सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में मेथनॉल की खरीद पर प्रतिबंध लगाने और गैर-दवा निर्माताओं को बिक्री से पहले उसमें कड़वा पदार्थ और रंग मिलाने की अनिवार्यता वाले नियमों को रद्द कर दिया है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि ये प्रावधान मनमाने और असंगत हैं तथा संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) का उल्लंघन करते हैं। कोर्ट ने पाया कि ये नियम अवैध शराब में मेथनॉल के दुरुपयोग को प्रभावी रूप से रोकने में सक्षम नहीं हैं, जबकि वैध उद्योगों पर लगातार भारी बोझ डालते हैं।
मामला महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स, 1972 में वर्ष 2011 में जोड़े गए नियम 18A और 18B की संवैधानिक वैधता से जुड़ा था। नियम 18A के तहत मेथनॉल की खरीद को नियंत्रित करने के साथ गैर-दवा निर्माताओं को इसकी बिक्री से पहले उसमें निर्धारित मात्रा में मिथाइलीन कारमाइन और डेनाटोनियम सैकराइड मिलाना जरूरी किया गया था। नियम 18B में वैध Form A लाइसेंस के बिना पाए गए मेथनॉल को जब्त करने का प्रावधान था।
1991 की जहरीली शराब त्रासदी के बाद बने थे नियम
इन नियमों की पृष्ठभूमि वर्ष 1991 में मुंबई के अंधेरी स्थित छाया बार से जुड़ी जहरीली शराब की घटना थी। करीब 250 लोगों ने ऐसी शराब पी थी जिसमें मेथनॉल था। उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी और घटना में करीब 93 लोगों की मौत हो गई थी।
इसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने तत्कालीन अपर पुलिस महानिदेशक पी.आर. पार्थसारथी की अध्यक्षता में एक समिति बनाई। समिति को त्रासदी के कारणों की जांच और ऐसी घटनाओं को रोकने के उपाय सुझाने का काम दिया गया था। समिति की सिफारिशों के बाद 2011 में महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स में संशोधन किया गया और मेथनॉल को ‘poison’ के रूप में अनुसूची में शामिल किया गया।
नियम 18A के तहत विक्रेता के लिए मेथनॉल बेचने से पहले खरीदार के Form A लाइसेंस की जांच कर उसके इस्तेमाल का उद्देश्य पता करना जरूरी था। गैर-दवा निर्माता को बेचे जाने वाले प्रत्येक 100 लीटर मेथनॉल में एक ग्राम मिथाइलीन कारमाइन और चार ग्राम डेनाटोनियम सैकराइड मिलाने की शर्त भी लगाई गई थी।
इन प्रावधानों को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने मई 2019 में नियमों की वैधता बरकरार रखी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
उद्योगों ने कहा, मेथनॉल का औद्योगिक इस्तेमाल प्रभावित होगा
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट बलबीर सिंह ने दलील दी कि मेथनॉल फॉर्मल्डिहाइड, डिसइंफेक्टेंट, पैराफॉर्मल्डिहाइड, डेकोरेटिव लैमिनेट, पेंट और रेजिन जैसे कई उत्पादों के निर्माण में महत्वपूर्ण कच्चा माल है। इसमें अनिवार्य रूप से रंग और कड़वा पदार्थ मिलाने से यह औद्योगिक इस्तेमाल के लिए अनुपयुक्त हो जाता है।
याचिकाकर्ताओं ने नियमों को असंगत और मनमाना बताते हुए कहा कि ये अनुच्छेद 14 के साथ अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार या व्यवसाय करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हैं।
महाराष्ट्र सरकार ने नियमों का बचाव करते हुए कहा कि रंगहीन और गंधहीन मेथनॉल को शराब में मिलाकर उसका दुरुपयोग किया जा सकता है। राज्य के अनुसार, रंग मिलाने से मेथनॉल की पहचान आसान होती है और कड़वा पदार्थ मिलाने से इसे जानबूझकर या गलती से पीना मुश्किल होता है।
Form A की शर्त को सुप्रीम कोर्ट ने असंगत पाया
सुप्रीम कोर्ट ने नियम 18A(1) की जांच करते हुए पाया कि Form A लाइसेंस की पुष्टि करके मेथनॉल के वास्तविक इस्तेमाल का पता लगाने का उद्देश्य पूरा नहीं होता।
कोर्ट ने कहा कि Form A उन लोगों के लिए है जो जहर की बिक्री करते हैं या बिक्री के उद्देश्य से उसे अपने पास रखते हैं। इसके विपरीत, मेथनॉल को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करने वाले निर्माता के पास सामान्य तौर पर Form A लाइसेंस नहीं होगा।
पीठ ने कहा:
“इस प्रकार नियम 18A वास्तव में Form A लाइसेंस के उद्देश्य को ही बदल देता है, लाइसेंसधारी विक्रेता और खरीदार को एक ही स्तर पर रखता है और Form B परमिट को निरर्थक बना देता है।”
कोर्ट ने पाया कि यह प्रतिबंध अपने घोषित उद्देश्य की तुलना में कहीं अधिक व्यापक था। राज्य के पास कम कठोर विकल्प उपलब्ध थे, जिनमें नियमों का उल्लंघन करने वाले लाइसेंसधारियों का लाइसेंस रद्द करना या उन्हें प्रतिबंधित करना, लाइसेंस के नवीनीकरण के समय कठोर शर्तें लगाना, बचा हुआ मेथनॉल वापस कराना और रिकॉर्ड में गड़बड़ी पर दंडात्मक कार्रवाई करना शामिल था।
रंग और कड़वा पदार्थ मिलाने से नहीं रुकती मेथनॉल की अवैध सप्लाई
नियम 18A(2) पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पार्थसारथी समिति की रिपोर्ट का उल्लेख किया। रिपोर्ट में जहरीली शराब की घटनाओं के पीछे कई कारण बताए गए थे। इनमें गैरकानूनी और बिना लाइसेंस वाले रास्तों से मेथनॉल की सप्लाई, चोरी और डायवर्जन, कानून लागू करने वाली एजेंसियों में भ्रष्टाचार, एथिल और मिथाइल अल्कोहल को लेकर भ्रम तथा एथिल अल्कोहल की तुलना में मेथनॉल का सस्ता होना शामिल था।
कोर्ट के सामने विभिन्न उद्योगों ने बताया कि मेथनॉल में इन पदार्थों को मिलाने से अंतिम उत्पाद में रंग या कड़वे पदार्थ के अंश रह सकते हैं, कैटेलिस्ट को नुकसान हो सकता है और फार्मा तथा प्रयोगशालाओं के लिए उच्च शुद्धता वाला मेथनॉल उपलब्ध कराने में समस्या आ सकती है।
कोर्ट ने कहा:
“पहचान का यह उपाय टाइटैनिक पर डेक की कुर्सियों को फिर से व्यवस्थित करने जैसा है, यानी यह समस्या के सतही पहलू को संबोधित करता है, लेकिन डायवर्जन और चोरी की मूल समस्याओं का समाधान नहीं करता।”
पीठ ने यह भी पाया कि राज्य यह नहीं दिखा सका कि इन पदार्थों को मिलाने से मेथनॉल का लगातार इस्तेमाल रुकेगा या उसकी रासायनिक संरचना ऐसी बदल जाएगी कि उससे जहरीली शराब न बनाई जा सके। राज्य यह भी स्पष्ट नहीं कर सका कि इससे मौतों को निश्चित रूप से कैसे रोका जाएगा।
इसके बाद कोर्ट ने कहा:
“विवादित अधिसूचना स्पष्ट रूप से मनमानी है और जिस उद्देश्य को हासिल करना चाहती है, उससे इसका तर्कसंगत संबंध नहीं है, इसलिए यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है।”
अनुपातिकता की कसौटी पर भी नियम विफल
सुप्रीम कोर्ट ने K.S. Puttaswamy (Privacy-9 J.) v. Union of India में बताए गए अनुपातिकता के सिद्धांत को भी लागू किया।
कोर्ट ने माना कि मेथनॉल मिली शराब के सेवन से होने वाली मौतों को रोकना राज्य का वैध और अत्यंत महत्वपूर्ण उद्देश्य है। लेकिन नियम 18A के तहत खरीद पर लगाए गए प्रतिबंध और नियम 18B के तहत जब्ती की कार्रवाई इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए उपयुक्त उपाय नहीं थे।
पीठ ने कहा कि राज्य यह भी नहीं दिखा पाया कि समान रूप से प्रभावी लेकिन कम प्रतिबंधात्मक उपाय उपलब्ध नहीं थे। कोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स में पहले से मौजूद सुरक्षा उपायों को सही तरीके से लागू करना मेथनॉल की चोरी और डायवर्जन की समस्या से बेहतर तरीके से निपट सकता है।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि उद्योगों पर पड़ने वाला बोझ वास्तविक, भारी और लगातार था, जबकि राज्य जिस लाभ की बात कर रहा था वह केवल एक संभावना थी। इसलिए नियम अनुपातिकता की कसौटी पर विफल रहे और गैर-दवा निर्माताओं के अनुच्छेद 19(1)(g) के अधिकार का उल्लंघन करते हैं।
जहरीली शराब रोकने के लिए राज्यों को कई उपाय सुझाए
नियमों को रद्द करने के साथ सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जहरीली शराब की घटनाएं रोकने के लिए कई उपायों पर विचार करने को कहा।
इनमें पुलिस, आबकारी, परिवहन, उद्योग और स्वास्थ्य विभागों के बीच बेहतर तालमेल, राज्यों की सीमाओं पर कड़ी निगरानी, लाइसेंस और परमिट देने से पहले आवेदकों की उचित जांच, अतिरिक्त या इस्तेमाल न हुए मेथनॉल की समयबद्ध वापसी, स्टॉक और खपत का नियमित मिलान तथा नियम तोड़ने वालों के लाइसेंस या परमिट को निलंबित या रद्द करना शामिल है।
कोर्ट ने मेथनॉल के परिवहन के लिए अलग टैंकर या कंटेनर इस्तेमाल करने, उन्हें छेड़छाड़ का पता लगाने वाली सील से बंद करने और परिवहन तथा भंडारण की कड़ी निगरानी की जरूरत भी बताई। स्वास्थ्य विभागों के लिए जहरीली शराब की बड़ी घटनाओं से निपटने की विशेष व्यवस्था, नशामुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाने, परिवार परामर्श केंद्र स्थापित करने और जन-जागरूकता अभियान चलाने के सुझाव भी दिए गए।
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने नियम 18A और 18B को अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) का उल्लंघन करने वाला मानते हुए याचिकाएं स्वीकार कर लीं और सिविल अपील का निस्तारण कर दिया। रजिस्ट्री को फैसले की एक-एक प्रति सभी हाईकोर्ट और सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को भेजने का निर्देश दिया गया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: एम/एस बालाजी फॉर्मलिन प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य व संबंधित मामले
केस नंबर: रिट पिटीशन (सिविल) नंबर 893/2019 एवं संबंधित मामले; सिविल अपील नंबर 13008/2026
बेंच: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
तारीख: 18 सितंबर 2026

