10 साल की बच्ची से यौन उत्पीड़न मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा रद्द की, आरोपी को किया बरी

दिल्ली हाईकोर्ट ने 10 साल की मासूम बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक व्यक्ति को बरी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल ट्रायल कोर्ट में स्क्रीन पर आरोपी को देखकर पीड़िता का असहज या परेशान होना सजा का आधार नहीं बन सकता, खासकर तब जब मामले में आरोपी की संलिप्तता पर गंभीर संदेह हो।

जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस विकास महाजन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। हाईकोर्ट ने कहा कि जब रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्य और परिस्थितियां आरोपी की भूमिका पर वाजिब शक पैदा करती हैं, तो केवल पीड़िता की तात्कालिक प्रतिक्रिया के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने आरोपी की तुरंत रिहाई का आदेश दिया, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।

ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा

इससे पहले निचली अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376एबी, 341, 323 और पॉक्सो (POCSO) एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में उल्लेख किया था कि बच्ची ने घटना का पूरा विवरण दिया था और आरोपी की पहचान की थी। सुनवाई के दौरान जब पीड़िता को स्क्रीन पर आरोपी दिखाया गया, तो वह काफी असहज नजर आई थी।

राज्य सरकार के वकील ने हाईकोर्ट में इसी बिंदु को प्रमुखता से रखते हुए सजा को बरकरार रखने की मांग की। हालांकि, पीठ ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि स्क्रीन पर दिखी परेशानी अभियोजन पक्ष के मामले में मौजूद बुनियादी कमियों और विरोधाभासों को नजरअंदाज नहीं कर सकती।

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पहचान और गवाही में खामियां

हाईकोर्ट ने जांच प्रक्रिया और पीड़िता के बयानों में कई गंभीर खामियों को रेखांकित किया। अदालत ने पाया कि इस बात में कोई स्पष्टता नहीं थी कि घटना के दौरान पीड़िता आरोपी का चेहरा देख पाई थी या नहीं।

इसके अलावा, घटनास्थल पर रोशनी को लेकर दिए गए पीड़िता के संशोधित बयान और पुलिस के साइट प्लान के बीच तालमेल नहीं था। जिरह के दौरान पीड़िता ने यह भी स्वीकार किया कि जांच अधिकारी ने उससे एक कोरे कागज पर लिखवाया था।

पुलिस कस्टडी में कबूलनामे पर सवाल

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अदालत ने आरोपी को मामले में घसीटे जाने के तरीके पर भी गंभीर सवाल उठाए। घटना की शुरुआती एफआईआर या गवाहों के बयानों में आरोपी का कोई नाम नहीं था। उसका नाम केवल तब सामने आया जब उसी पुलिस स्टेशन की पुलिस ने उसे एक अन्य मामले में गिरफ्तार किया और दावा किया कि उसने हिरासत के दौरान इस अपराध को कबूल कर लिया है।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि घटनाक्रम का यह सिलसिला अभियोजन पक्ष के दावे को संदिग्ध बनाता है। पीठ ने आशंका जताई कि जन आक्रोश के दबाव में आकर पुलिस कस्टडी में मौजूद व्यक्ति को इस मामले में झूठा फंसाया गया हो सकता है।

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