सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ), पालक्काड़ के पूर्व मंडल सुरक्षा आयुक्त (डीएससी) भरत राज मीणा की दोषसिद्धि को रद्द करते हुए निर्णय दिया है कि किसी अधिकारी का नाम लेने वाले मध्यस्थ से केवल पैसे की बरामदगी को स्वयं लोकसेवक द्वारा रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार करने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस नोंग्मीकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने विशेष सीबीआई अदालत, एर्नाकुलम और केरल हाईकोर्ट द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (पीसी एक्ट) की धारा 7 और 13 के तहत सुनाई गई दोषसिद्धि के खिलाफ मीणा की अपीलों को स्वीकार कर लिया। निर्णय लिखते हुए जस्टिस नोंग्मीकापम कोटिश्वर सिंह ने स्पष्ट किया कि जब तक आरोपी द्वारा रिश्वत स्वीकार करने या प्राप्त करने के मूलभूत तथ्य साबित नहीं होते, तब तक अधिनियम की धारा 20 के तहत वैधानिक उपधारणा (प्रिजम्प्शन) लागू नहीं हो सकती।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा, कोच्चि द्वारा 4 अगस्त 2005 को दर्ज की गई एक एफआईआर से शुरू हुआ था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि अप्रैल से अगस्त 2005 के दौरान जब मीणा पालक्काड़ में मंडल सुरक्षा आयुक्त के पद पर तैनात थे, तब उन्होंने तबादलों, पोस्टिंग और सेवा लाभों के बदले आरपीएफ कर्मियों से अवैध रिश्वत मांगने और वसूलने की व्यवस्था बना रखी थी। जांच एजेंसी का दावा था कि मीणा अपने मातहत कर्मचारियों—मुख्य रूप से कांस्टेबल अनंथा नारायणन और हेड कांस्टेबल अब्दुल गफूर—को मध्यस्थ (कंड्यूट) बनाकर उनके जरिए रिश्वत वसूलते थे।
जांच पूरी होने के बाद सीबीआई ने रिश्वतखोरी के 12 कथित लेन-देन को लेकर तीन अंतिम रिपोर्ट (चार्जशीट) दाखिल कीं। विशेष सीबीआई अदालत में चले मुकदमों के बाद अपीलकर्ता को सी.सी. संख्या 2/2014 और सी.सी. संख्या 3/2015 में दोषी ठहराया गया।
सी.सी. संख्या 2/2014 में मीणा को 4 अगस्त 2005 को सीबीआई के ट्रैप के दौरान कांस्टेबल अनंथा नारायणन के माध्यम से जूनियर क्लर्क पी.पी. नंदकुमार से 5,000 रुपये मांगने और स्वीकार करने के आरोप में दोषी ठहराया गया था। वहीं सी.सी. संख्या 3/2015 में ट्रायल कोर्ट ने कई लेन-देन के लिए मीणा को दोषी माना था, लेकिन केरल हाईकोर्ट ने केवल एन.पी. गोपी कुमार से जुड़े एक लेन-देन में ही उनकी दोषसिद्धि बरकरार रखी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई की।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि मीणा द्वारा रिश्वत मांगे जाने या उसे स्वीकार किए जाने का कोई भी ठोस सबूत अभियोजन पक्ष पेश नहीं कर सका है। बचाव पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि कथित रूप से कैमिकल लगा हुआ नोट (टेंटेड करेंसी) केवल मध्यस्थ अनंथा नारायणन से बरामद हुआ था और मीणा के हाथों की कोई धुलाई या रासायनिक जांच (हैंड-वॉश टेस्ट) नहीं कराई गई थी। आर.पी.एस. यादव बनाम सीबीआई के फैसले का हवाला देते हुए बचाव पक्ष ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी द्वारा मांग, मध्यस्थ के जरिए स्वीकार्यता और अंततः आरोपी तक पैसे की पहुंच की समयबद्ध कड़ियों को जोड़ने में पूरी तरह विफल रहा है। इसके अतिरिक्त, मध्यस्थ वास्तव में सह-आरोपी थे जो बाद में सरकारी गवाह (अप्रूवर) बन गए थे। सरवन सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब के फैसले का संदर्भ देते हुए कहा गया कि स्वतंत्र पुष्टि के अभाव में केवल अप्रूवर के बयानों पर दोषसिद्धि नहीं हो सकती। वहीं बी. जयराज बनाम स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश और सुजीत बिस्वास बनाम स्टेट ऑफ असम के मामलों पर भरोसा जताते हुए दलील दी गई कि मांग के प्रमाण के बिना धारा 20 के तहत वैधानिक उपधारणा लागू नहीं की जा सकती। अपीलकर्ता ने अपनी यात्रा डायरी का हवाला देकर अपने उपस्थित न होने (अलिबाई) की बात भी कही और बताया कि तबादले व पोस्टिंग का अधिकार उनके पास नहीं बल्कि वरिष्ठ मंडल कार्मिक अधिकारी (सीनियर डीपीओ) के पास था।
दूसरी ओर, सीबीआई ने दलील दी कि ट्रैप के गवाहों, सरकारी गवाहों और शिकायतकर्ताओं की सुसंगत गवाही से रिश्वत की मांग और बरामदगी पूरी तरह साबित हो चुकी है। जांच एजेंसी का कहना था कि आपराधिक कानून मध्यस्थों के माध्यम से रिश्वत स्वीकार किए जाने को मान्यता देता है और हर चरण में लोकसेवक की व्यक्तिगत भौतिक उपस्थिति अनिवार्य नहीं है। इसके समर्थन में स्टेट बाई लोकायुक्त पुलिस बनाम के. रंगय्या के फैसले का हवाला दिया गया। अभियोजन ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के समवर्ती निष्कर्षों में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है और परिस्थितियों की यह श्रृंखला धारा 20 के तहत उपधारणा लागू करने के लिए पर्याप्त है।
कोर्ट का कानूनी विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने पीसी एक्ट के तहत कानूनी ढांचे की समीक्षा करते हुए दोहराया कि धारा 7 और 13 के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए मांग और स्वीकार्यता का सबूत अपरिहार्य शर्त (साइन क्वा नॉन) है। सी.एम. गिरीश बाबू बनाम सीबीआई और पी. सत्यनारायण मूर्ति बनाम डिस्ट्रिक्ट इंस्पेक्टर ऑफ पुलिस के फैसलों का उल्लेख करते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि मांग और स्वीकार्यता के सबूत के बिना केवल पैसे की बरामदगी अपराध साबित नहीं कर सकती।
संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले नीरज दत्ता बनाम स्टेट (एनसीटी ऑफ दिल्ली) का हवाला देते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया कि भले ही मांग और स्वीकार्यता को परिस्थितियों के आधार पर साबित किया जा सकता है, लेकिन वे परिस्थितियां ऐसी होनी चाहिए जो आरोपी की बेगुनाही के हर पहलू को खारिज करती हों। पीठ ने कहा:
“कुछ बुनियादी तथ्यों के साबित होने पर परिस्थितिजन्य साक्ष्य से निष्कर्ष निकालने की अनुमति का यह अर्थ कतई नहीं है कि ‘किसी मध्यस्थ द्वारा आरोपी के कथित निर्देश पर पैसे एकत्र किए जाने’ और ‘आरोपी द्वारा स्वयं वह पैसा हासिल या स्वीकार किए जाने’ के बीच के शेष अंतर को परिस्थितिजन्य साक्ष्य के सहारे पाट दिया जाए। जैसा कि ‘नीरज दत्ता’ मामले में कहा गया था, ‘प्राप्त करने’ (ऑब्टेन) के लिए प्राप्तकर्ता की ओर से पहल और प्रयास की आवश्यकता होती है, जबकि यहां अंतिम प्राप्ति के विशिष्ट प्रश्न पर, कथित मांग के अलावा अपीलकर्ता ने किसी भी प्रकार का कोई अगला कदम नहीं उठाया।”
शिकायतकर्ता नंदकुमार से जुड़े ट्रैप की पड़ताल करते हुए पीठ ने कई गंभीर विसंगतियों और जांच की कमियों को उजागर किया। नंदकुमार पैसे लेकर चैंबर में अपीलकर्ता से सीधे मिले थे, फिर भी अपीलकर्ता ने पैसे खुद नहीं लिए और कथित तौर पर बाहर खड़े अनंथा नारायणन को देने को कहा। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जिस अधिकारी ने कथित तौर पर खुद रिश्वत मांगी थी, वह बंद कमरे में सीधे पैसे मिलने पर लेने के बजाय उसे मध्यस्थ के पास क्यों भेजेगा?
पीठ ने यह भी पाया कि सीबीआई ने ट्रैप कार्रवाई में अत्यधिक जल्दबाजी दिखाई:
“यदि जांच एजेंसी उस पूरी श्रृंखला को पूरा होने देती, तो सामने आने वाला साक्ष्य अपीलकर्ता की संलिप्तता को वर्तमान बरामदगी की तुलना में कहीं अधिक प्रत्यक्ष रूप से साबित करता। यह जांच की एक गंभीर खामी है और सीबीआई की जल्दबाजी का लाभ अपीलकर्ता को मिलेगा।”
कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष केवल यही साबित कर पाया कि पैसा मध्यस्थ को मिला था, जिससे यह उचित संभावना पूरी तरह खुली रह जाती है कि मध्यस्थ ने वह पैसा खुद हड़प लिया हो।
धारा 20 की वैधानिक उपधारणा पर निर्णय देते हुए पीठ ने कहा:
“अधिनियम की धारा 20 के तहत उपधारणा पहली बात तो लागू ही नहीं होती, क्योंकि इसके लिए आरोपी द्वारा रिश्वत स्वीकार करने या हासिल करने का प्रमाण होना आवश्यक है, जो उपरोक्त कारणों से साबित नहीं हुआ है। अभियोजन अधिक से अधिक केवल यही साबित कर पाया है कि शिकायतकर्ता और एक ऐसे मध्यस्थ के बीच पैसों का लेन-देन हुआ जिसने अपीलकर्ता का नाम लिया था। लेकिन केवल इसे अपीलकर्ता द्वारा रिश्वत स्वीकार किए जाने का प्रमाण नहीं कहा जा सकता।”
एन.पी. गोपी कुमार से जुड़े दूसरे लेन-देन के संबंध में कोर्ट ने रेखांकित किया कि यह कोई ट्रैप केस नहीं था और न ही कोई रकम कभी बरामद हुई थी। आरोप था कि मीणा ने 30 जुलाई 2005 को अपने आवास पर 3,000 रुपये स्वीकार किए थे, लेकिन अपीलकर्ता की आधिकारिक टूर डायरी से साबित हुआ कि वह 29 से 31 जुलाई 2005 तक पालक्काड़ से बाहर थे। इसके अलावा, सरकारी गवाह के बयान की पुष्टि करने वाला कोई भी स्वतंत्र साक्ष्य मौजूद नहीं था।
कोर्ट का निर्णय
अभियोजन पक्ष द्वारा संदेह से परे आरोप साबित न कर पाने के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आपराधिक अपीलों को स्वीकार करते हुए भरत राज मीणा को सी.सी. संख्या 2/2014 और सी.सी. संख्या 3/2015 के सभी आरोपों से बरी कर दिया। पीठ ने उनके बेल बॉन्ड निरस्त करने और जमा की गई किसी भी जुर्माने की राशि को वापस लौटाने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: भरत राज मीणा बनाम सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 4732/2024 साथ में आपराधिक अपील संख्या 4733/2024
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस नोंग्मीकापम कोटिश्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 16 सितंबर, 2026

