सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) में तकनीशियन ग्रेड-2 (प्रशिक्षु) इलेक्ट्रिकल पद के लिए 2013 के संशोधित चयन परिणामों और नियुक्तियों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस रिट याचिका पर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता सामान्य वर्ग के लिए तय कट-ऑफ अंक हासिल करने में विफल रहे थे, इसलिए वे चयनित उम्मीदवारों से अधिक योग्य नहीं थे। इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने अदालत से महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए और सीबीआई जांच की मांग के लिए कोई वैधानिक या तथ्यात्मक आधार भी पेश नहीं कर सके।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद यूपीपीसीएल द्वारा 4 मार्च 2011 को जारी एक विज्ञापन से शुरू हुआ था, जिसके तहत बिजली वितरण निगमों में तकनीशियन ग्रेड-2 (प्रशिक्षु) इलेक्ट्रिकल के 2,974 पदों के लिए आवेदन मांगे गए थे। इनमें 1,778 पद सामान्य वर्ग, 353 अनुसूचित जाति, 128 अनुसूचित जनजाति और 715 पद अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षित थे।
निर्धारित अनिवार्य योग्यताओं के अनुसार, अभ्यर्थियों के पास इलेक्ट्रीशियन ट्रेड में दो वर्षीय राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय ट्रेड सर्टिफिकेट, विज्ञान और गणित विषयों के साथ हाई स्कूल और इंटरव्यू के समय प्रस्तुत करने के लिए डीओइएएसीसी (DOEACC) का कंप्यूटर कॉन्सेप्ट्स (सीसीसी) प्रमाण पत्र होना अनिवार्य था।
लिखित परीक्षा 7 अगस्त 2011 को आयोजित की गई, जिसमें 13,576 अभ्यर्थियों ने भाग लिया। इनमें से 6,288 अभ्यर्थी 28 नवंबर से 28 दिसंबर 2011 के बीच आयोजित इंटरव्यू के लिए पात्र पाए गए। चयन परिणाम 21 मई 2012 को घोषित हुआ। इंटरव्यू के दौरान कई अभ्यर्थी कंप्यूटर प्रमाण पत्र पेश नहीं कर पाए थे, जिसके चलते यूपीपीसीएल ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर प्रमाण पत्र जमा करने की अंतिम तिथि कई बार बढ़ाई और अंत में इसे 31 जुलाई 2012 तय किया। निगम ने यह शर्त भी रखी कि समय पर प्रमाण पत्र न देने पर चयन स्वतः रद्द माना जाएगा।
असफल अभ्यर्थियों ने इस प्रक्रिया को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सिंगल जज ने 30 अगस्त 2012 को उनकी याचिकाएं खारिज कर दीं। इसके बाद मामला डिवीजन बेंच में गया। डिवीजन बेंच ने 26 सितंबर 2012 को फैसला सुनाते हुए कहा कि जब विज्ञापन में छूट का कोई प्रावधान नहीं था, तो नियमों में ढील नहीं दी जा सकती। बेंच ने निर्देश दिया कि केवल 31 मार्च 2012 तक प्रमाण पत्र जमा करने वाले अभ्यर्थी ही चयन के पात्र होंगे और इसके बाद प्रमाण पत्र देने वालों के नाम हटाकर नया परिणाम जारी किया जाए।
डिवीजन बेंच के आदेश के पालन में यूपीपीसीएल ने 20 जनवरी 2013 को नया परिणाम और 30 जनवरी 2013 को नियुक्ति-सह-आवंटन सूची जारी की। असफल अभ्यर्थियों ने 19 फरवरी 2013 को सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की। यह याचिका उन विशेष अनुमति याचिकाओं (एसएलपी) के साथ जोड़ दी गई जिनमें डिवीजन बेंच के फैसले को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 22 फरवरी 2019 को संजय के. दीक्षित व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामले में डिवीजन बेंच के आदेश को बरकरार रखते हुए सभी एसएलपी खारिज कर दी थीं, जिसके बाद वर्तमान रिट याचिका पर सुनवाई बची रह गई थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि कंप्यूटर प्रमाण पत्र जमा करने के लिए केवल पहली बार दी गई मोहलत ही वैध थी और उसके बाद बढ़ाई गई तारीखें अनधिकृत थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि ओबीसी वर्ग के लिए केवल 715 पद आरक्षित होने के बावजूद 1,527 अभ्यर्थियों का चयन कर लिया गया, जो आरक्षण नीति का खुला उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि 2,293 अभ्यर्थियों ने समय पर प्रमाण पत्र जमा किए थे, लेकिन चयन 2,836 अभ्यर्थियों का किया गया। याचिकाकर्ताओं ने यूपीपीसीएल की सूचियों में रोल नंबर और नामों की विसंगतियां गिनाते हुए दावा किया कि कम अंक पाने वालों को नियुक्तियां दी गईं। इन आधारों पर उन्होंने 20 जनवरी 2013 के संशोधित परिणाम और 30 जनवरी 2013 की नियुक्ति सूची को रद्द करने, नए सिरे से परिणाम जारी करने और पूरे मामले की सीबीआई जांच कराने का आग्रह किया।
दूसरी ओर, यूपीपीसीएल की तरफ से पेश अधिवक्ता सुनील कुमार जैन ने याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता तथ्यों को छिपाने के दोषी हैं, क्योंकि याचिकाकर्ता संख्या 8 से 18 ने पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में समान राहत के लिए रिट याचिका संख्या 2749/2012 दायर की थी, जिसे 9 नवंबर 2012 को निस्तारित किया जा चुका था। उन्होंने यह भी कहा कि याचिका में आवश्यक पक्षों (चयनित उम्मीदवारों) को पक्षकार नहीं बनाया गया है और इस स्तर पर नए मुद्दे नहीं उठाए जा सकते।
मेरिट पर जवाब देते हुए निगम के वकील ने स्पष्ट किया कि सामान्य वर्ग के लिए कट-ऑफ 98.25 अंक थी और याचिकाकर्ताओं के अंक इससे कम थे। वे अपनी तुलना स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों और भूतपूर्व सैनिकों की क्षैतिज उप-श्रेणियों से नहीं कर सकते, जिनकी कट-ऑफ क्रमशः 65.75 और 80.25 अंक थी। ओबीसी वर्ग पर उन्होंने तर्क दिया कि यदि आरक्षित वर्ग का कोई अभ्यर्थी सामान्य वर्ग के अंतिम चयनित अभ्यर्थी से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो वह खुली श्रेणी में चयनित होने का हकदार होता है और ऐसे चयन को 50 प्रतिशत की आरक्षण सीमा में नहीं गिना जाता।
कोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस अराधे द्वारा लिखे गए फैसले में कोर्ट ने रेखांकित किया कि 30 जनवरी 2019 के अंतरिम आदेश के दौरान याचिकाकर्ताओं ने अपनी मांग को केवल इस दावे तक सीमित कर लिया था कि वे चयनित अभ्यर्थियों से अधिक मेरिट रखते हैं। अदालती कार्यवाही के बाध्यकारी प्रभाव पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:
“यह सुस्थापित कानून है कि कोई आदेश संबंधित पक्षों पर प्रभावी होता है और उन पर तब तक बाध्यकारी रहता है जब तक कि उसे किसी उच्च मंच पर सफलतापूर्वक अमान्य न कर दिया जाए या चुनौती न दी जाए।”
पीठ ने पाया कि यूपीपीसीएल के जवाबी हलफनामे में यह साफ तौर पर साबित हुआ कि याचिकाकर्ता सामान्य वर्ग की 98.25 अंकों की कट-ऑफ को पार नहीं कर सके थे। याचिकाकर्ताओं ने इस तथ्य का कोई खंडन नहीं किया। परिणामस्वरूप, कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं से कम मेरिट वाले किसी भी अभ्यर्थी का चयन नहीं हुआ था।
याचिकाकर्ताओं के आचरण पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता संख्या 8 से 18 ने हाईकोर्ट में अपनी पूर्व याचिका का खुलासा नहीं किया था:
“यह गैर-प्रकटीकरण महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने के समान है, और ऐसा आचरण, बिना किसी अन्य बात के, याचिकाकर्ताओं को किसी भी राहत का हकदार नहीं बनाता।”
कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि चयनित अभ्यर्थी वर्षों से अपनी सेवाओं में बने हुए हैं और उनकी अनुपस्थिति में उनके चयन को रद्द नहीं किया जा सकता:
“इस समय, विशेषकर हमारे समक्ष उनकी अनुपस्थिति में, उनकी नियुक्तियों को बाधित नहीं किया जा सकता।”
सीबीआई जांच की मांग को खारिज करते हुए पीठ ने स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल व अन्य बनाम कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स, हिमांशु कुमार व अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य तथा विधान परिषद यूपी लखनऊ व अन्य बनाम सुशील कुमार व अन्य से जुड़े फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने रेखांकित किया:
“सीबीआई को जांच करने का निर्देश सामान्य तौर पर या केवल इसलिए जारी नहीं किया जा सकता क्योंकि किसी पक्ष ने स्थानीय पुलिस पर कुछ आरोप लगाए हैं।”
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने न तो कोई प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराई थी, न ही स्थानीय पुलिस के खिलाफ कोई शिकायत की थी, और न ही याचिका में सीबीआई जांच के समर्थन में पर्याप्त तथ्यात्मक सामग्री पेश की थी।
फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका में कोई मेरिट न पाते हुए इसे खारिज कर दिया और कहा कि इस मामले में किसी भी पक्ष पर कोई हर्जाना नहीं लगाया जाएगा। इसके साथ ही सभी लंबित अंतरिम अर्जियां भी निस्तारित कर दी गईं।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: विनीत कुमार व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, सचिव के माध्यम से व अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका (सिविल) संख्या 123/2013
पीठ: जस्टिस पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 16 सितंबर 2026

