मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी की आधी पेंशन रोकने के प्रशासनिक आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुशासनात्मक प्राधिकरण कर्मचारी का विस्तृत पक्ष सुने बिना और कोई ठोस कारण बताए बिना सजा का आदेश पारित नहीं कर सकता।
जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की पीठ ने मूल दंड आदेश के साथ-साथ अपीलीय प्राधिकारी के उस फैसले को भी निरस्त कर दिया, जिसने इस कार्रवाई को सही ठहराया था। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने अनुशासनात्मक प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि वह पूर्व कर्मचारी द्वारा प्रस्तुत लिखित जवाब का पुनः मूल्यांकन करे और एक तर्कसंगत व स्पष्ट आदेश जारी करे।
अनुशासनात्मक कार्रवाई में प्रक्रियात्मक चूक
यह मामला 15 अक्टूबर 2025 के उस प्रशासनिक आदेश से जुड़ा है, जिसके तहत विभागीय जांच में आरोप साबित होने के बाद राज्य सेवा नियमों के तहत कर्मचारी की 50 प्रतिशत पेंशन रोकने का दंड दिया गया था।
याचिकाकर्ता का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता प्रशांत शर्मा ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल ने 5 अगस्त 2025 को चार्जशीट और जांच रिपोर्ट के खिलाफ 17 पन्नों का विस्तृत जवाब दाखिल किया था। हालांकि, अनुशासनात्मक प्राधिकरण ने इस व्यापक प्रतिवेदन में उठाए गए किसी भी आधार पर विचार किए बिना ही पेंशन कटौती का फैसला सुना दिया। इसके बाद कर्मचारी ने इस आदेश के खिलाफ अपील की, जिसे अपीलीय प्राधिकारी ने 5 जून को बिना शुरुआती प्रक्रियात्मक चूक को सुधारे खारिज कर दिया।
राज्य सरकार की दलीलें खारिज
राज्य सरकार की ओर से पेश हुए सरकारी वकील धर्मेंद्र नायक ने प्रशासनिक कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि विभागीय जांच में आरोप साबित होने के कारण सजा पूरी तरह न्यायसंगत थी। उन्होंने तर्क दिया कि अपीलीय निकाय द्वारा पूरा केस रिकॉर्ड देखने के बाद ही फैसला बरकरार रखा गया था, इसलिए इसमें न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया। 18 अगस्त को सुनवाई के दौरान जस्टिस बहरावत ने कहा कि विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग करने वाले अधिकारियों को तार्किक, विवेकपूर्ण और रिकॉर्ड के आधार पर काम करना चाहिए।
प्राथमिक स्तर पर कारण बताना अनिवार्य
हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि अर्ध-न्यायिक शक्तियों का इस्तेमाल करने वाले निकायों के लिए एक स्पष्ट और कारण सहित आदेश (स्पीकिंग ऑर्डर) देना अनिवार्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुशासनात्मक प्राधिकरण द्वारा शुरुआती स्तर पर कारण दर्ज न करने की गंभीर कमी को बाद में अपीलीय आदेश में कारण देकर पूरा नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि निर्णय में ठोस कारणों का उल्लेख होना निष्पक्ष प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। इससे यह साबित होता है कि सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का निष्पक्ष रूप से आकलन किया गया है, जो प्रशासनिक न्याय व्यवस्था में जनविश्वास बनाए रखने के लिए जरूरी है।

