दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक हॉस्पिटैलिटी और हॉलिडे सर्विस देने वाली कंपनी को सेवा में कमी का दोषी मानते हुए एक उपभोक्ता को ₹1.75 लाख वापस करने और ₹1.5 लाख मुआवजा तथा मुकदमे के खर्च के रूप में देने का आदेश दिया है।
आयोग की अध्यक्ष संगीता ढींगरा सहगल और सदस्य बिमला कुमारी की पीठ ने पाया कि कंपनी ने भुगतान लेने के बावजूद उपभोक्ता को मेंबरशिप कार्ड जारी नहीं किया और योजना के तहत वादा किया गया मुफ्त प्लॉट भी नहीं दिया।
28 सितंबर के आदेश में आयोग ने कंपनी को ₹1.75 लाख की राशि वापस करने, मानसिक परेशानी के लिए ₹1 लाख और मुकदमे के खर्च के रूप में ₹50,000 देने का निर्देश दिया।
मेंबरशिप के तहत कई सुविधाओं का किया गया था वादा
शिकायतकर्ता के अनुसार, अप्रैल 2008 में वह नई दिल्ली के कनॉट प्लेस में कंपनी के बिजनेस प्रमोशन अधिकारियों से मिला था, जो एक हॉलिडे मेंबरशिप योजना का प्रचार कर रहे थे।
योजना में सदस्य, उसके जीवनसाथी और माता-पिता के लिए आजीवन मेंबरशिप तथा बच्चों के लिए 18 वर्ष की आयु तक सदस्यता का लाभ बताया गया था। इसके लिए ₹4,000 का वार्षिक शुल्क तय था और मेंबरशिप को आजीवन, ट्रांसफरेबल और वैश्विक बताया गया था।
इसके अलावा, महाराष्ट्र के कोलाड में बॉम्बे-गोवा हाईवे पर गोल्फ विलेज में 2,000 वर्ग फुट का प्लॉट, 30 वर्षों तक कंपनी की संपत्तियों में छुट्टियां बिताने की सुविधा, कुछ निर्धारित हॉलिडे पैकेज, आरसीआई से जुड़े क्लबों की पांच साल की मुफ्त सदस्यता और गोवा में कपल के लिए हॉलिडे के साथ एकतरफा हवाई टिकट जैसी सुविधाओं का भी वादा किया गया था।
शिकायतकर्ता ने ₹2 लाख की मेंबरशिप योजना ली और ₹25,000 की छूट के बाद ₹1.75 लाख का भुगतान किया। उसे एक मेंबरशिप नंबर भी दिया गया।
उसका कहना था कि कंपनी ने दो सप्ताह के भीतर मेंबरशिप कार्ड, ब्रोशर और अन्य जानकारी उपलब्ध कराने का भरोसा दिया था ताकि वह गर्मियों की छुट्टियों में सुविधाओं का लाभ उठा सके।
हालांकि, उसे मेंबरशिप कार्ड नहीं मिला। शिकायतकर्ता ने कहा कि इसके कारण परिवार के साथ बनाई गई उसकी छुट्टियों की पूरी योजना प्रभावित हुई। इसमें उसके विवाहित रिश्तेदार और उनके बच्चे भी शामिल थे।
उसने यह भी आरोप लगाया कि कंपनी के अधिकारियों से कई बार संपर्क करने और मांगे गए दस्तावेज देने के बावजूद उसे कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला, जिससे उसे और उसके पिता को मानसिक परेशानी हुई।
कंपनी ने शिकायतकर्ता के दावों का विरोध किया
कंपनी की ओर से पेश अधिवक्ता अंकुर सैनी ने दलील दी कि शिकायतकर्ता ने समझौते के तहत किसी हॉलिडे पैकेज के लिए न तो आवेदन किया और न ही कोई सेवा ली।
कंपनी ने ₹1.75 लाख के भुगतान पर भी सवाल उठाया और कहा कि शिकायतकर्ता ने इस भुगतान का पर्याप्त सबूत पेश नहीं किया।
कंपनी की ओर से यह भी कहा गया कि शिकायतकर्ता ने योजना की शर्तों को समझने के बाद अपनी इच्छा से मेंबरशिप ली थी और भुगतान की गई राशि वापस न होने वाली मेंबरशिप फीस थी।
मुफ्त प्लॉट के संबंध में कंपनी ने दावा किया कि उसका आवंटन कुछ शर्तों के अधीन था। इनमें रजिस्ट्रेशन और अन्य खर्चों के लिए ₹20,000 का भुगतान भी शामिल था, जिसे शिकायतकर्ता ने पूरा नहीं किया।
आयोग ने माना सेवा में कमी
आयोग ने कंपनी की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। उसने पाया कि कंपनी ने शिकायतकर्ता को मेंबरशिप कार्ड ही जारी नहीं किया, जबकि उसी के जरिए योजना की सुविधाओं और लाभों का इस्तेमाल किया जाना था।
आयोग ने ₹20,000 के भुगतान वाली दलील को भी टिकाऊ नहीं माना। आयोग के अनुसार, कंपनी पहले यह साबित नहीं कर सकी कि उसने योजना के तहत अपनी बुनियादी जिम्मेदारियां पूरी की थीं, जिनमें मेंबरशिप कार्ड जारी करना और मुफ्त प्लॉट का आवंटन करना शामिल था।
आयोग ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 का उद्देश्य ऐसे उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना है जिन्हें आकर्षक ऑफर देकर सेवा प्रदाता जोड़ते हैं, लेकिन बाद में वादा की गई सेवाएं उपलब्ध नहीं कराते।
आयोग ने कंपनी को सेवा में कमी का दोषी ठहराते हुए ₹1.75 लाख वापस करने, मानसिक परेशानी के लिए ₹1 लाख और मुकदमे के खर्च के रूप में ₹50,000 देने का आदेश दिया।

