जमानत आदेशों पर विचार न करना और 139 दिनों की अकारण देरी से ‘लाइव लिंक’ टूटा: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने पीआईटी एनडीपीएस एक्ट के तहत निवारक हिरासत रद्द की

अमरावती स्थित आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी शामिल थे, ने प्रिवेंशन ऑफ इलिसिट ट्रैफिक इन नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1988 (पीआईटी एनडीपीएस एक्ट) की धारा 3(1) के तहत जारी एक प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक हिरासत) आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने माना कि प्रस्ताव प्राप्त होने के बाद निरोध आदेश जारी करने में 139 दिनों की अकारण देरी, और साथ ही हिरासत में लिए गए व्यक्ति (डिटेन्यू) को दी गई जमानत के आदेशों पर विचार न करने से कथित अवैध गतिविधियों और निवारक हिरासत के उद्देश्य के बीच का “लाइव एंड प्रॉक्सिमेट लिंक” (जीवंत और तात्कालिक संबंध) टूट गया। इसके परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने हिरासत में लिए गए व्यक्ति को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता पोन्ना रोजा ने अपने पति निक्का नरेंद्र बाबू (उर्फ विक्की चौधरी उर्फ पुष्पा) की निवारक हिरासत को चुनौती देते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दायर की थी। राज्य सरकार ने पीआईटी एनडीपीएस एक्ट की धारा 3(1) के तहत 29 अक्टूबर 2025 को जारी जी.ओ.आर.टी. सं. 1314 के जरिए निरोध आदेश जारी किया था। बाद में 12 जनवरी 2026 को जी.ओ.आर.टी. सं. 69 के तहत इस निरोध आदेश की पुष्टि 12 महीने की अवधि के लिए की गई थी।

निरोध आदेश में 2018 से 2025 के बीच एनडीपीएस एक्ट, ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और पासपोर्ट एक्ट के तहत दर्ज सात आपराधिक मामलों का हवाला दिया गया था:

  1. अपराध संख्या 315/2018 (हेन्नूर पुलिस स्टेशन, बेंगलुरु) – 20 किलोग्राम गांजा (ट्रायल लंबित)
  2. अपराध संख्या 382/2019 (टू टाउन पुलिस स्टेशन, विशाखापट्टनम) – 2.4 किलोग्राम गांजा, एमडीएमए, एलएसडी, एल्प्राजोलम (ट्रायल लंबित)
  3. अपराध संख्या 64/2021 (हुकूमपेटा पुलिस स्टेशन, विशाखापट्टनम) – 144 किलोग्राम गांजा (ट्रायल लंबित)
  4. अपराध संख्या 716/2021 (पेनामलुरु पुलिस स्टेशन, कृष्णा) – 0.9 किलोग्राम गांजा (ट्रायल लंबित)
  5. अपराध संख्या 11/2023 (वी. सताराम पुलिस स्टेशन, एसपीएस नेल्लोर) – 93.15 किलोग्राम गांजा (ट्रायल लंबित)
  6. अपराध संख्या 107/2023 (तेनाली रूरल पुलिस स्टेशन, गुंटूर) – 0.6 किलोग्राम गांजा (ट्रायल लंबित)
  7. अपराध संख्या 52/2025 (गवर्नरपेट पुलिस स्टेशन, एनटीआर जिला) – 41.58 किलोग्राम गांजा (जांच जारी)

निवारक हिरासत का प्रस्ताव 29 अगस्त 2025 को इंस्पेक्टर ऑफ पुलिस, गवर्नरपेट पुलिस स्टेशन (प्रतिवादी संख्या 3) द्वारा शुरू किया गया था। इसे 30 अगस्त 2025 को पुलिस कमिश्नर, एनटीआर जिला (प्रतिवादी संख्या 2) द्वारा राज्य सरकार के प्रमुख सचिव (प्रतिवादी संख्या 1) को भेजा गया, जिन्होंने आखिरकार 29 अक्टूबर 2025 को आदेश जारी किया।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की अधिवक्ता सुश्री नुथक्की सारसा राग वर्षिणी ने तर्क दिया कि यह प्रस्ताव नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी), गृह मंत्रालय द्वारा जारी 28 मार्च 2018 के सर्कुलर नंबर 3 का उल्लंघन करता है। सर्कुलर में अनिवार्य किया गया है कि जीवंत संबंध बनाए रखने के लिए प्रस्ताव घटना के 15 दिनों के भीतर भेजे जाने चाहिए। उन्होंने ध्यान दिलाया कि आपराधिक मामले 2018-2023 और जून 2025 से संबंधित थे, जबकि प्रस्ताव काफी समय बाद भेजा गया, जिससे जीवंत और तात्कालिक संबंध टूट गया। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने रेखांकित किया कि सभी सात मामलों में आरोपी को जमानत मिल चुकी थी, लेकिन डिटेनिंग अथॉरिटी निरोध आदेश पारित करते समय इन जमानत आदेशों पर विचार करने में विफल रही, जिससे उनका विषयपरक संतोष (सब्जेक्टिव सेटिस्फैक्शन) दूषित हो गया। वकील ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय सुशांत कुमार बनिक बनाम त्रिपुरा राज्य और अन्य पर भरोसा जताया।

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प्रतिवादियों की ओर से पेश हुए सरकारी वकील श्री कीर्ति तेजा कोंडावीटी ने तर्क दिया कि हालिया मामलों के साथ-साथ पिछले आपराधिक मामलों पर भी विचार किया जा सकता है। उन्होंने स्वीकार किया कि हालांकि प्रस्ताव के साथ जमानत आदेश भेजे गए थे, लेकिन ग्राउंड नंबर 4 को छोड़कर निरोध आदेश में उनका उल्लेख नहीं था, जहां निरोध प्रस्ताव के बाद जमानत दी गई थी। पीआईटी एनडीपीएस एक्ट की धारा 6(1) और डुंगा कुमारी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए सरकारी वकील ने प्रस्तुत किया कि निरोध के आधार पृथक करने योग्य (severable) हैं, और आदेश को ग्राउंड नंबर 4 के आधार पर स्वतंत्र रूप से कायम रखा जा सकता है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी नजीरें

हाईकोर्ट ने प्रशासनिक सर्कुलर, समय-सीमा की आवश्यकताओं और निवारक हिरासत में विषयपरक संतोष की आवश्यकता को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे की विस्तृत समीक्षा की।

1. सर्कुलर की बाध्यता और 15 दिनों की समय-सीमा पर

एनसीबी के 2018 के सर्कुलर का जिक्र करते हुए, जिसमें कहा गया है कि “प्रस्ताव जल्द से जल्द भेजा जाना चाहिए—आदर्श रूप से घटना के 15 दिनों के भीतर,” हाईकोर्ट ने कमिश्नर ऑफ सेंट्रल एक्साइज एंड सर्विस टैक्स, रोहतक बनाम मेरिनो पैनल प्रोडक्ट लिमिटेड, द पेपर प्रोडक्ट्स लिमिटेड बनाम सीसीई, रानाडे माइक्रोन्यूट्रीएंट्स एंड अन्य बनाम कलेक्टर ऑफ सेंट्रल एक्साइज, कलेक्टर ऑफ सेंट्रल एक्साइज, वडोदरा बनाम धीरेन केमिकल्स इंडस्ट्रीज, कल्याणी पैकेजिंग इंडस्ट्री बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, और कमिश्नर ऑफ सेंट्रल एक्साइज, बोलपुर बनाम रतन मेल्टिंग एंड वायर इंडस्ट्रीज के मामलों का उल्लेख किया।

पीठ ने स्पष्ट किया कि हालांकि कार्यकारी सर्कुलर विभागीय अधिकारियों पर बाध्यकारी होते हैं, लेकिन वैधानिक कानून की व्याख्या करते समय वे अदालतों या ट्रिब्यूनल पर बाध्यकारी नहीं होते। जनरल इंश्योरेंस काउंसिल बनाम आंध्र प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि “पीआईटी एनडीपीएस एक्ट में निरोधात्मक प्राधिकरण को प्रस्ताव भेजने की कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है।” सर्कुलर की 15 दिनों की समय-सीमा का मूल्यांकन करते हुए पीठ ने माना:

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“हालांकि 15 दिनों की समय-सीमा निर्धारित की गई है, लेकिन यह हमें ऐसी अनिवार्य समय-सीमा नहीं लगती जिसके बाद प्रस्ताव न भेजा जा सके। इसे केवल एक आदर्श अवधि के रूप में स्थापित किया गया है।”

2. ‘लाइव और प्रॉक्सिमेट लिंक’ का नियम और अकारण देरी

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 15-दिन की समय-सीमा में कठोरता न होने का मतलब यह नहीं है कि ‘लाइव लिंक’ की मूलभूत आवश्यकता कमजोर हो जाती है। राजिंदर अरोड़ा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, टी.ए. अब्दुल रहमान बनाम केरल राज्य, ख्वाजा बिलाल अहमद बनाम तेलंगाना राज्य, समा अरुणा बनाम तेलंगाना राज्य, गुलाम हुसैन बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, जी. रेड्डैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, पी.यू. इकबाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, और अशोक कुमार बनाम दिल्ली प्रशासन का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि प्रिवेंटिव डिटेंशन पुराने मामलों के आधार पर नहीं लगाया जा सकता।

टी.ए. अब्दुल रहमान मामले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा: “निकटता (Proximity) का परीक्षण कोई कठोर या यांत्रिक परीक्षण नहीं है जिसमें अपराध और हिरासत के आदेश के बीच केवल महीनों की गिनती की जाए।” समा अरुणा मामले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने जोर दिया: “निरोध आदेश व्यक्ति के अतीत के आचरण और आसपास की परिस्थितियों के आलोक में उसके भावी व्यवहार के एक तर्कसंगत पूर्वानुमान पर आधारित होना चाहिए।”

वर्तमान मामले में, पीठ ने प्रस्ताव प्रस्तुत करने (30 अगस्त 2025) और निरोध आदेश पारित करने (29 अक्टूबर 2025) के बीच 139 दिनों की गंभीर देरी को रेखांकित किया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“प्रस्ताव मिलने के 139 दिनों के बाद निरोध आदेश पारित किया गया है। इतनी लंबी अवधि की देरी का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।”

हाईकोर्ट ने माना कि इस अकारण देरी ने डिटेनिंग अथॉरिटी की उदासीनता को दर्शाया, जिससे ‘लाइव एंड प्रॉक्सिमेट लिंक’ टूट गया।

3. जमानत आदेशों पर विचार न करना और आधारों की पृथकता

सुशांत कुमार बनिक, आशा देवी बनाम गुजरात सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव, एस.के. निज़ामुद्दीन बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, और ऋषिकेश तानाजी भोईटे बनाम महाराष्ट्र राज्य का पुनरावलोकन करते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 के कड़े प्रावधानों के तहत जमानत मिलना एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है। जमानत आदेशों को छुपाना या उन पर ध्यान न देना डिटेनिंग अथॉरिटी के विषयपरक संतोष को दूषित करता है।

राज्य ने पीआईटी एनडीपीएस एक्ट की धारा 6 (आधारों की पृथकता) पर भरोसा किया था और मोर्टुजा हुसैन चौधरी बनाम नागालैंड राज्य, प्रकाश चंद्र मेहता बनाम आयुक्त और सचिव, केरल सरकार, वशिष्ठ नारायण करवारिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, और डुंगा कुमारी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि हिरासत केवल ग्राउंड नंबर 4 के आधार पर भी कायम रह सकती है।

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हालांकि, पीठ ने प्रत्येक आधार का अलग-अलग विश्लेषण किया और किसी को भी टिकाऊ नहीं पाया:

  • ग्राउंड नंबर 4 (अपराध सं. 716/2021): यह घटना 8 अगस्त 2021 को हुई थी, और अग्रिम जमानत मिलने तथा सीआरपीसी की धारा 41-ए / बीएनएसएस की धारा 35(बी) के तहत प्रक्रिया पूरी होने के चार साल बाद 2025 में प्रस्ताव भेजा गया था। हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि चार साल बाद प्रिवेंटिव डिटेंशन का सहारा लेना ‘लाइव और प्रॉक्सिमेट लिंक’ के नियम का उल्लंघन करता है।
  • ग्राउंड नंबर 7 (अपराध सं. 52/2025): जमानत दी गई थी लेकिन उस पर विचार नहीं किया गया। यदि निरोध प्रस्ताव के बाद भी जमानत दी गई थी, तब भी अथॉरिटी चैंपियन आर. संगमा बनाम मेघालय राज्य और कमरुन्निसा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में निर्धारित ट्रिपल टेस्ट (कस्टडी की जानकारी, रिहाई की संभावना व पुनः अपराध में संलिप्तता का विश्वसनीय आधार, और निरोध की आवश्यकता) को लागू करने में विफल रही।
  • ग्राउंड नंबर 1 से 3, 5, और 6: निरोध आदेश इन मामलों में दी गई जमानत का उल्लेख या उन पर विचार करने में विफल रहा, जो स्थापित कानूनी आवश्यकताओं का उल्लंघन है।

अपने मूल्यांकन का समापन करते हुए हाईकोर्ट ने कहा: “किसी व्यक्ति के पिछले आचरण और उसे हिरासत में लेने की अनिवार्य आवश्यकता के बीच जो ‘लाइव और प्रॉक्सिमेट लिंक’ होना चाहिए, वह इस मामले में टूट चुका माना जाना चाहिए।” कोर्ट ने इस बात पर बल दिया कि “पुराने मामलों पर आधारित निरोध आदेश को बिना ट्रायल के अपराध की सजा देने वाला आदेश माना जाना चाहिए, भले ही उसे निवारक हिरासत का आदेश कहा गया हो।”

निर्णय

यह पाते हुए कि निरोध आदेश किसी भी आधार पर कायम नहीं रह सकता, हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार कर ली।

पीठ ने टिप्पणी की: “उन आदेशों के तहत हिरासत में रखा जाना अवैध है और हिरासत में लिया गया व्यक्ति रिहा होने का हकदार है।”

हाईकोर्ट ने निरोध आदेश (29 अक्टूबर 2025 का जी.ओ.आर.टी. सं. 1314) और पुष्टि आदेश (12 जनवरी 2026 का जी.ओ.आर.टी. सं. 69) को रद्द कर दिया, और निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में आवश्यकता न हो तो निरुद्ध व्यक्ति निक्का नरेंद्र बाबू को तुरंत रिहा किया जाए।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: पोन्ना रोजा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 5684/2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी
निर्णय की तिथि: 14 जुलाई 2026

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