पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 200 रुपये की कथित रिश्वत के 21 साल से भी ज्यादा पुराने एक मामले में 61 वर्षीय पूर्व सरकारी क्लर्क को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जब रिश्वत मांगने का मुख्य आधार ही संदेह के घेरे में हो, तो पैंट की जेब से केवल नोट बरामद हो जाने से किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायमूर्ति संजय वशिष्ठ की पीठ ने 8 सितंबर के अपने आदेश में वर्ष 2005 के निचली अदालत के उस फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया, जिसके तहत क्लर्क को दो साल की जेल और 2,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता रिश्वत की मांग साबित करने में विफल रहा और उसके परिवार से जुड़ा पुराना विवाद रंजिश की आशंका को पुख्ता करता है।
रिश्वत मांगने की तारीख और समय न बताना बना अभियोजन की कमजोरी
मामले के रिकॉर्ड का विश्लेषण करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि शिकायतकर्ता ने यह स्पष्ट नहीं किया कि आरोपी क्लर्क ने किस निश्चित तारीख या समय पर उससे 200 रुपये की मांग की थी। अदालत के अनुसार, मांग के शुरुआती घटनाक्रम का कोई ठोस ब्योरा न होना अभियोजन पक्ष के दावों को कमजोर करता है।
इसके अतिरिक्त, जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी क्लर्क के पास आवेदक की फाइल से जुड़ा कोई सरकारी काम बाकी नहीं था। लोन की पत्रावली पहले ही स्टेट बैंक ऑफ पटियाला को भेजी जा चुकी थी। ऐसे में क्लर्क के पास शिकायतकर्ता को डिस्पैच नंबर देने या न देने का कोई अधिकार या औचित्य शेष नहीं था।
कर्ज वसूली को लेकर पुरानी रंजिश की संभावना
अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जे एस तूर ने दलील दी कि यह पूरा मामला पुरानी रंजिश के तहत गढ़ा गया था। उन्होंने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता की पत्नी के चाचा ने पहले निगम से कर्ज लिया था और वे उसे चुका नहीं पाए थे। आरोपी क्लर्क अन्य कर्मचारियों के साथ उनके घर वसूली की कानूनी कार्रवाई के लिए गया था।
बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि सतर्कता विभाग की ट्रैप कार्रवाई में शामिल गवाहों में से एक के पिता भी कर्जदार थे, जिनके घर आरोपी क्लर्क राजस्व अधिकारी के साथ वसूली के सिलसिले में पहुंचा था।
हाईकोर्ट ने इन तथ्यों को महत्वपूर्ण माना और टिप्पणी की कि शिकायतकर्ता के मन में क्लर्क के प्रति रंजिश होने की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि जिस व्यक्ति के खिलाफ आरोपी ने पहले वसूली की कार्रवाई की थी, उसके साथ शिकायतकर्ता का पारिवारिक संबंध होना उसकी गवाही का मूल्यांकन करते समय बेहद अहम पहलू बन जाता है।
2000 में शुरू हुआ था पूरा विवाद
यह मामला वर्ष 2000 का है, जब शिकायतकर्ता ने पंजाब अनुसूचित जाति भूमि विकास एवं वित्त निगम में भैंस खरीदने के लिए लोन का आवेदन दिया था। फरवरी 2001 तक लोन की कोई जानकारी न मिलने पर उसने निगम के कार्यालय जाकर वहां तैनात क्लर्क से बात की, लेकिन उसे संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
इसके बाद शिकायतकर्ता स्टेट बैंक ऑफ पटियाला पहुंचा, जहां बैंक अधिकारियों ने उससे निगम कार्यालय से जारी हुआ आवेदन का डिस्पैच नंबर लाने को कहा। शिकायतकर्ता का आरोप था कि जब वह लगभग 15 से 20 दिन बाद निगम के दफ्तर गया, तो क्लर्क ने डिस्पैच नंबर देने की एवज में 200 रुपये की मांग की।
शिकायत के आधार पर सतर्कता ब्यूरो ने जाल बिछाया और कार्रवाई के दौरान क्लर्क की पैंट की बाईं जेब से 100-100 रुपये के दो नोट बरामद किए गए थे।
हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से पेश उप महाधिवक्ता नीरज मदान ने तर्क दिया कि रिश्वत मांगने, उसे स्वीकार करने और नोटों की बरामदगी के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि केवल नोट बरामद होना दोष साबित करने का आधार नहीं बन सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत के दोषसिद्धि और सजा के आदेश को निरस्त करते हुए पूर्व क्लर्क को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।

