दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि यौन उत्पीड़न के मामले में बच्ची का यह कहना कि आरोपी का नाखून ‘अंदर लगा था’, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पेनेट्रेशन (प्रवेश) हुआ था। ऐसे आरोप को संदेह से परे साबित करना आवश्यक है।
जस्टिस मधु जैन ने इस आधार पर POCSO अधिनियम की धारा 6 के तहत गंभीर पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न के मामले में आरोपी की दोषसिद्धि और 20 साल की सजा रद्द कर दी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि बच्ची के साथ यौन संपर्क का आरोप पर्याप्त रूप से साबित हुआ था। इसलिए POCSO की धारा 10 के तहत गंभीर यौन उत्पीड़न की दोषसिद्धि और पांच साल के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी गई।
पांच साल की बच्ची से यौन उत्पीड़न का मामला
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 21 जुलाई 2021 को पड़ोस में रहने वाले आरोपी ने लगभग पांच साल नौ महीने की बच्ची का यौन उत्पीड़न किया था।
बच्ची ने अगले दिन अपनी मां को घटना की जानकारी दी। इसके बाद 23 जुलाई 2021 को एफआईआर दर्ज हुई।
AIIMS में बच्ची की आंतरिक चिकित्सकीय जांच के लिए उसके माता-पिता ने सहमति नहीं दी थी।
नवंबर 2023 में साकेत स्थित दक्षिण-पूर्व जिला की विशेष POCSO अदालत ने आरोपी को IPC की धारा 376AB, 354A और 506 तथा POCSO अधिनियम की धारा 6 और 10 के तहत दोषी ठहराया।
ट्रायल कोर्ट ने धारा 6 के तहत 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। अन्य अपराधों की सजाएं साथ-साथ चलनी थीं।
बच्ची के बयानों में अंतर को लेकर बचाव पक्ष की दलील
अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता हर्ष प्रभाकर, ध्रुव चौधरी, साक्षी गुप्ता, शुभम सौरव और विजित सिंह उपस्थित हुए।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि बच्ची के बयानों में घटना के स्थान और कथित कृत्य की प्रकृति को लेकर अंतर था।
उन्होंने कहा कि CrPC की धारा 161 के तहत दिए बयान में बच्ची ने उंगली अंदर डालने की बात कही थी, जबकि धारा 164 के बयान और अदालत में मुख्य परीक्षण के दौरान उसने छूने का उल्लेख किया।
बचाव पक्ष के अनुसार, चिकित्सकीय और फोरेंसिक साक्ष्य भी पेनेट्रेशन की पुष्टि नहीं करते थे।
उन्होंने दलील दी कि अधिकतम यह मामला POCSO की धारा 9 और 10 के तहत गंभीर यौन उत्पीड़न का बनता है। इसके समर्थन में Ram Preet v. State फैसले का उल्लेख किया गया।
राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक मीनाक्षी दहिया तथा अधिवक्ता वंशिका सिंह और अपूर्वा खोसला उपस्थित हुए।
अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित हुआ था और ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि उचित थी।
बच्ची की ओर से अधिवक्ता आस्था (DHCLSC) और मेघा सिंह उपस्थित हुईं।
‘अंदर लगा था’ कहने से उंगली अंदर डालना साबित नहीं होता
हाईकोर्ट ने बच्ची की गवाही की जांच करते हुए पाया कि उसने आरोपी की स्पष्ट पहचान की थी और उसका बयान यौन संपर्क की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त था।
हालांकि, पेनेट्रेशन के आरोप पर कोर्ट अलग निष्कर्ष पर पहुंचा।
ट्रायल कोर्ट ने बच्ची से पूछा था कि आरोपी का नाखून कहां लगा था। इसके जवाब में उसने ‘अंदर लगा था’ कहा था।
हाईकोर्ट ने पाया कि यह जवाब नाखून लगने की जगह बताने के संदर्भ में दिया गया था।
कोर्ट ने कहा:
“इससे स्पष्ट रूप से यह स्थापित नहीं होता कि अपीलकर्ता ने अपनी उंगली या नाखून बच्ची की योनि या मूत्रमार्ग के अंदर डाला था।”
बेंच ने स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज बयान अपने आप में मूल साक्ष्य नहीं होते। इसलिए पहले बयान में उंगली अंदर डालने का आरोप होने मात्र से पेनेट्रेशन साबित नहीं माना जा सकता।
कम उम्र के बच्चे से सटीक शारीरिक विवरण की अपेक्षा नहीं, लेकिन अपराध के तत्व साबित होने चाहिए
जस्टिस मधु जैन ने बच्ची की कम उम्र और यौन उत्पीड़न के मामलों में बच्चों की गवाही से जुड़ी कठिनाइयों को भी ध्यान में रखा।
कोर्ट ने कहा:
“यह अदालत पीड़िता की कम उम्र और इस तथ्य से अवगत है कि किसी बच्चे से यौन उत्पीड़न की घटना का शारीरिक संरचना के अनुसार बिल्कुल सटीक विवरण देने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। फिर भी, पेनेट्रेशन का आवश्यक तत्व साक्ष्यों से पर्याप्त निश्चितता के साथ सामने आना चाहिए।”
हाईकोर्ट ने Ram Preet, Jeetu Ranjeet और Hamid Khan फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा:
“जहां साक्ष्य यौन स्पर्श को साबित करते हैं, लेकिन पेनेट्रेशन स्थापित नहीं कर पाते, वहां दोषसिद्धि उसी अपराध के अनुरूप होनी चाहिए जो वास्तव में साबित हुआ है।”
चोट नहीं होने से पेनेट्रेशन की संभावना खारिज नहीं होती
चिकित्सकीय साक्ष्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शरीर पर चोट के निशान नहीं मिलने से अपने आप पेनेट्रेशन की संभावना समाप्त नहीं होती।
कोर्ट ने कहा:
“चोटों का अभाव अपने आप में पेनेट्रेशन को खारिज नहीं करता और न ही आंतरिक जांच नहीं होने के आधार पर पीड़िता या उसके माता-पिता के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जा सकता है।”
हालांकि, वर्तमान मामले में चिकित्सकीय साक्ष्यों से भी उंगली अंदर डालने की पुष्टि नहीं हुई।
हाईकोर्ट ने Deepak in JC v. State Govt. of NCT Delhi फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि POCSO अधिनियम के तहत लागू वैधानिक अनुमान पूर्ण या निरपेक्ष नहीं हैं। अभियोजन पक्ष को पहले अपराध से जुड़े बुनियादी तथ्य स्थापित करने होते हैं।
कोर्ट ने घटना के स्थान को लेकर विरोधाभास और एफआईआर दर्ज कराने में देरी संबंधी बचाव पक्ष की आपत्तियां खारिज कर दीं।
हाईकोर्ट ने माना कि इन आधारों पर बच्ची के साथ यौन स्पर्श होने संबंधी उसकी गवाही अविश्वसनीय नहीं होती।
20 साल की सजा रद्द, पांच साल का कठोर कारावास बरकरार
दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली।
कोर्ट ने IPC की धारा 376AB और POCSO अधिनियम की धारा 6 के तहत आरोपी को बरी करते हुए 20 साल के कठोर कारावास की सजा रद्द कर दी।
हालांकि, POCSO की धारा 9(m) के तहत अपराध, जो धारा 10 के अंतर्गत दंडनीय है, उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी गई।
इस अपराध के लिए पांच साल का कठोर कारावास और 10,000 रुपये का जुर्माना कायम रखा गया।
IPC की धारा 354A और 506(1) के तहत दोषसिद्धि भी POCSO की धारा 42 के अधीन बरकरार रही।
हाईकोर्ट ने जेल अधीक्षक को निर्देश दिया कि आरोपी द्वारा अब तक जेल में बिताई गई अवधि की गणना की जाए। यदि वह पांच साल की सजा पूरी कर चुका है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।
कोर्ट ने बच्ची को दिए गए मुआवजे में कोई बदलाव नहीं किया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Vishnu Prasad v. State of NCT of Delhi
केस नंबर: CRL.A. 269/2024
पीठ: जस्टिस मधु जैन
फैसले की तारीख: 30 अक्टूबर 2026
