बॉम्बे हाईकोर्ट ने कोर्ट की कार्यवाही की बिना अनुमति मोबाइल फोन से रिकॉर्डिंग करने के मामले में एक जूनियर वकील को ₹25,000 और वकील के क्लर्क को ₹10,000 जमा करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने रिकॉर्डिंग में इस्तेमाल मोबाइल फोन को जब्त करने और उसमें मौजूद डेटा हटाने का भी निर्देश दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्डिंग कानून के तहत आवश्यक अनुमति लिए बिना की गई थी, इसलिए यह गैरकानूनी थी।
जस्टिस जी.एस. कुलकर्णी और जस्टिस डॉ. नीला गोखले की डिवीजन बेंच ने 19 अक्टूबर 2026 को स्लम रिहैबिलिटेशन अथॉरिटी के खिलाफ दाखिल रिट याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया।
सुनवाई के दौरान कैसे सामने आया रिकॉर्डिंग का मामला?
हाईकोर्ट में सुबह 10 बजे पहले से आंशिक रूप से सुनी जा चुकी रिट याचिकाओं पर आगे की सुनवाई शुरू हुई थी। इनमें से दो याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट अमोघ सिंह, एडवोकेट जनय जैन और एडवोकेट अश्विन त्रिपाठी पेश हुए थे।
सुनवाई के दौरान प्रॉथोनोटरी एवं सीनियर मास्टर ए.एच. लद्दड़ कोर्ट के गलियारे से गुजर रहे थे। उन्होंने एक व्यक्ति को कोर्ट की कार्यवाही रिकॉर्ड करते हुए देखा।
वह तुरंत कोर्ट रूम में पहुंचे और इस बारे में बेंच को जानकारी दी।
पूछताछ में संबंधित व्यक्ति ने बताया कि वह एक वकील का क्लर्क है और उसी वकील के एक जूनियर के निर्देश पर कार्यवाही की रिकॉर्डिंग कर रहा था।
बेंच ने कहा,
“कोर्ट की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग कानून के अनुसार आवश्यक अनुमति प्राप्त किए बिना की गई थी और इसलिए यह गैरकानूनी थी।”
कोर्ट की रिकॉर्डिंग पर नियमों में स्पष्ट प्रतिबंध: हाईकोर्ट
इस घटना पर हैरानी जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वकीलों से सबसे पहले अदालत के नियमों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है।
बेंच ने टिप्पणी की,
“इस कोर्ट के वकीले ही वे पहले व्यक्ति हैं, जिनसे कोर्ट के नियमों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है।”
हाईकोर्ट ने कहा कि उसके द्वारा बनाए गए कोर्ट कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग और रिकॉर्डिंग संबंधी नियमों में बिना अनुमति रिकॉर्डिंग पर स्पष्ट प्रतिबंध है। यह प्रतिबंध लाइव-स्ट्रीमिंग और अन्य प्रकार की रिकॉर्डिंग, दोनों पर लागू होता है।
कोर्ट ने नियम 9.2 और 9.3 का उल्लेख किया।
नियम 9.2(v) के अनुसार, कोर्ट द्वारा अधिकृत व्यक्तियों के अलावा कोई भी व्यक्ति कार्यवाही की रिकॉर्डिंग या उसका प्रतिलेखन करने के लिए रिकॉर्डिंग उपकरण का इस्तेमाल नहीं कर सकता।
वहीं, नियम 9.3 सुनवाई के दौरान ऑडियो या वीडियो रिकॉर्डिंग पर रोक लगाता है और बेंच को रिकॉर्डिंग में इस्तेमाल उपकरण जब्त करने का निर्देश देने की अनुमति देता है।
हाईकोर्ट ने हाल ही में सामने आए इसी तरह के एक मामले हाईकोर्ट ऑन इट्स ओन मोशन बनाम श्री विलास शामराव वाघ का भी उल्लेख किया।
उस मामले में कोर्ट ने मोबाइल फोन जब्त करने और जुर्माना लगाने का आदेश दिया था।
बेंच ने उस आदेश में की गई टिप्पणी का उल्लेख किया कि अदालत के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं, लेकिन कार्यवाही में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को संबंधित नियमों का पालन करना और अदालती कार्यवाही की गंभीरता तथा गरिमा का सम्मान करना आवश्यक है।
जूनियर वकील के व्यवहार पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने जूनियर वकील के आचरण पर नाराजगी जताई।
बेंच ने कहा कि संबंधित जूनियर वकील को वकालत के पेशे में अपेक्षित बुनियादी प्रशिक्षण और शिष्टाचार की कमी दिखाई देती है।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“ऐसा प्रतीत होता है कि उसे उस बुनियादी प्रशिक्षण और शिष्टाचार का अभाव है, जिसका पालन एक वकील को करना चाहिए।”
हाईकोर्ट ने कहा कि वह इस मामले में अवमानना की कार्यवाही शुरू कर सकता था और मामले को बार काउंसिल के पास भी भेज सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं करने का फैसला किया।
हालांकि, बेंच ने स्पष्ट किया कि कानून के प्रावधानों का पालन करना आवश्यक है।
मोबाइल फोन जब्त करने और पूरा डेटा हटाने का निर्देश
हाईकोर्ट ने रिकॉर्डिंग में इस्तेमाल मोबाइल फोन को जब्त करने का आदेश दिया।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि वकील और क्लर्क की मौजूदगी में मोबाइल फोन का पूरा डेटा हटाया जाए और यह प्रमाणित किया जाए कि डेटा पूरी तरह हटा दिया गया है।
इस प्रक्रिया का पंचनामा प्रॉथोनोटरी एवं सीनियर मास्टर द्वारा आईटी विभाग के एक अधिकारी के साथ तैयार किया जाएगा।
इसके बाद मोबाइल फोन का कानून के अनुसार निपटान किया जाएगा।
वकील को ₹25,000 और क्लर्क को ₹10,000 जमा करने होंगे
हाईकोर्ट ने क्लर्क विजय जेठमलिया को दो सप्ताह के भीतर मुंबई स्थित हाईकोर्ट एम्प्लॉइज मेडिकल वेलफेयर फंड में ₹10,000 जमा करने का निर्देश दिया।
साथ ही संबंधित वकील को भी इसी फंड में दो सप्ताह के भीतर ₹25,000 बतौर मुकदमे का खर्च जमा करने का आदेश दिया गया।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि भविष्य में इस तरह का आचरण दोहराए जाने या रिकॉर्डिंग पर प्रतिबंध का दोबारा उल्लंघन होने पर मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया जाएगा। ऐसी स्थिति में कोर्ट की अवमानना सहित अन्य कानूनी कार्यवाही की जा सकती है।
दोबारा रिकॉर्डिंग नहीं करने का लिखित आश्वासन देना होगा
हाईकोर्ट ने संबंधित वकील और क्लर्क को उसी दिन लिखित आश्वासन दाखिल करने का निर्देश दिया कि वे भविष्य में ऐसी गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे।
बेंच ने स्पष्ट किया कि यदि वे यह आश्वासन दाखिल नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ कोर्ट की अवमानना अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी।
हाईकोर्ट ने आदेश के अनुपालन की जांच के लिए मामले को 2 नवंबर 2026 को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
केस डिटेल्स
- केस टाइटल: नागेंद्र लालचंद कनोजिया बनाम मुख्य कार्यकारी अधिकारी, स्लम रिहैबिलिटेशन अथॉरिटी एवं अन्य (संबंधित याचिकाओं सहित)
- केस नंबर: रिट याचिका संख्या 811/2024
- बेंच: जस्टिस जी.एस. कुलकर्णी और जस्टिस डॉ. नीला गोखले
- आदेश की तारीख: 19 अक्टूबर 2026
