इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के वरिष्ठ अधिकारी अभिषेक प्रकाश के खिलाफ शुरू की गई खुली सतर्कता जांच और उससे जुड़े प्रशासनिक आदेशों को निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब शिकायतकर्ता ने स्वयं शपथपत्र दाखिल कर यह स्वीकार कर लिया कि शिकायत केवल गलतफहमी के कारण हुई थी, तो उस शिकायत के आधार पर शुरू की गई जांच का विधिक आधार ही समाप्त हो जाता है।
हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने अभिषेक प्रकाश की याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार द्वारा 20 मार्च और 28 मार्च 2025 को जारी दोनों आदेशों के साथ-साथ विजिलेंस जांच की पूरी कार्यवाही को खारिज कर दिया। अदालत ने रेखांकित किया कि प्रथम श्रेणी (ग्रुप-ए) अधिकारियों के खिलाफ जांच के लिए तय नियमों और राज्य सतर्कता समिति की अनिवार्य मंजूरी लिए बिना ही यह कदम उठाया गया था।
औद्योगिक परियोजना और रिश्वत के आरोप
यह पूरा विवाद एक निजी औद्योगिक परियोजना को मंजूरी दिलाने की प्रक्रिया से जुड़ा है। एक कंपनी ने 3 दिसंबर 2024 को सौर सेल और सौर मॉड्यूल निर्माण इकाई लगाने के लिए ‘इन्वेस्ट यूपी’ में आवेदन किया था।
कंपनी के प्रतिनिधि ने 20 मार्च 2025 को एक शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि इन्वेस्ट यूपी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने उन्हें निकान्त जैन नामक व्यक्ति का मोबाइल नंबर सौंपा था। प्रतिनिधि का आरोप था कि उन्हें एम्पावर्ड कमेटी और कैबिनेट से परियोजना को मंजूरी दिलाने के लिए जैन से संपर्क करने को कहा गया। शिकायत में यह भी दावा किया गया कि जैन ने कुल परियोजना लागत के पांच प्रतिशत हिस्से की मांग की थी।
शिकायत मिलते ही पुलिस ने निकान्त जैन के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की। वहीं, उसी दिन शासन स्तर से अभिषेक प्रकाश के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही शुरू कर दी गई और खुली सतर्कता जांच कराने के लिए पत्र भी जारी कर दिया गया।
परियोजना मंजूरी का घटनाक्रम और शिकायतकर्ता का हलफनामा
न्यायालय के समक्ष रखे गए विवरण के अनुसार, सौर ऊर्जा परियोजना का प्रस्ताव सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजर रहा था। मूल्यांकन समिति ने 24 फरवरी, 12 मार्च और 25 मार्च 2025 को तीन अलग-अलग बैठकों में इस प्रस्ताव की समीक्षा की।
समिति ने 12 मार्च की बैठक में यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यीडा) और यूपीपीसीएल से भूमि आवंटन तथा बिजली दरों में रियायत को लेकर अतिरिक्त जानकारी मांगी थी। अपेक्षित जानकारी प्राप्त होने के बाद समिति ने 25 मार्च 2025 की बैठक में इस प्रस्ताव को उच्च स्तरीय अधिकार प्राप्त समिति के समक्ष प्रस्तुत करने की संस्तुति दे दी।
इस मामले में निर्णायक मोड़ तब आया जब कंपनी के अधिकारी विश्वजीत दत्ता ने निकान्त जैन से जुड़े मामले में हाईकोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया। दत्ता ने स्पष्ट किया कि 20 मार्च 2025 की शिकायत केवल भ्रम और गलतफहमी के चलते दर्ज कराई गई थी। उन्होंने स्वीकार किया कि परियोजना पर काम किसी अनुचित कारण से नहीं रुका था, बल्कि यीडा और यूपीपीसीएल से जमीन व अन्य मंजूरियों से जुड़े ब्योरे का इंतजार किया जा रहा था।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
अभिषेक प्रकाश की ओर से पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा ने अदालत को बताया कि कंपनी का प्रस्ताव लगातार नियमानुसार प्रक्रियाधीन था और 25 मार्च को उसे उच्च स्तरीय समिति के पास भेजने की सिफारिश भी की जा चुकी थी। मेहरोत्रा ने तर्क दिया कि 1997 के शासनादेश के अनुसार ग्रुप-ए अधिकारियों के खिलाफ बिना हलफनामे वाली शिकायत पर जांच शुरू नहीं की जा सकती। इसके अलावा, तय नियमों के तहत राज्य सतर्कता समिति से कोई पूर्व स्वीकृति भी नहीं ली गई थी। शिकायतकर्ता द्वारा अपनी भूल मान लिए जाने के बाद जांच की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती।
याचिका का विरोध करते हुए मुख्य स्थायी अधिवक्ता शैलेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए संबंधित प्रशासनिक विभाग ने सतर्कता जांच कराने का फैसला किया था। राज्य सरकार का पक्ष था कि उस समय शिकायत को निराधार या फर्जी मानकर खारिज नहीं किया जा सकता था। हालांकि, सरकार ने यह भी माना कि 1997 का शासनादेश अधिकारियों को झूठी शिकायतों से बचाने के लिए बनाया गया था और शिकायतकर्ता ने बाद में अपनी बात को गलतफहमी बताया है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी और अंतिम निर्णय
सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि ग्रुप-ए अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतों के साथ शपथपत्र अनिवार्य करने का प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि ईमानदार अधिकारियों को झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के जरिए परेशान न किया जा सके।
पीठ ने पाया कि विभागीय जांच शुरू होने के बावजूद सक्षम प्राधिकारियों ने न तो उसके निष्कर्ष की प्रतीक्षा की और न ही तय प्रक्रिया के तहत राज्य सतर्कता समिति से पूर्व अनुमति प्राप्त की। अदालत ने कहा कि जब शिकायतकर्ता ने स्वयं मान लिया कि शिकायत गलतफहमी के चलते दर्ज हुई थी, तो उस पर आधारित समस्त कार्यवाहियों का औचित्य स्वतः समाप्त हो जाता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों सरकारी आदेशों और अभिषेक प्रकाश के खिलाफ चल रही संपूर्ण सतर्कता जांच को निरस्त कर दिया।

