यूपी चयन नियमावली 1998 पुराने दिशा-निर्देशों पर प्रभावी; ‘डॉक्ट्रिन ऑफ नेसेसिटी’ के तहत परिणाम घोषित करने के लिए अध्यक्ष सक्षम: इलाहाबाद हाईकोर्ट

उत्तर प्रदेश के अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में प्रधानाचार्यों की नियुक्ति की वैधानिक प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निर्णय दिया है कि संस्था प्रधान के पदों पर चयन पुराने प्रशासनिक दिशा-निर्देशों के बजाय उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड नियमावली, 1998 में निर्धारित मेरिट व्यवस्था के अनुसार ही होना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठतम तदर्थ या कार्यवाहक शिक्षक वैधानिक ढांचे के विपरीत सीधी भर्ती के अभ्यर्थियों पर किसी स्वतः वरीयता का दावा नहीं कर सकते। इसके साथ ही कोर्ट ने माना कि ‘डॉक्ट्रिन ऑफ नेसेसिटी’ (आवश्यकता के सिद्धांत) के तहत चयन बोर्ड के सभी सदस्यों के सेवानिवृत्त हो जाने के बावजूद अंतिम चयन सूची घोषित करने के लिए बोर्ड के अध्यक्ष पूरी तरह से सक्षम थे। जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने इन निष्कर्षों के साथ नवंबर 2022 में जारी चयन सूचियों को चुनौती देने वाली 115 रिट याचिकाओं के पूरे बैच को खारिज कर दिया और वर्ष 2013 से लंबित इस भर्ती प्रक्रिया को उसके तार्किक अंत तक पहुंचाने का निर्देश दिया।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड द्वारा 31 दिसंबर 2013 को जारी विज्ञापन संख्या 03/2013 से शुरू हुआ था। यह विज्ञापन प्रदेश के इंटरमीडिएट और हाईस्कूल स्तर के बालक एवं बालिका विद्यालयों में प्रधानाचार्यों और प्रधानाध्यापकों के रिक्त पदों को भरने के लिए निकाला गया था। रिक्तियों के सत्यापन के बाद बोर्ड ने एक संशोधित विज्ञापन जारी किया, जिसमें आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 25 फरवरी 2014 निर्धारित की गई।

लंबे समय तक चले मुकदमों और अंतरिम आदेशों के बाद बोर्ड ने 1 और 2 जनवरी 2022 को शुद्धिपत्र (कॉरिजेंडम) जारी कर पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन मोड में स्थानांतरित किया। अभ्यर्थियों को अपने विवरण सत्यापित करने और 8 जनवरी 2022 तक अधिकतम तीन संस्थाओं का विकल्प (वरीयता) ऑनलाइन भरने का निर्देश दिया गया। पात्रता की कट-ऑफ तिथि को हाईकोर्ट ने मोहन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में पहले ही वैध ठहराया था। इसके बाद बोर्ड ने 22 फरवरी 2022 को इंटरव्यू कार्यक्रम अधिसूचित किया और मार्च 2022 में प्रदेश के विभिन्न मंडलों में इंटरव्यू संपन्न कराए गए।

इसके उपरांत 11 और 13 नवंबर 2022 को चयन बोर्ड ने मंडलवार अंतिम चयन पैनल अधिसूचित कर दिए। इस परिणाम के खिलाफ डॉ. संजय कुमार मिश्रा व अन्य वरिष्ठ प्रवक्ताओं द्वारा 115 रिट याचिकाएं दायर की गईं। ये सभी याचिकाकर्ता विभिन्न संस्थाओं में कार्यवाहक प्रधानाचार्य के रूप में कार्यरत थे और चयन प्रक्रिया में शामिल होने के बावजूद सफल नहीं हो सके थे।

हाईकोर्ट ने सुनवाई की सुगमता के लिए इन 115 याचिकाओं को तीन श्रेणियों में विभाजित किया:

  • श्रेणी-ए: वे कार्यवाहक प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक जो आवेदन की अंतिम तिथि यानी 25 फरवरी 2014 को निर्धारित पात्रता पूरी नहीं करते थे (क्रम संख्या 1 से 20)।
  • श्रेणी-बी: वे कार्यवाहक प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक जो अपनी याचिकाओं के लंबित रहने के दौरान ही अधिवर्षता आयु (सुपरएनुएशन) पूरी कर सेवानिवृत्त हो चुके थे (क्रम संख्या 21 से 37)।
  • श्रेणी-सी: वे अभ्यर्थी और कार्यवाहक प्रधानाचार्य जिन्होंने इंटरव्यू में भाग लिया था, लेकिन कुल प्राप्तांक कम होने के कारण चयनित नहीं हो सके (क्रम संख्या 38 से 115)।

विबंध (एस्ट्रोपेल) पर प्रारंभिक आपत्ति

सुनवाई की शुरुआत में ही प्रतिवादियों ने प्रारंभिक आपत्ति उठाई कि याचिकाकर्ताओं ने बिना किसी विरोध के पूरी इंटरव्यू प्रक्रिया में स्वेच्छा से भाग लिया था। ऐसे में असफल घोषित होने के बाद वे चयन प्रक्रिया और उसके मानदंडों को चुनौती नहीं दे सकते, क्योंकि वे विबंध के सिद्धांत से बंधे हैं।

इसके जवाब में याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्णयों—रामजीत सिंह करदम बनाम संजीव कुमार, राजस्थान हाईकोर्ट बनाम रजत यादव और डॉ. (मेजर) मीता सहाय बनाम बिहार राज्य का हवाला दिया गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यदि चयन प्राधिकारी बिना पूर्व सूचना के मानदंडों में बदलाव करता है या प्रक्रिया में स्पष्ट वैधानिक अवैधता होती है, तो चयन में शामिल होने मात्र से किसी अभ्यर्थी के संवैधानिक अधिकारों पर विबंध लागू नहीं होता।

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हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों की इस प्रारंभिक आपत्ति को खारिज कर दिया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं के मूल कानूनी प्रश्न—कि क्या बोर्ड ने इंद्र राज सिंह यादव बनाम यूपी माध्यमिक शिक्षा सेवा आयोग में अनुमोदित दिशा-निर्देशों से मनमाना विचलन किया है—की जांच किए बिना उन्हें प्रारंभिक स्तर पर ही अदालत से बाहर नहीं किया जा सकता।

पक्षकारों की दलीलें

1. अकेले अध्यक्ष द्वारा परिणाम घोषित किए जाने की वैधता याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे व अन्य वकीलों ने तर्क दिया कि उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा (सेवा चयन बोर्ड) अधिनियम, 1982 की धारा 4 के तहत बोर्ड एक बहु-सदस्यीय निकाय है, जिसमें एक अध्यक्ष और दस सदस्य होते हैं। वर्ष 1998 के प्रथम विनियम के विनियम 4(6) का हवाला देते हुए—जिसमें बोर्ड की बैठक के लिए कुल सदस्यों के आधे कोरम का होना अनिवार्य है—और “शैकलटन ऑन द लॉ एंड प्रैक्टिस ऑफ मीटिंग्स” का संदर्भ देकर उन्होंने कहा कि बैठक के लिए एक से अधिक व्यक्तियों का होना अनिवार्य है। ऐसे में जब सभी सदस्य पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके थे, तब अकेले अध्यक्ष द्वारा परिणाम जारी करना अधिकार क्षेत्र से बाहर और अवैध है।

इसके विपरीत, प्रतिवादियों और चयन बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जी.के. सिंह, अधिवक्ता के. शाही व अन्य ने दीपक कुमार अग्रवाल बनाम यूपी राज्य, चरण लाल साहू बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया बनाम डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी, ललित कुमार मोदी बनाम बीसीसीआई और बाबासाहेब वसाड़े बनाम मनोहर गंगाधर मुड्डेेश्वर का हवाला दिया। उन्होंने दलील दी कि मार्च 2022 में इंटरव्यू के समय सभी सदस्य मौजूद थे और उन्होंने मेरिट निर्धारण में सक्रिय भाग लिया था। सदस्यों के कार्यकाल समाप्ति के बाद केवल परिणाम की औपचारिक घोषणा की गई थी, जो कि एक प्रशासनिक कार्य था। यह कदम ‘डॉक्ट्रिन ऑफ नेसेसिटी’ के तहत पूरी तरह वैध है, अन्यथा एक दशक पुरानी भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह शून्य और निष्फल हो जाती।

2. इंद्र राज सिंह यादव दिशा-निर्देशों की प्रासंगिकता मूल चयन पद्धति पर याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इंद्र राज सिंह यादव मामले में तय व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक संस्था के लिए दो वरिष्ठतम शिक्षकों के साथ ग्रेडेड लिस्ट से शीर्ष पांच सामान्य अभ्यर्थियों को मिलाकर सात अभ्यर्थियों का एक पूल बनाया जाना था। यदि वरिष्ठ शिक्षक उन सातों में सर्वोच्च अंक प्राप्त करता तो उसका चयन तय था; केवल उसके असफल होने पर ही वह पद अन्य प्रत्यक्ष अभ्यर्थियों के लिए खुलता। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि बोर्ड ने संस्थावार 1:5 का यह अनुपात न अपनाकर सभी प्रथम वरीयता वाले अभ्यर्थियों की एक समग्र मेरिट सूची बनाई, जिससे वरिष्ठ शिक्षकों के चयन के अवसर समाप्त हो गए और यह तेज प्रकाश पाठक बनाम राजस्थान हाईकोर्ट में प्रतिपादित “खेल के बीच में नियम बदलने” के सिद्धांत का उल्लंघन है।

इसके जवाब में बोर्ड और चयनित अभ्यर्थियों के वकीलों ने स्पष्ट किया कि इंद्र राज सिंह यादव के दिशा-निर्देश वर्ष 1983 की पुरानी नियमावली के तहत बने थे, जिसमें क्वालिटी पॉइंट मार्क्स और संरचित इंटरव्यू का कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान नहीं था। वर्ष 1998 में बने नए नियमों (जिसकी वैधता सुप्रीम कोर्ट ने बलबीर कौर केस में बरकरार रखी थी) ने पूरी प्रक्रिया का एक संपूर्ण कोड प्रस्तुत किया। नियम 11(2)(ब) और नियम 12(8) के तहत चयन पूर्णतः क्वालिटी पॉइंट और इंटरव्यू के कुल प्राप्तांकों की खुली मेरिट पर आधारित है, जिसमें पुराने 1:5 अनुपात या स्वतः वरीयता का कोई वैधानिक स्थान नहीं है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष

1. ‘डॉक्ट्रिन ऑफ नेसेसिटी’ और अध्यक्ष की कार्यवाही पर पहले कानूनी बिंदु पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि मार्च 2022 में इंटरव्यू के समय बोर्ड पूरी तरह क्रियाशील था और सदस्यों ने मूल्यांकन में भाग लिया था। परिणाम घोषित होने तक सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होना एक वास्तविक प्रशासनिक विवशता थी।

याचिकाकर्ताओं के इस तर्क को खारिज करते हुए कि आवश्यकता का सिद्धांत केवल पूर्वाग्रह (बायस) से जुड़े मामलों में ही लागू होता है, कोर्ट ने कहा:

“…आवश्यकता के सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ नेसेसिटी) को केवल पूर्वाग्रह (बायस) के मामलों तक ही सीमित नहीं किया जा सकता; बल्कि इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। जब किसी प्रशासनिक विवशता और किसी प्राधिकरण द्वारा सार्वजनिक कर्तव्य के निर्वहन के दौरान ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाए जहां शून्यता पैदा होने और पूरी प्रशासनिक कवायद के निष्फल हो जाने की आशंका हो, तो प्रक्रिया को बचाने के लिए आवश्यकता के सिद्धांत का पूरी तरह से सहारा लिया जा सकता है, जैसा कि वर्तमान मामले में किया गया है। यहां इंटरव्यू के समय सदस्य उपलब्ध थे और केवल उस समय विवशता उत्पन्न हुई जब चयन सूची घोषित की जानी थी और अकेले अध्यक्ष को ही इसे घोषित करना पड़ा; और केवल मंत्रालयिक व प्रशासनिक कर्मचारियों की उपस्थिति मात्र से पूरी प्रक्रिया दूषित नहीं हो जाती।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम या विनियमों में अध्यक्ष द्वारा अकेले कार्य करने पर कोई नकारात्मक या निषेधात्मक प्रतिबंध नहीं है। अतः अध्यक्ष की यह घोषणा 2013 से चल रही प्रक्रिया को निरर्थक होने से बचाने के लिए कानूनी दायरे में थी।

2. पुराने दिशा-निर्देशों पर 1998 की नियमावली की सर्वोच्चता दूसरे बिंदु पर कोर्ट ने 1983 के ढांचे और 1998 की नियमावली के अंतर का विस्तृत विश्लेषण किया। कोर्ट ने कहा कि नियम 11(2)(ब) के तहत प्रबंध समिति को केवल दो वरिष्ठतम शिक्षकों के नाम और सेवा रिकॉर्ड भेजने की बाध्यता है ताकि उन्हें इंटरव्यू में अनिवार्य रूप से बुलाया जा सके, लेकिन अंतिम चयन नियम 12 के तहत सीधी भर्ती के कड़े मेरिट मानकों से ही होगा।

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वरिष्ठ शिक्षकों द्वारा स्वतः वरीयता के दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया:

“…नियमावली, 1998 के नियम 12(8) को देखते हुए, बोर्ड को अभ्यर्थियों द्वारा प्राप्त अंकों के आधार पर मेरिट के क्रम में एक पैनल तैयार करना होता है, जो उप-खंड (iv) या उप-खंड (v), जैसी भी स्थिति हो, के तहत प्राप्त अंकों को जोड़ने के बाद निर्धारित किया जाता है; और इसलिए सीधे आवेदकों की तुलना में कोई प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। जैसा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा दावा किया गया है, जो दो वरिष्ठतम प्रवक्ताओं में से हैं, नियमावली, 1998 के नियम 12 के विपरीत ऐसी प्राथमिकता की कोई भी व्याख्या वैधानिक प्रावधान का उल्लंघन करेगी।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि केवल पांच अभ्यर्थियों तक ही इंटरव्यू सीमित रखा जाता, तो उच्च अंक पाने वाले कई अन्य योग्य अभ्यर्थी बाहर हो जाते, जो कि नियम 12(8) की मूल भावना के खिलाफ होता। कोर्ट ने निष्कर्ष दिया कि इंद्र राज सिंह यादव के दिशा-निर्देश 1983 के सीमित नियमों के लिए थे और 1998 के वैधानिक नियमों के प्रभावी होने के बाद वे स्वतः निष्प्रभावी हो चुके हैं।

3. श्रेणी-ए और श्रेणी-बी की याचिकाओं का निस्तारण विशिष्ट श्रेणियों के संबंध में कोर्ट ने तय किया:

  • श्रेणी-ए: पात्रता का निर्धारण आवेदन की अंतिम तिथि (25 फरवरी 2014) के आधार पर ही किया जाना अनिवार्य है। उस तिथि को अपात्र पाए गए अभ्यर्थियों को चयन प्रक्रिया को चुनौती देने का कोई विधिक अधिकार (लोकस स्टैंडी) नहीं है।
  • श्रेणी-बी: कमेटी ऑफ मैनेजमेंट, जगदीश शरण राजवंशी कन्या इंटर कॉलेज बनाम संयुक्त शिक्षा निदेशक, आर.एल. प्रसाद बनाम यूपी राज्य, कुमारी चित्रा घोष बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और डॉ. एन.सी. सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के नज़ीरों का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिवर्षता आयु पूरी कर चुके शिक्षकों का नियमित चयन होने के बाद पद पर बने रहने या नियुक्ति पत्र पाने का कोई निहित अधिकार नहीं बचता।

अंतिम निर्णय

चयन बोर्ड द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में किसी प्रकार की अवैधता न पाते हुए हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया।

कोर्ट ने निर्देश दिया:

“उपरोक्त के आलोक में, याचिकाओं का पूरा बैच खारिज किया जाता है; और इसके परिणाम प्रभावी होंगे, जबकि वर्ष 2013 में शुरू की गई चयन प्रक्रिया को उसके तार्किक अंत तक पहुंचाया जाएगा। हालांकि, लागत के संबंध में कोई आदेश नहीं होगा।”

निर्णय के अंत में कोर्ट ने रिसर्च एसोसिएट सुश्री प्रतिभा वर्मा द्वारा किए गए शोध कार्य की भी सराहना की।

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अधिवक्ताओं की उपस्थिति

अदालत में बहस करने वाले प्रमुख अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे (साथ में अधिवक्ता मोहम्मद यासीन, अधिवक्ता सिद्धार्थ खरे के निर्देश पर); अधिवक्ता पी.के. मिश्रा; अधिवक्ता संजय कुमार कुशवाहा; अधिवक्ता अनुराग शुक्ला; अधिवक्ता राघवेंद्र त्रिपाठी; अधिवक्ता राहुल जैन; अधिवक्ता संदीप कुमार; अधिवक्ता राम सकल यादव; अधिवक्ता नरेंद्र सिंह; अधिवक्ता महेश शर्मा; अधिवक्ता पी.के. सिंह; अधिवक्ता नंद लाल पांडेय और अधिवक्ता सुयश पांडेय; अधिवक्ता एम.एम. सहाय; तथा अधिवक्ता भीम सिंह व अधिवक्ता आलोक सिंह।
  • प्रतिवादियों की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता जी.के. सिंह (साथ में अधिवक्ता शीतेन्द्र कुमार मिश्रा); अधिवक्ता सत्येंद्र प्रताप सिंह (अधिवक्ता विशाल टंडन के निर्देश पर); वरिष्ठ अधिवक्ता उमेश वत्स (साथ में अधिवक्ता शीतेन्द्र कुमार मिश्रा व अधिवक्ता विक्रांत प्रताप सिंह); अधिवक्ता विजय कुमार शर्मा; वरिष्ठ अधिवक्ता वी.के. सिंह (साथ में अधिवक्ता त्रिलोकी नाथ); चयन बोर्ड की ओर से अधिवक्ता के. शाही (कुष्मोन्डेय शाही); और राज्य सरकार की ओर से मुख्य स्थायी अधिवक्ता / स्थायी अधिवक्ता।

रिकॉर्ड पर दर्ज अधिवक्ताओं की सूची:

  • याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता: सिद्धार्थ खरे (वरिष्ठ अधिवक्ता), ए.के.एस. परिहार, आलोक सिंह, अभिषेक मिश्रा, अचल सिंह, आदर्श सिंह, अदितेंद्र सिंह, अखिलेन्द्र सिंह, आलोक द्विवेदी, आनंद विक्रम सिंह, अनिरुद्ध सिंह, अंजनी कुमार, अनमोल रतन, अंशुल पाठक, अनुभव द्विवेदी, अनुराग परिहार, अनुराग शुक्ला, अरविंद कुमार वर्मा, अवधेश कुमार मालवीय, बच्चू लाल यादव, बजरंग बहादुर सिंह, भावेश प्रताप सिंह, भीम सिंह, बृजेश कुमार, बृजेश कुमार वर्मा, दिनेश कुमार पांडेय, गौरांग द्विवेदी, ग्रिजेश तिवारी, एच.के. अस्थाना, हिमांशी श्रीवास्तव, हिमांशु उपाध्याय, इंद्र राज सिंह, जय प्रकाश राव, जितेंद्र प्रताप सिंह, कैलाश पति सिंह यादव, कुंवर आदित्य प्रताप सिंह, कुंवर अखिलेन्द्र सिंह, मधुकर मौर्य, महेंद्र सिंह, महेश शर्मा, मनमोहन सिंह, मनोज कुमार द्विवेदी, मृत्युंजय मोहन सहाय, मुकेश कुमार, नंद लाल पांडेय, नरेंद्र सिंह, नेहा रॉय चौधरी, ओम प्रकाश पांडेय, पूजा कुसुम, प्रभाकर अवस्थी, प्रभात चंद्र शर्मा, प्रभात कुमार सिंह, प्रशांत शुक्ला, प्रवीण कुमार मिश्रा, पूर्णेंदु बाजपेयी, राघवेंद्र त्रिपाठी, राहुल जैन, राहुल मिश्रा, राहुल सिंह दहिया, राजेंद्र प्रसाद दुबे, राम कृष्ण यादव, राम प्रकाश उपाध्याय, राम सकल यादव, रमेश चंद्र द्विवेदी, रवि प्रताप सिंह, रोहित सिंह, एस.एम. मिश्रा, संदीप कुमार, संजय कुमार कुशवाहा, संजय कुमार सिंह, सतीश चंद्र दुबे, सत्य प्रकाश सिंह, सत्यम मिश्रा, सत्येंद्र चंद्र त्रिपाठी, सौरभ त्रिपाठी, शैलेश पांडेय, शशी कांत मिश्रा, शिल्पी सिंह, शिवेंदु ओझा, श्याम लाल, स्नेह पांडेय, सुनील कुमार श्रीवास्तव, सुयश पांडेय, विजय सिंह सेंगर, विनोद कुमार सिंह, योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव।
  • प्रतिवादियों के अधिवक्ता: मुख्य स्थायी अधिवक्ता (सीएससी), कृष्ण कुमार चंद, रमेश कुमार तिवारी, ए.के.एस. परिहार, अदिति पांडेय, आनंद कुमार श्रीवास्तव, अनिल कुमार यादव, अनुभव द्विवेदी, अनुराग कुमार, अरविंद प्रबोध दुबे, आशीष मल्होत्रा, बबीता उपाध्याय, बजरंग बहादुर सिंह, ब्रज भूषण सिंह चौहान, डी.के. ओझा, हरी कांत शुक्ला, हरिकेश, हरीश चंद्र यादव, हृदय नारायण पांडेय, ऋतुध्वज प्रताप साही, जगन्नाथ मौर्य, कृष्ण कुमार, कृष्ण कुमार चंद, कुष्मोन्डेय शाही, मनीष तिवारी, निखिल पांडेय, पी.के. उपाध्याय, प्रभाकर अवस्थी, प्रभात कुमार सिंह, प्रद्युम्न कुमार, आर.आर. पांडेय, राजेंद्र प्रसाद दुबे, राकेश कुमार पटेल, राकेश कुमार सिंह, रमेश कुमार तिवारी, रोहित उपाध्याय, समरथ सिंह, संजीव कुमार गौड़, संकल्प नारायण, संतोष कुमार यादव, सत्य प्रकाश सिंह, शरद चंद्र उपाध्याय, शीतेन्द्र कुमार मिश्रा, शिव सागर सिंह, शोभित चौहान (वरिष्ठ अधिवक्ता), त्रिलोकी नाथ, उमेश वत्स, वशिष्ठ तिवारी, विजय कुमार शर्मा, विभ्रांशु वैभव, विक्रांत प्रताप सिंह, विशाल टंडन।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: डॉ. संजय कुमार मिश्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 6 अन्य
वाद संख्या: रिट – ए संख्या 19537 / 2022 (संबद्ध मामलों के साथ)
पीठ: जस्टिस सिद्धार्थ नंदन
निर्णय की तिथि: 5 अक्टूबर, 2026

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