शराब पीकर गाड़ी चलाने पर दुर्घटना में नहीं मिलेगा पूरा मुआवजा, कर्नाटक हाईकोर्ट ने काटी 30 फीसदी राशि

शराब पीकर वाहन चलाने वाले लोग सड़क दुर्घटना में घायल होने पर पूरे मुआवजे के हकदार नहीं होंगे। कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में मोटर वाहन अधिनियम जैसे कल्याणकारी कानूनों की आड़ लेकर पूरी राहत का दावा नहीं किया जा सकता। अदालत ने शराब के नशे में दोपहिया चला रहे एक घायल व्यक्ति को दुर्घटना के लिए 30 प्रतिशत जिम्मेदार (कंट्रीब्यूटरी नेग्लिजेंस) मानते हुए मुआवजा राशि में कटौती का फैसला सुनाया है।

कल्याणकारी कानूनों का दायरा असीमित नहीं

जस्टिस के वी अरविंद की पीठ ने 1 सितंबर को पारित अपने आदेश में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि शराब के नशे में वाहन चलाना एक कानूनी अपराध है। जब कोई व्यक्ति नशे की हालत में गाड़ी चलाता है, तो वह न केवल खुद की जान जोखिम में डालता है, बल्कि अन्य राहगीरों, आम जनता और पूरे समाज को खतरे में धकेलता है। अदालत ने जोर देकर कहा कि जब भी ऐसे मामले सामने आएं, तो उनसे सख्ती से निपटा जाना चाहिए।

पीठ ने रेखांकित किया कि मोटर वाहन कानून जैसे प्रावधानों की व्याख्या आमतौर पर उदारता से पीड़ितों के हित में की जाती है, लेकिन इस उदारता को इतना नहीं खींचा जा सकता कि यह कानून का जानबूझकर उल्लंघन करने वालों की ढाल बन जाए। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि ऐसी परिस्थितियों में भी पूरी राहत दी गई, तो इससे गैरकानूनी आचरण को बढ़ावा मिलेगा और सड़क अनुशासन के साथ-साथ कानून-व्यवस्था भी चरमरा जाएगी। इसके साथ ही पीठ ने कहा कि बढ़ती आबादी, वाहनों की बढ़ती तादाद और सड़कों पर बढ़ते दबाव के दौर में प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह यातायात नियमों का पालन करे और साथी चालकों के प्रति संवेदनशीलता दिखाए।

अस्पताल के रिकॉर्ड और लापरवाही का निर्धारण

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यह विवाद सितंबर 2018 में हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है, जिसमें 34 वर्षीय विश्वनाथ घायल हो गए थे। मोटर एक्सीडेंट्स क्लेम ट्रिब्यूनल ने बीमा कंपनी को पूरी मुआवजा राशि विश्वनाथ को देने का निर्देश दिया था, जिसके खिलाफ नेशनल इंश्योरेंस कंपनी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

बीमा कंपनी ने ट्रिब्यूनल के फैसले को दो आधारों पर चुनौती दी थी। पहली दलील यह थी कि अस्पताल में भर्ती के समय तैयार मेडिकल रिकॉर्ड से साबित होता है कि दुर्घटना के वक्त पीड़ित नशे में था, जो हादसे की सीधी वजह बना। दूसरी दलील यह थी कि इमरजेंसी डॉक्टर की शुरुआती पर्ची में ‘मोटरसाइकिल से गिरना’ दर्ज था, जिससे संकेत मिलता है कि यह किसी अन्य वाहन की टक्कर नहीं बल्कि खुद फिसलने की घटना थी।

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हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी की खुद फिसलने वाली दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपातकालीन चिकित्सा कर्मियों का मुख्य ध्यान दुर्घटना का विस्तृत इतिहास लिखने के बजाय तुरंत जान बचाने पर होता है। इसके अलावा रिकॉर्ड से यह भी सिद्ध हुआ कि बीमित कार ने ही मोटरसाइकिल को टक्कर मारी थी।

हालांकि, अदालत ने अस्पताल के उस मेडिकल साक्ष्य को स्वीकार किया जिसमें विश्वनाथ के शरीर में शराब की मौजूदगी की पुष्टि हुई थी। नतीजतन, हाईकोर्ट ने हादसे के लिए 30 प्रतिशत लापरवाही विश्वनाथ की मानी और बीमा कंपनी को मूल फैसले में तय पूरे मुआवजे के भुगतान से राहत प्रदान की।

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