दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 2020 के पूर्वोत्तर दिल्ली दंगों से जुड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं।
दोनों आरोपियों को यह झटका निचली अदालत द्वारा 4 जुलाई को तीसरी बार उनकी ज़मानत याचिकाएं खारिज किए जाने के बाद हाईकोर्ट का रुख करने पर लगा है। इस मामले में शरजील इमाम को 25 अगस्त 2020 और उमर खालिद को 13 सितंबर 2020 को गिरफ्तार किया गया था। दोनों तभी से जेल में बंद हैं।
आरोप तय न होने और सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका की दलील
उमर खालिद की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता त्रिदीप पेस ने अदालत के समक्ष दलील दी कि पिछली कार्यवाहियों के बाद से परिस्थितियों में तीन “छोटे बदलाव” आए हैं। उन्होंने अपने पक्ष के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी संदर्भ दिया।
वरिष्ठ अधिवक्ता पेस ने रेखांकित किया कि मामले में अब तक औपचारिक आरोप तय नहीं किए गए हैं और इसी वजह से अभियोजन पक्ष के गवाहों से पूछताछ भी शुरू नहीं हो सकी है। हाईकोर्ट ने भी अपने आदेश में दर्ज किया कि मामले में आरोप तय होना अभी बाकी है।
बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि इस प्रकरण से जुड़ी एक विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इससे पहले निचली अदालत ने भी संकेत दिया था कि वह आगे बढ़ने से पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रतीक्षा करेगी।
दिल्ली पुलिस ने ‘मास्टरमाइंड’ बताकर ज़मानत का किया कड़ा विरोध
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट में दोनों आरोपियों की ज़मानत याचिकाओं का जोरदार विरोध करते हुए उन्हें दंगों का “मास्टरमाइंड” बताया।
अभियोजन पक्ष ने अन्य सह-आरोपियों के साथ समानता (पैरिटी) के आधार पर राहत दिए जाने का विरोध किया। पुलिस का तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही दोनों को “कमांड अथॉरिटी” का हिस्सा माना था और यह स्पष्ट किया था कि उनकी “जोखिम प्रोफाइल” लगातार हिरासत में रखे जाने को उचित ठहराती है।
पुलिस ने यह भी कहा कि ये नई ज़मानत याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी के निर्देश के विपरीत हैं। उस निर्देश के तहत दोनों आरोपी संरक्षित गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद या एक साल की समयसीमा पूरी होने पर ही रिहाई की मांग कर सकते थे—जो भी पहले हो। निचली अदालत ने 4 जुलाई को खालिद की ज़मानत याचिका खारिज करते हुए कहा था कि उसके पास सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी के आदेश का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, इसलिए वह न तो याचिका पर विचार कर सकती है और न ही राहत दे सकती है।
अदालती कार्यवाहियों की पृष्ठभूमि और सह-आरोपियों को मिली राहत
इससे पहले, 2 सितंबर 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ ने उमर खालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी को हाईकोर्ट के इस फैसले को बरकरार रखा था। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने पाया था कि खालिद और इमाम के खिलाफ यूएपीए के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है। हालांकि, उसी 5 जनवरी के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पांच सह-आरोपियों—गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को राहत दे दी थी।
इसके बाद 22 मई को सुप्रीम कोर्ट ने दो अन्य सह-आरोपियों अब्दुल खालिद सैफी और तस्लीम अहमद को छह महीने की अंतरिम ज़मानत दी थी। साथ ही, अदालत ने यूएपीए के कड़े ज़मानत प्रावधानों के चलते विचाराधीन कैदियों की लंबी कैद से जुड़े कानूनी मुद्दे को एक बड़ी पीठ के पास विचारार्थ भेज दिया था।

