधिक साजिश का 2018 का मुकदमा पूरी तरह से खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) में संबंधित व्यक्ति के खिलाफ किसी ठोस अपराध या विशिष्ट भूमिका का कोई उल्लेख नहीं था, और न ही पुलिस जांच में उसके खिलाफ कोई आपत्तिजनक साक्ष्य मिला।
न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ ने 8 सितंबर को यह आदेश जारी किया। पीठ ने रेखांकित किया कि सिर्फ प्राथमिकी में नाम दर्ज हो जाने मात्र से किसी भी व्यक्ति पर आपराधिक मुकदमा चलाने का कोई औचित्य नहीं बनता, विशेष रूप से तब जब जांच एजेंसियां उसके खिलाफ कोई भी प्रथम दृष्टया सबूत जुटाने में विफल रही हों।
जांच में नहीं मिला कोई आपत्तिजनक साक्ष्य
अदालत में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के अपर शासकीय अधिवक्ता अक्षय लटवाल ने स्वयं स्वीकार किया कि मामले की जांच 10 अलग-अलग जांच अधिकारियों द्वारा की गई, लेकिन याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी प्रकार का आपत्तिजनक साक्ष्य या सामग्री नहीं मिली।
राज्य पुलिस ने इस मामले में अपनी प्राथमिक जांच पूरी करते हुए 25 मार्च 2019 को ही समाचार चैनल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) समेत दो अन्य लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर दिया था। उस आरोप पत्र में याचिकाकर्ता का नाम बतौर अभियुक्त शामिल नहीं किया गया था। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि जब कई साल पहले जांच पूरी हो चुकी है और व्यक्ति के खिलाफ कोई सुबूत नहीं है, तो उसे अनावश्यक रूप से लंबे समय तक आपराधिक मुकदमे की अनिश्चितता और प्रताड़ना झेलने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।
2018 का पूरा विवाद और आरोप
यह मामला वर्ष 2018 में देहरादून के राजपुर थाने में दर्ज कराई गई एक एफआईआर से जुड़ा है। यह शिकायत ‘समाचार प्लस’ समाचार चैनल के एक रिपोर्टर द्वारा दर्ज कराई गई थी। रिपोर्टर का आरोप था कि चैनल के सीईओ ने उसे तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का स्टिंग ऑपरेशन करने का निर्देश दिया था।
शिकायतकर्ता के अनुसार, चैनल प्रमुख ने उसे बताया था कि याचिकाकर्ता उन लोगों में शामिल है जो मुख्यमंत्री से उसकी मुलाकात तय कराने में मदद कर सकते हैं। रिपोर्टर ने मुख्यमंत्री से मुलाकात तो की, लेकिन डर और संशय की वजह से उसने स्टिंग ऑपरेशन नहीं किया। इसके बाद रिपोर्टर ने आरोप लगाया कि चैनल के सीईओ और याचिकाकर्ता ने उसे धमकी दी कि यदि उसने स्टिंग नहीं किया तो उसका करियर बर्बाद कर दिया जाएगा और जान से मार दिया जाएगा। इस शिकायत पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 386, 388 (रंगदारी) और आपराधिक साजिश के तहत मामला दर्ज किया था।
रंगदारी और साजिश का कोई आधार नहीं: अदालत
याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए एफआईआर रद्द करने की गुहार लगाई गई थी। दलील दी गई कि उसने न तो किसी को धमकाया और न ही पैसे की कोई मांग की।
मामले के सभी पहलुओं पर विचार करते हुए न्यायमूर्ति आलोक महरा ने कहा कि शिकायत के तथ्यों को यदि जस का तस भी स्वीकार कर लिया जाए, तब भी याचिकाकर्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 386 या 388 के तहत जबरन वसूली या आपराधिक षड्यंत्र का कोई तत्व साबित नहीं होता।
अदालत ने कहा कि केवल यह कह देना कि किसी व्यक्ति ने तत्कालीन मुख्यमंत्री से मुलाकात कराने में सहायता की बात कही थी, किसी भी रूप में रंगदारी, भय पैदा करने या साजिश में भागीदारी का अपराध नहीं माना जा सकता। जब तक व्यक्ति द्वारा किसी ठोस कृत्य या अपराध को अंजाम देने का प्रमाण न हो, तब तक सिर्फ प्राथमिकी में नाम होने के आधार पर मुकदमा चलाना न्यायसंगत नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के विरुद्ध लंबित आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह निरस्त कर दिया।

