पत्नी के ‘पवित्र कर्तव्य’ और ‘बहू’ की भूमिका पर रूढ़िवादी टिप्पणियों से बचें जज: बॉम्बे हाईकोर्ट

वैवाहिक और बच्चों की कस्टडी से जुड़े विवादों में जजों द्वारा नैतिक उपदेश देने पर कड़ा ऐतराज जताते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पुणे की फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आठ वर्षीय बेटे की अंतरिम कस्टडी मां के बजाय सिंगापुर में रहने वाले पिता को सौंपने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस आशीष एस. चव्हाण की पीठ ने स्पष्ट किया कि जजों को पत्नी के कथित “पवित्र कर्तव्यों” या “बहू” के रूप में उसके अपेक्षित आचरण से जुड़ी रूढ़िवादी धारणाओं पर आधारित गैर-जरूरी और प्रतिगामी टिप्पणियों से बचना चाहिए। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 12 के तहत वैवाहिक दायित्वों के नैतिक मूल्यांकन या आर्थिक संपन्नता के बजाय केवल बच्चे का कल्याण ही सर्वोपरि विचार है।

मामले की पृष्ठभूमि

दोनों पक्षों का विवाह 18 मार्च 2012 को पुणे में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। 16 मार्च 2016 को उनके बेटे का जन्म हुआ। बच्चे के शुरुआती साल पुणे में ही बीते और जुलाई 2022 में यह परिवार सिंगापुर चला गया, जहां बच्चे को वाइज ओक्स इंटरनेशनल स्कूल में दाखिला दिलाया गया। बाद में घरेलू हिंसा और भावनात्मक उत्पीड़न के आरोपों के बीच दोनों के संबंधों में कड़वाहट आ गई। 11 मार्च 2025 को मां बच्चे को लेकर भारत लौट आई और तब से वह पुणे में बच्चे के साथ ही रह रही थी।

इसके बाद 5 अप्रैल 2025 को पिता ने गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 7 के तहत पुणे फैमिली कोर्ट में संरक्षकता याचिका दायर की। साथ ही, धारा 12 के तहत अंतरिम आवेदन (एग्जिबिट-7) देकर बच्चे की अस्थायी कस्टडी और उसे सिंगापुर ले जाने की अनुमति मांगी। 19 मई 2025 को फैमिली कोर्ट ने केवल मुलाकात का अधिकार दिया। पिता ने इसके खिलाफ अपील की, जिस पर हाईकोर्ट ने 13 फरवरी 2026 को मामला दोबारा फैमिली कोर्ट को भेजते हुए निर्देश दिया कि वैवाहिक विवादों के आरोपों में उलझे बिना केवल बच्चे के कल्याण की कसौटी पर नए सिरे से निर्णय लिया जाए। इस दौरान 25 जुलाई 2025 को सिंगापुर की कोर्ट ने भी बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपने का आदेश पारित कर दिया था।

मामला दोबारा सुने जाने पर पुणे फैमिली कोर्ट ने 16 मई 2026 को पिता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बच्चे की कस्टडी उसे सौंपने का निर्देश दे दिया। इस आदेश के खिलाफ मां ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया।

दोनों पक्षों के तर्क

मां की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट ने धारा 12 के तहत अपने अंतरिम अधिकार क्षेत्र की सीमा लांघ दी है। बिना किसी पूर्ण ट्रायल, साक्ष्य, मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन या स्वतंत्र कल्याण जांच के अंतरिम स्तर पर ही ऐसा आदेश दे दिया गया जो वस्तुतः अंतिम राहत जैसा है। वकील ने कहा कि पैरेंटल एलियनेशन (पिता से बच्चे को दूर करने) और असुरक्षित माहौल को लेकर फैमिली कोर्ट के निष्कर्ष पूरी तरह अटकलों पर आधारित हैं, जबकि बच्चा पुणे में मां की देखरेख में बेहद सहज है और स्कूल में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहा है। इसके अलावा, फैमिली कोर्ट ने पिता की आर्थिक स्थिति और सिंगापुर कोर्ट के आदेश को अनुचित तवज्जो दी।

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दूसरी ओर, पिता के वकील ने फैमिली कोर्ट के आदेश का बचाव करते हुए कहा कि अदालत ने हाईकोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन किया है। उन्होंने दलील दी कि मां बच्चे को एक मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रही है और उसे पिता के खिलाफ भड़का रही है। पिता के वकील ने यह भी कहा कि पिता के पास सिंगापुर में बड़ा घर, कैम्ब्रिज पाठ्यक्रम की पढ़ाई और बेहतर सुविधाएं हैं। साथ ही, भारत और सिंगापुर के बीच पारस्परिक संधियों और ‘अदालतों के सौहार्द’ (कॉमिटी ऑफ कोर्ट्स) के सिद्धांत के तहत सिंगापुर कोर्ट के कस्टडी आदेश का सम्मान किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी टिप्पणियां

गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 12 के कानूनी दायरे की व्याख्या करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अतहर हुसैन बनाम सैयद सिराज अहमद एवं अन्य मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:

“कस्टडी से जुड़े मामलों में, जैसा कि न्यायिक मिसालों द्वारा स्थापित है, बच्चों का कल्याण ही वह एकमात्र और एकल पैमाना है जिसके आधार पर अदालत कस्टडी के लिए संघर्ष कर रहे पक्षों के तुलनात्मक गुण-दोष का आकलन करेगी। इसलिए, अंतरिम कस्टडी का प्रश्न तय करते समय हमें बच्चों के कल्याण से निर्देशित होना चाहिए क्योंकि धारा 12 अदालत को उचित समझ में आने वाला कोई भी आदेश पारित करने का अधिकार देती है।”

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के मौसमी मोइत्रा गांगुली बनाम जयंत गांगुली मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें यह माना गया था कि बच्चों की दिनचर्या और जीवन में स्थिरता व निरंतरता एक महत्वपूर्ण विचार है।

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हाईकोर्ट ने पुणे फैमिली कोर्ट के उस दृष्टिकोण पर गहरी नाराजगी जताई जिसमें मां को पारंपरिक वैवाहिक भूमिकाओं का पालन न करने के लिए दोषी ठहराया गया था। फैमिली कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा था:

“पति के प्रति पत्नी के पवित्र कर्तव्य, घर को संभालना, सम्मान बनाए रखना, पारंपरिक और धार्मिक दृष्टिकोण से भावनात्मक सहारा देना, घर का प्रबंधन कुशलता से करना, दयालुता से बात करना, एक स्वागत योग्य माहौल बनाना—ये सब उसके लिए अनजाने शब्द प्रतीत होते हैं। शादी के वचनों को निभाना, पति की शारीरिक और भावनात्मक देखभाल करना, उसके लिए प्रार्थना करना और हर बात में उसकी भलाई चाहना एक अपेक्षा होती है, लेकिन उसने उसके साथ ऐसा व्यवहार किया मानो वह और उसका परिवार उसके सात जन्मों के दुश्मन हों। ऐसे में, इस प्रकार की महिला के सान्निध्य में बच्चे का भविष्य सुरक्षित नहीं है। यदि वह अपने पापा के बारे में दिन-रात ऐसे जहरीले शब्द सुनेगा, तो अपने पिता के साथ उसका रिश्ता बहुत कम समय में निश्चित रूप से बर्बाद हो जाएगा। इसलिए, बाप और बेटे के ऐसे प्यारे रिश्ते को बचाने के लिए, मेरी राय में, बच्चे के भविष्य के लिए यह बेहतर होगा कि वह अपने पिता के घोंसले में रहे।”

इस नैतिक उपदेश को पूरी तरह अनुचित ठहराते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“फैमिली कोर्ट के जज द्वारा पत्नी के तथाकथित पवित्र कर्तव्यों को तय करने या परिवार की ‘बहू’ के रूप में उसके आचरण की अपेक्षा करने संबंधी टिप्पणियां, हमारी समझ से न केवल अनुचित और निराधार हैं, बल्कि प्रतिगामी भी हैं जो वैवाहिक संबंधों के बारे में रूढ़िवादी और भ्रामक धारणाओं को बढ़ावा देती हैं और मजबूत करती हैं। हम यह टिप्पणी किए बिना नहीं रह सकते कि जजों को दूसरों की तुलना में अधिक सतर्क रहना चाहिए और मामले के तथ्यों से असंबद्ध ऐसी टिप्पणियां करने से बचना चाहिए।”

हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने खुद अपने ही आदेश में विरोधाभास पैदा किए। ट्रायल कोर्ट ने एक तरफ कहा कि वॉट्सऐप संदेशों जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की सत्यता केवल ट्रायल में ही जांची जा सकती है, लेकिन दूसरी तरफ उन्हीं अप्रमाणित संदेशों के आधार पर बच्चे को तुरंत मां से अलग करने का निष्कर्ष निकाल लिया।

इसी प्रकार, वित्तीय क्षमता के मुद्दे पर भी फैमिली कोर्ट ने पहले कहा कि आर्थिक संपन्नता कस्टडी का आधार नहीं हो सकती, फिर पिता के तीन कमरों के फ्लैट, गेटेड सोसायटी, घरेलू नौकर और अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम को आधार बनाकर कस्टडी ट्रांसफर कर दी, जो सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है।

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विदेशी अदालत के आदेश और सौहार्द के सिद्धांत पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—रुचि मजू बनाम संजीव मजू, धनवंती जोशी बनाम माधव उंडे और एलिजाबेथ दिनशॉ बनाम अरविन्द एम. दिनशॉ—का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय अदालतों के ‘पेरेंट्स पैट्री’ (अभिभावकीय) क्षेत्राधिकार में बच्चे का कल्याण ही सर्वोपरि है। फैमिली कोर्ट ने बच्चे के भावनात्मक, शारीरिक और शैक्षणिक कल्याण की स्वतंत्र जांच किए बिना केवल विदेशी कोर्ट के आदेश और सौहार्द के सिद्धांत को प्राथमिकता देकर गंभीर भूल की।

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने पाया कि पुणे में मार्च 2025 से मां के साथ रह रहा बच्चा अपनी पढ़ाई और सामाजिक परिवेश में पूरी तरह रच-बस चुका है। फैमिली कोर्ट के आदेश में ऐसे किसी आसन्न खतरे या उपेक्षा का कोई प्रमाण नहीं मिला जो बच्चे को मां से तत्काल अलग करने को उचित ठहराता हो।

लिहाजा, हाईकोर्ट ने पुणे फैमिली कोर्ट के 16 मई 2026 के आदेश को निरस्त कर दिया और मां को बच्चे की अंतरिम कस्टडी अपने पास रखने की अनुमति दी। अदालत ने पिता को प्रत्येक तीन महीने में एक बार तथा स्कूल की छुट्टियों में आपसी सहमति से बच्चे से व्यक्तिगत रूप से मिलने और सप्ताह में एक बार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बातचीत करने का अधिकार दिया। साथ ही, पुणे फैमिली कोर्ट को मुख्य संरक्षकता याचिका पर इन टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना शीघ्र सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया।

वाद संख्या: फैमिली कोर्ट अपील (एसटी) संख्या 16488 / 2026

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