माँ के त्याग का हवाला देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने पिता को दिए दो बच्चों की कस्टडी सौंपने के आदेश

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दो नाबालिग बच्चों की अंतरिम कस्टडी उनकी माँ को सौंपने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सत्र अदालत के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें बच्चों को पिता के पास रखने की अनुमति दी गई थी। 3 सितंबर को जारी अपने आदेश में जस्टिस राजेश एस. पाटिल ने पिता को निर्देश दिया कि वह 9 सितंबर तक दोनों बच्चों को उनकी माँ के सुपुर्द करे। अदालत ने मामले के अंतिम निपटारे तक पिता को प्रत्येक रविवार बच्चों से मिलने का अधिकार दिया है।

बच्चों की भलाई और पारिवारिक माहौल

यह विवाद 12 वर्षीय बेटी और 6 वर्षीय बेटे की कस्टडी से जुड़ा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों के बेहतर भविष्य और स्वस्थ परिवेश के लिए उनका माँ के पास रहना आवश्यक है। जस्टिस पाटिल ने कहा कि 12 वर्ष की उम्र में बेटी किशोरावस्था की दहलीज पर है और 6 साल के छोटे बेटे को भी माँ की देखरेख और साथ की सख्त जरूरत है।

अदालत ने दोनों बच्चों से बातचीत करने के बाद यह पाया कि पिता ने उन्हें सिखा-पढ़ाकर बयान देने के लिए तैयार किया था। इसके अलावा कोर्ट ने बच्चों के दादा-दादी से भी मुलाकात की और उन्हें काफी असहाय पाया। फैसले का एक अहम आधार यह भी बना कि पति ने खुद स्टाम्प पेपर पर विवाहेत्तर संबंध होने की बात लिखित में स्वीकार की थी। हाईकोर्ट ने माना कि ऐसे हालात में यह नहीं कहा जा सकता कि पिता के पास बच्चों को एक स्वस्थ घरेलू माहौल मिल रहा है।

माँ के संघर्ष और समर्पण पर अदालत की टिप्पणी

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जस्टिस पाटिल ने अपने फैसले में महाराष्ट्र के बीड जिले की 47 वर्षीय रमाबाई रणवीर के संघर्ष का उल्लेख किया। रमाबाई ने अपनी बेटी की पढ़ाई के खर्च जुटाने के लिए दौड़ प्रतियोगिता में तीन किलोमीटर दौड़कर 3,000 रुपये का नकद पुरस्कार जीता था।

इस घटना का संदर्भ देते हुए जस्टिस पाटिल ने कहा कि यह उदाहरण याद दिलाता है कि बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा के लिए माँ का संघर्ष केवल अदालत के समक्ष पेश किए गए कागजी आंकड़ों में नहीं दिखता। उन्होंने कहा कि इन आंकड़ों के पीछे सीमित संसाधनों के बीच भोजन, छत, शिक्षा और गरिमापूर्ण जीवन की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने का निरंतर प्रयास छिपा होता है। अदालत उन व्यावहारिक सच्चाइयों से आंखें नहीं मूंद सकती, जहां एक महिला अपने बच्चों का भविष्य संवारने के साथ-साथ अपने दैनिक अस्तित्व की जरूरतों से भी जूझती है।

वित्तीय स्थिति और दोनों पक्षों के तर्क

हाईकोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि माँ आर्थिक लाभ या भरण-पोषण पाने के उद्देश्य से कस्टडी नहीं मांग रही है, क्योंकि उसने पति से अपने या बच्चों के लिए किसी भी तरह के गुजारा भत्ते या एलिमनी की मांग नहीं की है। महिला ने हाल ही में एक कंपनी में 13,000 रुपये प्रति माह के वेतन पर नौकरी शुरू की है।

माँ के वकील आवेश घाडगे ने दलील दी कि महिला अपने माता-पिता और दो विवाहित भाइयों के साथ एक संयुक्त परिवार में रह रही है। दोनों भाइयों ने अदालत में मौखिक रूप से यह वचन दिया कि वे अपनी बहन और दोनों बच्चों की भावनात्मक तथा आर्थिक जिम्मेदारी पूरी तरह उठाएंगे। इसके अलावा उनके अपने बच्चों की उम्र भी लगभग इतनी ही है, जिससे बच्चों को ननिहाल में भाई-बहनों और रिश्तेदारों का अच्छा साथ मिलेगा।

महिला ने यह भी आरोप लगाया था कि दोनों बच्चे पहले सीबीएसई स्कूल में पढ़ रहे थे, लेकिन अलग रहने के बाद पति ने उन्हें वहां से निकालकर स्टेट बोर्ड स्कूल में दाखिल करा दिया। महिला का आरोप था कि पति शराब पीने का आदी है और उसके विवाहेत्तर संबंध हैं।

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दूसरी ओर पति के वकील विजय वी. पाटिल ने शराब की लत और अवैध संबंधों के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने तर्क दिया कि बच्चे पिता और दादा-दादी के साथ खुशी से रह रहे हैं और उनका मौजूदा स्कूल घर से महज 100 से 150 मीटर की दूरी पर है। पति का यह भी दावा था कि पत्नी के पास बच्चों की पढ़ाई और अन्य खर्च उठाने के पर्याप्त साधन नहीं हैं।

निचली अदालतों के फैसलों की पृष्ठभूमि

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यह मामला घरेलू हिंसा कानून के तहत दायर शिकायत और बच्चों की अंतरिम कस्टडी की अर्जी से शुरू हुआ था। शुरुआत में न्यायिक मजिस्ट्रेट ने बच्चों से बातचीत करने के बाद अंतरिम कस्टडी माँ को सौंपने का आदेश दिया था।

पति ने इस फैसले को सत्र अदालत में चुनौती दी। सत्र अदालत ने मजिस्ट्रेट के आदेश को पलटते हुए अंतरिम कस्टडी पिता को सौंप दी थी और माँ को केवल मिलने का अधिकार दिया था। सत्र अदालत का मानना था कि पति पर लगे विवाहेत्तर संबंध के आरोपों से अंतरिम कस्टडी के अधिकार पर असर नहीं पड़ता। इसके बाद महिला ने सत्र अदालत के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दायर की, जिस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने माँ के पक्ष में फैसला सुनाया।

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