दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 1998 में हथियारबंद डकैतों से लोहा लेने वाले पंजाब एंड सिंध बैंक के एक पूर्व सीनियर मैनेजर को उचित सम्मान और लाभ न देने पर बैंक प्रबंधन को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने इसे एक बहादुर कर्मचारी का अपमान करार देते हुए बैंक को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता सुरजीत सिंह को 2.50 लाख रुपये से अधिक की राशि ब्याज सहित अदा करे। हाईकोर्ट ने कहा कि अपनी जान जोखिम में डालकर बैंक और ग्राहकों की सुरक्षा करने वाले कर्मचारी के अदम्य साहस को केवल “नियमित कर्तव्य” बताकर पल्ला झाड़ लेना बेहद शर्मनाक और असंवेदनशील रवैया है।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने 10 सितंबर को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यह मामला केवल पैसों का नहीं, बल्कि उस सम्मान का है जो याचिकाकर्ता को बिना किसी कानूनी लड़ाई के खुद-ब-खुद मिल जाना चाहिए था। अदालत ने टिप्पणी की कि 1998 से लेकर आज तक अपने हक के लिए एक ताकतवर व्यवस्था के खिलाफ लड़ने वाले इस कर्मचारी के संघर्ष और दर्द की भरपाई किसी भी आर्थिक मुआवजे से पूरी तरह नहीं की जा सकती।
आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन की पात्रता और बैंक की अनदेखी
यह पूरा विवाद केंद्रीय वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग (बैंकिंग प्रभाग) के 1991 के उन दिशा-निर्देशों से जुड़ा है, जिनमें बैंक डकैतियों या आतंकी हमलों का डटकर मुकाबला करने वाले कर्मचारियों को मुआवजे और समय से पहले पदोन्नति (आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन) देने का प्रावधान है।
28 दिसंबर 1998 को नजफगढ़ के रोशनपुरा स्थित पंजाब एंड सिंध बैंक की शाखा में सीनियर मैनेजर के पद पर तैनात सुरजीत सिंह ने जान पर खेलकर डकैती की बड़ी साजिश को नाकाम किया था। इस बहादुरी के आधार पर उनके लिए आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन की सिफारिश भी की गई थी। इसके बावजूद बैंक प्रबंधन ने यह कहते हुए उनका दावा खारिज कर दिया कि उन्होंने केवल अपनी नियमित ड्यूटी निभाई थी। आखिरकार अपने कानूनी अधिकारों को हासिल करने के लिए सिंह को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
हथियारबंद डकैतों का हमला और गार्ड्स का आत्मसमर्पण
अदालत में पेश रिकॉर्ड के अनुसार, रोशनपुरा शाखा को ‘अति-संवेदनशील’ (हाई-रिस्क) श्रेणी में रखा गया था और वहां सुरक्षा के लिए दो सशस्त्र गार्ड तैनात थे। घटना वाले दिन दोपहर करीब 1 बजे स्वचालित हथियारों से लैस पांच डकैत बैंक परिसर में दाखिल हुए। उन्होंने कर्मचारियों और ग्राहकों को बंधक बना लिया और काउंटर व सेफ में रखे करीब 40 लाख रुपये लूटने लगे।
बैंक की रक्षा के लिए तैनात दोनों हथियारबंद सुरक्षा गार्डों ने मुकाबला करने के बजाय तुरंत आत्मसमर्पण कर दिया और अपने हथियार डकैतों को सौंप दिए। इससे बदमाशों को लूटपाट करने की पूरी छूट मिल गई।
मौत के साए में अलार्म बजाकर लुटेरों को खदेड़ा
डकैतों ने इसके बाद सुरजीत सिंह के केबिन को घेर लिया। अपनी जान को भारी खतरा देखते हुए भी सिंह ने तुरंत बाहरी मदद बुलाने के लिए फोन उठाया। इस पर नाराज होकर डकैतों ने केबिन का शीशा तोड़ दिया और सीधे उन पर रिवाॉल्वर तान दी।
कनपटी पर रिवॉल्वर होने के बावजूद सिंह घबराए नहीं और उन्होंने तुरंत आपातकालीन हूटर (अलार्म) का बटन दबा दिया। अचानक सायरन की तेज आवाज गूंजते ही लुटेरों में भगदड़ मच गई और वे नकदी के काउंटर छोड़कर मुख्य दरवाजे की ओर भागने लगे।
दरवाजे पर भिड़ गए मैनेजर, छूट गया रुपयों से भरा बैग
बदमाशों को भागता देख सुरजीत सिंह ने साहस का परिचय देते हुए मुख्य द्वार पर उनका रास्ता रोक दिया। इस हाथापाई के दौरान रुपयों से भरा बैग फर्श पर गिर गया और नोट बिखर गए। इसके चलते डकैत 40 लाख रुपये में से केवल 75 हजार रुपये ही ले जा सके और बाकी भारी रकम बैंक में ही छूट गई।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सुरजीत सिंह भी अन्य कर्मचारियों और सुरक्षा गार्डों की तरह आत्मसमर्पण कर सकते थे। अगर उस वक्त डकैत गोली चला देते, तो शायद उनके परिवार को बाद में केवल एक मरणोपरांत प्रशस्ति पत्र और कुछ खोखली संवेदनाएं ही नसीब होतीं। अदालत ने जोर देकर कहा कि यह कहना बहुत आसान है कि मैनेजर ने सिर्फ हूटर दबाया, लेकिन यह फैसला उन्होंने अपनी जान जाने के सीधे खतरे के बीच लिया था। अदालत ने बैंक के रुख को बहादुरी का मजाक बताते हुए सिंह को ब्याज सहित पूरा मुआवजा जारी करने का आदेश दिया।

