केवल आपराधिक केस लंबित होने के आधार पर चरित्र प्रमाण पत्र देने से इंकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 323, 504 और 506 के तहत आपराधिक मामला लंबित होने के केवल इस आधार पर चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने या उसके नवीनीकरण के आवेदन को खारिज नहीं किया जा सकता। जस्टिस प्रकाश पाडिया और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने जिला मजिस्ट्रेट, जालौन स्थित उरई के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत याचिकाकर्ता के चरित्र प्रमाण पत्र के नवीनीकरण से इंकार कर दिया गया था। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने संबंधित प्राधिकारी को तीन सप्ताह के भीतर मामले पर विचार कर चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता भारत लाल गुप्ता ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर जिला मजिस्ट्रेट, जालौन स्थित उरई (प्रत्यर्थी संख्या 2) द्वारा पारित 1 नवंबर 2021 के उस आदेश को रद्द करने की मांग की थी, जिसके जरिए उनके पूर्व में नवीनीकृत चरित्र प्रमाण पत्र के पुन: नवीनीकरण आवेदन को खारिज कर दिया गया था। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने 4 जनवरी 2021 के अपने आवेदन पर कानून के अनुसार नया आदेश पारित करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया था।

जिला मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 504 (शांति भंग करने के इरादे से अपमान करना) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज केस अपराध संख्या 913/2018 के लंबित होने को आधार बनाते हुए चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने का आवेदन निरस्त कर दिया था।

पक्षकारों की बहस

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अमित कुमार सिंह (अधिवक्ता विष्णु कांत तिवारी की ओर से), अधिवक्ता अजय सेंगर तथा अधिवक्ता मृत्युंजय वर्मा उपस्थित हुए। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि आपराधिक अदालत द्वारा बरी किए जाने का आदेश पारित होने से पहले ही चरित्र प्रमाण पत्र का आवेदन खारिज कर दिया गया था। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवतार सिंह बनाम भारत संघ (2016) 8 SCC 471 के मामले में तय किए गए कानून के आलोक में प्राधिकारी के लिए इस निर्णय पर पुनर्विचार करना आवश्यक था।

याचिकाकर्ता ने अनिल कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (रिट-सी संख्या 718/2025, न्यूट्रल साइटेशन: 2025:AHC-LKO:32272-DB) में 28 मई 2025 को पारित निर्णय पर भरोसा जताया। इसके अलावा हाईकोर्ट के अन्य समान फैसलों का भी हवाला दिया गया, जिनमें नवीन राजहंस बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 5 अन्य (रिट ए संख्या 6543/2023, निर्णय तिथि 28 अप्रैल 2023) और सोनू यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 5 अन्य (रिट ए संख्या 4577/2019, निर्णय तिथि 8 जनवरी 2021) शामिल हैं।

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राज्य सरकार की ओर से पेश विद्वान स्थायी अधिवक्ता ने काउंटर एफिडेविट के पैरा 23 का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता किसी भी राहत का हकदार नहीं है और याचिका खारिज किए जाने योग्य है। हालांकि, राज्य पक्ष ने नवीन राजहंस और सोनू यादव के मामलों में चर्चा की गई कानूनी स्थिति पर कोई विवाद व्यक्त नहीं किया।

अदालत का विश्लेषण और पूर्व उदाहरण

मामले के विश्लेषण में हाईकोर्ट ने अनिल कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य के अपने पिछले निर्णय के पैराग्राफ 19 और 20 को उद्धृत किया:

19. इस मामले में भी आईपीसी की धारा 323, 504 और 506 के तहत दर्ज केस अपराध संख्या 138/2018 के लंबित होने के कारण याचिकाकर्ता को चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने से मना कर दिया गया है।

20. हमारे द्वारा 26.05.2025 के आदेश में दिए गए कारणों के आलोक में, आक्षेपित आदेश को रद्द किया जाता है। संबंधित प्राधिकारी, चाहे वह पुलिस अधीक्षक हों या जिला मजिस्ट्रेट, इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तिथि से तीन सप्ताह की अवधि के भीतर उपर्युक्त उद्धृत आदेश में उल्लेखित प्रारूप पर तथा उसके नियमों के अनुसार प्रमाण पत्र जारी करें।

हाईकोर्ट ने अवतार सिंह बनाम भारत संघ के पैराग्राफ 38 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया:

38.1 नियुक्ता को उम्मीदवार द्वारा दी गई सजा, बरी होने, गिरफ्तारी या आपराधिक मामले के लंबित होने से संबंधित जानकारी, चाहे वह सेवा में प्रवेश से पहले की हो या बाद की, पूरी तरह सत्य होनी चाहिए और आवश्यक जानकारी को छिपाना या गलत तरीके से पेश नहीं किया जाना चाहिए।

38.2 गलत जानकारी देने पर सेवाओं को समाप्त करने या उम्मीदवारी रद्द करने का आदेश पारित करते समय, नियुक्ता ऐसी जानकारी देते समय मामले की विशेष परिस्थितियों, यदि कोई हो, पर ध्यान दे सकता है।

38.3 नियुक्ता निर्णय लेते समय कर्मचारी पर लागू सरकारी आदेशों/निर्देशों/नियमों को ध्यान में रखेगा।

38.4 यदि आपराधिक मामले में संलिप्तता के संबंध में जानकारी छिपाई गई है या गलत जानकारी दी गई है, जहां आवेदन/सत्यापन फॉर्म भरने से पहले ही सजा या बरी होने का फैसला हो चुका था और यह तथ्य बाद में नियुक्ता के संज्ञान में आता है, तो मामले के अनुसार उपयुक्त कार्रवाई की जा सकती है:

38.4.1 मामूली प्रकृति के मामलों में, जिनमें सजा दर्ज की गई थी, जैसे कम उम्र में नारेबाज़ी करना या किसी मामूली अपराध के लिए, जिसे उजागर करने पर भी संबंधित व्यक्ति पद के लिए अयोग्य नहीं ठहरता, नियुक्ता अपने विवेक से ऐसी बात छिपाने या गलत जानकारी को अनदेखा कर भूल को क्षमा कर सकता है।

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38.4.2 जहाँ ऐसी स्थिति में सजा दर्ज की गई है जो मामूली प्रकृति की नहीं है, वहाँ नियुक्ता उम्मीदवार की उम्मीदवारी रद्द कर सकता है या कर्मचारी की सेवा समाप्त कर सकता है।

38.4.3 यदि नैतिक पतन या जघन्य/गंभीर प्रकृति के अपराध से जुड़े मामले में तकनीकी आधार पर बरी किया गया है और यह स्पष्ट रूप से बरी होने का मामला नहीं है, या संदेह का लाभ दिया गया है, तो नियुक्ता पूर्व आचरण से संबंधित सभी प्रासंगिक तथ्यों पर विचार कर सकता है और कर्मचारी को बनाए रखने के संबंध में उचित निर्णय ले सकता है।

38.5 ऐसे मामले में जहां कर्मचारी ने किसी समाप्त हो चुके आपराधिक मामले की पूरी सच्चाई से घोषणा की है, नियुक्ता को फिर भी पूर्व आचरण पर विचार करने का अधिकार है और उसे उम्मीदवार को नियुक्त करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

38.6 ऐसे मामले में जहां चरित्र सत्यापन फॉर्म में मामूली प्रकृति के आपराधिक मामले के लंबित होने के संबंध में सच्चाई से घोषणा की गई है, नियुक्ता मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए अपने विवेक से ऐसे मामले के फैसले के अधीन उम्मीदवार को नियुक्त कर सकता है।

38.7 लंबित कई मामलों के संबंध में जानबूझकर जानकारी छिपाने के मामले में, ऐसी गलत जानकारी स्वयं महत्वपूर्ण हो जाएगी और नियुक्ता उम्मीदवारी रद्द करने या सेवा समाप्त करने का उचित आदेश पारित कर सकता है, क्योंकि जिस व्यक्ति के खिलाफ कई आपराधिक मामले लंबित हैं, उसे नियुक्त करना उचित नहीं हो सकता है।

38.8 यदि आपराधिक मामला लंबित था लेकिन फॉर्म भरते समय उम्मीदवार को इसकी जानकारी नहीं थी, तब भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और नियुक्ति प्राधिकारी अपराध की गंभीरता पर विचार करने के बाद निर्णय लेगा।

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38.9 यदि कर्मचारी सेवा में पुष्ट हो चुका है, तो जानकारी छिपाने या सत्यापन फॉर्म में गलत जानकारी जमा करने के आधार पर सेवा समाप्ति/हटाने या बर्खास्तगी का आदेश पारित करने से पहले विभागीय जांच कराना आवश्यक होगा।

38.10 जानकारी छिपाने या गलत जानकारी का निर्धारण करने के लिए अनुप्रमाणन/सत्यापन फॉर्म विशिष्ट होना चाहिए, अस्पष्ट नहीं। केवल वही जानकारी दी जानी आवश्यक है जो विशिष्ट रूप से मांगी गई थी। यदि ऐसी जानकारी जो मांगी नहीं गई थी लेकिन प्रासंगिक है, नियुक्ता के संज्ञान में आती है तो उपयुक्तता के प्रश्न पर विचार करते समय उस पर निष्पक्ष रूप से विचार किया जा सकता है। हालाँकि, ऐसे मामलों में जानकारी छिपाने या गलत जानकारी देने के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती जो मांगी ही नहीं गई थी।

38.11 किसी व्यक्ति को सत्य छिपाने या असत्य प्रस्तुत करने का दोषी ठहराए जाने से पहले, उस तथ्य का ज्ञान उसके पास होना सिद्ध होना चाहिए।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

उक्त निर्णय के अवलोकन से, जिसके प्रासंगिक अंश ऊपर उद्धृत किए जा चुके हैं, हमारी यह राय है कि आईपीसी की धारा 323, 504 और 506 के तहत उक्त मामला लंबित होने के कारण चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने के आवेदन को खारिज नहीं किया जा सकता था।

निर्णय

हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए जिला मजिस्ट्रेट, जालौन स्थित उरई द्वारा पारित 1 नवंबर 2021 के आदेश को रद्द कर दिया।

अदालत ने जिला मजिस्ट्रेट को आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तिथि से तीन सप्ताह के भीतर निर्धारित प्रारूप में चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया। इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को निर्देशित किया गया कि वे संदर्भित फैसले की प्रमाणित प्रति के साथ इस आदेश की प्रति प्रत्यर्थी संख्या 2 के समक्ष प्रस्तुत करें।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: भारत लाल गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य वाद संख्या: रिट-सी संख्या 32565/2021
पीठ: जस्टिस प्रकाश पाडिया, जस्टिस विवेक सरन
निर्णय की तिथि: 28 जुलाई 2026

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