इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 1 नियम 8 के तहत प्रतिनिधि क्षमता में वाद दायर करने की अनुमति न मिलना मुकदमे को सीधे खारिज करने का आधार नहीं बनता है। ऐसी स्थिति में केवल इतना प्रभाव पड़ता है कि मुकदमे का अंतिम परिणाम पूरे समुदाय पर लागू होने के बजाय केवल मुकदमे के पक्षकारों के बीच ही बाध्यकारी रहता है। जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने यह टिप्पणी करते हुए 45 साल पुरानी एक द्वितीय अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के उस निष्कर्ष पर मुहर लगाई, जिसमें 18.14 एकड़ विवादित भूमि को 300 से अधिक वर्षों से मुस्लिम कब्रिस्तान माना गया था और किसी भी निजी निर्माण पर रोक लगा दी गई थी।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह कानूनी विवाद वर्ष 1970 में शुरू हुआ था, जब वादी-प्रतिवादियों ने कस्बा महोबा और मौजा फतेहपुर बजरिया के स्थानीय मुस्लिम समुदाय की ओर से एक मूल वाद दायर किया था। वादियों का दावा था कि 18.14 एकड़ क्षेत्रफल वाला प्लॉट नंबर 262/4/1 पिछले 300 से अधिक वर्षों से लगातार मुस्लिम कब्रिस्तान के रूप में उपयोग में है और वहां बड़ी संख्या में कब्रें मौजूद हैं। उन्होंने प्रतिवादी-अपीलार्थी बाबू लाल को विवादित भूमि पर खाई खोदने या कोई भी अनधिकृत निर्माण करने से रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) की मांग की थी। वादी पक्ष ने वादपत्र में यह भी कहा था कि यह मुकदमा समुदाय के धार्मिक और दफनाने के अधिकारों की सुरक्षा के लिए सीपीसी के आदेश 1 नियम 8 के तहत प्रतिनिधि क्षमता में दायर किया जा रहा है। हालांकि, ट्रायल कोर्ट से आदेश 1 नियम 8 के तहत न तो कोई औपचारिक अनुमति मांगी गई और न ही अदालत ने ऐसी कोई अनुमति दी।
प्रतिवादी ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि उसने विवादित जमीन खरीदी है और उसे उस पर निर्माण करने का कानूनी अधिकार है। उसका यह भी तर्क था कि इस भूमि का उपयोग कभी कब्रिस्तान के रूप में नहीं हुआ, या फिर इसका दायरा केवल एक बहुत छोटे से हिस्से तक ही सीमित था।
ट्रायल कोर्ट ने 29 जनवरी 1976 को आंशिक रूप से वाद डिक्री करते हुए कुछ हिस्सा कब्रिस्तान और कुछ हिस्सा प्रतिवादी के लिए निर्धारित कर दिया। इसके खिलाफ दोनों पक्षों ने जिला जज, हमीरपुर के समक्ष अपील की, जिन्होंने 5 अक्टूबर 1977 को आदेश रद्द कर मामला दोबारा सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया। रिमांड के बाद ट्रायल कोर्ट ने 26 अप्रैल 1978 को पूरे मुकदमे को स्वीकार कर लिया और निष्कर्ष निकाला कि पूरी 18.14 एकड़ भूमि हमेशा से कब्रिस्तान के रूप में समर्पित रही है। इसके खिलाफ प्रतिवादी द्वारा दाखिल प्रथम अपील को 2 मार्च 1981 को खारिज कर दिया गया। प्रथम अपीलीय अदालत ने एडवोकेट कमिश्नर और पीठासीन अधिकारी की मौका मुआयना रिपोर्टों के आधार पर पाया कि पूरी जमीन पर कब्रें फैली हुई हैं। अदालत ने यह भी माना कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज न होने मात्र से ईश्वर को समर्पित संपत्ति का स्वरूप नहीं बदलता और कई वर्षों से नए शव न दफनाए जाने से प्रथागत अधिकार समाप्त नहीं होते। इसके बाद प्रतिवादी ने 1981 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षकारों की दलीलें
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अपीलार्थी के वकील ने स्वीकार किया कि वर्ष 1981 में अपील स्वीकार करते समय तय किए गए दो कानूनी प्रश्न वास्तव में कानून और तथ्य के मिले-जुले प्रश्न थे। इसके स्थान पर उन्होंने मुकदमे की विचारणीयता को लेकर विधि का एक नया सारवान प्रश्न उठाने की मांग की:
“क्या आदेश 1 नियम 8 सीपीसी के तहत अपेक्षित प्रतिनिधि क्षमता में वाद दायर करने की अनुमति के अभाव में, प्रतिनिधि क्षमता में दायर वाद को केवल खारिज ही किया जाएगा?”
अपीलार्थी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के कल्याण सिंह बनाम श्रीमती छोटी एवं अन्य के फैसले पर भरोसा जताते हुए तर्क दिया गया कि चूंकि वादियों ने वादपत्र में स्पष्ट घोषणा की थी कि मुकदमा आदेश 1 नियम 8 के तहत दायर किया गया है, इसलिए अदालत से अनिवार्य अनुमति न मिलने के कारण यह मुकदमा शुरुआत में ही खारिज होने योग्य था।
वहीं, वादी-प्रतिवादियों के वकील ने इस दलील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह तकनीकी आपत्ति न तो ट्रायल कोर्ट में उठाई गई थी और न ही प्रथम अपीलीय अदालत में, इसलिए इसे द्वितीय अपील में पहली बार नहीं उठाया जा सकता। उन्होंने रेखांकित किया कि दोनों निचली अदालतों ने पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों और मौका मुआयना रिपोर्ट के आधार पर मामले का गुण-दोष पर फैसला किया है, जिससे साबित होता है कि पूरी जमीन सदियों से विशेष रूप से मुस्लिम कब्रिस्तान के रूप में इस्तेमाल होती रही है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
धारा 100 सीपीसी के तहत द्वितीय अपील में विधि के सारवान प्रश्न के परीक्षण का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रबींद्रनाथ पाणिग्रही बनाम सुरेंद्र साहू और शेख मोहम्मद मुर्तजा बनाम शेख वाजिद अली के मामलों का संदर्भ दिया। इसके अलावा, सर चुन्नीलाल वी. मेहता एंड संस लिमिटेड बनाम सेंचुरी स्पिनिंग एंड मैन्युफैक्चरिंग कंपनी लिमिटेड और हीरो विनोथ बनाम शेषम्मल में तय सिद्धांतों को दोहराते हुए अदालत ने कहा कि जहां कानूनी सिद्धांत पूरी तरह स्थापित हैं और केवल उन्हें तथ्यों पर लागू करने का मामला हो, वहां कोई सारवान प्रश्न नहीं बनता।
आदेश 1 नियम 8 सीपीसी से जुड़ी आपत्ति पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हरी राम बनाम ज्योति प्रसाद एवं अन्य मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया, जिसमें कल्याण सिंह वाले निर्णय की भी व्याख्या की गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी समुदाय का कोई भी प्रभावित सदस्य सार्वजनिक या सामुदायिक संपत्ति की सुरक्षा के लिए और अतिक्रमण हटाने के लिए वाद ला सकता है, और ऐसे मामले में आदेश 1 नियम 8 की औपचारिकताओं का कड़ाई से पालन अनिवार्य नहीं होता।
जस्टिस शमशेरी ने आदेश 1 नियम 8 सीपीसी के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा:
“जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, आदेश 1 नियम 8 सीपीसी का उद्देश्य यह है कि यदि अनुमति मांगी जाती है और दी जाती है, तो वाद को प्रतिनिधि क्षमता में दायर माना जाएगा, और यदि अनुमति खारिज कर दी जाती है, तो यह माना जाएगा कि वाद का परिणाम केवल पक्षकारों के बीच ही अंतिम होगा।”
अदालत ने आगे स्पष्ट किया:
“इसलिए, जब वर्तमान मामले में वाद को कथित तौर पर आदेश 1 नियम 8 सीपीसी के प्रावधानों के तहत दायर किया गया था, लेकिन चूंकि कोई अनुमति नहीं मांगी गई थी, इसलिए कोई अनुमति नहीं दी गई और इसीलिए वाद को केवल वादियों द्वारा दायर किया गया माना जाएगा तथा यह केवल मुकदमे के पक्षकारों के बीच ही सीमित रहेगा। वाद को प्रतिनिधि क्षमता में या पूरे मुस्लिम समुदाय की ओर से दायर नहीं माना जाएगा। इसलिए, जो कानूनी प्रश्न तैयार करने की मांग की गई है, वह विधि का सारवान प्रश्न न होने के कारण नहीं बनाया जा सकता। यदि आदेश 1 नियम 8 सीपीसी के तहत अनुमति नहीं दी जाती है या मांगी नहीं जाती है, तो इसका एकमात्र प्रभाव यह होगा कि वाद का परिणाम केवल मुकदमे के पक्षकारों के बीच ही अंतिम होगा।”
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि दोनों निचली अदालतों ने गवाहों के बयानों और दो अलग-अलग मौका मुआयना रिपोर्टों का गहराई से परीक्षण किया था। इन रिपोर्टों से यह पूरी तरह स्पष्ट था कि पूरी 18.14 एकड़ जमीन पर कब्रें मौजूद हैं और यह सदियों से कब्रिस्तान के रूप में उपयोग में है। अदालत ने माना कि निचली अदालतों के इन तथ्यात्मक निष्कर्षों में कोई अवैधता या त्रुटि नहीं है।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलार्थी द्वारा प्रस्तावित प्रश्न विधि का सारवान प्रश्न नहीं है और निचली अदालतों के आदेशों में कोई कानूनी खामी नहीं पाई गई। इन आधारों पर हाईकोर्ट ने 45 वर्ष पुरानी द्वितीय अपील को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: बाबू लाल बनाम शहाबुद्दीन और अन्य
वाद संख्या: द्वितीय अपील संख्या 1289/1981
पीठ: जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी
निर्णय की तिथि: 10 सितंबर 2026

