वैधानिक व्याख्या के इस स्थापित सिद्धांत को दोहराते हुए कि जब तक कोई विपरीत मंशा स्पष्ट न हो, किसी कानून या आदेश को पिछली तारीख से लागू नहीं माना जा सकता, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्टडी लीव (अध्ययन अवकाश) की सीमा बढ़ाने वाला सरकारी आदेश पहले से स्वीकृत और उपयोग की जा चुकी छुट्टियों पर भूतलक्षी (रेट्रोस्पेक्टिव) रूप से लागू नहीं होगा। जस्टिस बिभू दत्त गुरु की एकल पीठ ने सेवारत सरकारी डॉक्टरों की ओर से दायर याचिकाओं के एक बैच को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने 24 महीने के स्टडी लीव को बढ़ाकर 36 महीने करने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने कहा कि स्पष्ट विधायी निर्देश के अभाव में कार्यपालिका द्वारा दी गई छूट केवल भविष्य के मामलों पर ही लागू होती है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता छत्तीसगढ़ सरकार के लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में डेंटल सर्जन के पद पर कार्यरत हैं। उच्च चिकित्सा शिक्षा (पोस्टग्रेजुएट) करने के लिए उन्होंने विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) और आवश्यक अनुमति प्राप्त की थी। इसके बाद, छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 2010 के नियम 44 के तहत उन्हें स्टडी लीव मंजूर की गई थी।
प्रमुख याचिका (डॉ. भूमिका देवांगन बनाम छत्तीसगढ़ राज्य) में, याचिकाकर्ता को 18 अगस्त 2023 के आदेश के तहत 2 दिसंबर 2022 से 1 दिसंबर 2024 तक यानी 24 महीने का स्टडी लीव दिया गया था। इसके बाद पाठ्यक्रम के तीसरे वर्ष के लिए उन्हें 2 दिसंबर 2024 से 1 दिसंबर 2025 तक 12 महीने का असाधारण अवकाश (एक्स्ट्रा-ऑर्डिनरी लीव) स्वीकृत किया गया। इस प्रकार, 24 महीने का मूल स्टडी लीव 3 मार्च 2025 से काफी पहले ही स्वीकृत और उपयोग किया जा चुका था।
3 मार्च 2025 को राज्य सरकार ने राज्यपाल के नाम से 2010 के नियमों के नियम 44 में शिथिलता देते हुए एक आदेश जारी किया। इसके तहत सेवारत डॉक्टरों के लिए स्टडी लीव की अधिकतम सीमा 24 महीने से बढ़ाकर 36 महीने कर दी गई। इस छूट के साथ 5 वर्ष की अनिवार्य सेवा का बॉन्ड और सेवा बीच में छोड़ने पर 8 प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्याज के साथ पूरी राशि की वसूली जैसी कड़ी शर्तें रखी गईं। बाद में, 6 अप्रैल 2026 के एक प्रशासनिक पत्र के जरिए विभाग ने स्पष्ट किया कि 3 मार्च 2025 के आदेश का लाभ केवल उन डॉक्टरों को मिलेगा, जो उस तारीख के बाद विधिवत अनुमति या एनओसी लेकर उच्च शिक्षा के लिए जाएंगे।
राज्य सरकार द्वारा अपने 12 महीने के असाधारण अवकाश को स्टडी लीव में बदलने से इनकार किए जाने के बाद डॉक्टरों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और 24 महीने के स्थान पर 36 महीने का स्टडी लीव मंजूर करने के निर्देश देने की मांग की।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस.सी. वर्मा (अधिवक्ता सजल कुमार गुप्ता के साथ) ने तर्क दिया कि 3 मार्च 2025 का आदेश वित्त विभाग की सहमति से जारी एक कल्याणकारी आदेश है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने उचित अनुमति और विभागीय स्वीकृति के साथ ही अपनी पढ़ाई की है, इसलिए केवल इस आधार पर उन्हें लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता कि उनकी छुट्टी की मूल मंजूरी 3 मार्च 2025 से पहले की थी।
याचिकाकर्ताओं ने 6 अप्रैल 2026 के विभागीय पत्र को भी चुनौती दी और कहा कि राज्यपाल के नाम से जारी मूल आदेश के लाभ को किसी प्रशासनिक निर्देश द्वारा सीमित नहीं किया जा सकता। अपने तर्क के समर्थन में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पी.डी. अग्रवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1987) के फैसले का हवाला दिया। साथ ही, संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए डॉ. मीनाक्षी सूद के मामले का उदाहरण दिया, जिसमें 13 जून 2025 के आदेश से दो वर्ष के स्टडी लीव और एक वर्ष के असाधारण अवकाश को संशोधित कर पूरे तीन वर्ष का स्टडी लीव कर दिया गया था।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता वाई.एस. ठाकुर (पैनल वकील अपूर्वा निगम के साथ) ने याचिकाओं का विरोध किया। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने तत्कालीन नियमों के तहत अपने 24 महीने के स्टडी लीव का उपयोग पहले ही कर लिया था। 3 मार्च 2025 का आदेश बाद में दी गई एक छूट है, जिसका अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि वह पहले से समाप्त हो चुके मामलों को दोबारा खोल दे।
डॉ. मीनाक्षी सूद के मामले पर राज्य ने स्पष्ट किया कि वित्त विभाग ने 13 फरवरी 2026 को उस संशोधन पर असहमति जताई थी, जिसके बाद 13 जून 2025 के उस आदेश को 31 जुलाई 2026 को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया गया था। इसलिए, एक रद्द हो चुके आदेश के आधार पर समानता का दावा नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
मामले के घटनाक्रम की जांच करते हुए जस्टिस बिभू दत्त गुरु ने माना कि याचिकाकर्ताओं को 24 महीने का स्टडी लीव उस समय लागू व्यवस्था के तहत मिला था और वे उसका उपयोग कर चुके थे। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल अधिकतम सीमा को बढ़ा देने से किसी को पिछली तारीख से उसका लाभ पाने का स्वत: कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता।
वैधानिक व्याख्या के सिद्धांतों पर जोर देते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट एक्साइज कमिश्नर, कोट्टायम बनाम एस्थप्पन चेरियन (2021) फैसले का हवाला दिया, जिसमें सीआईटी बनाम वाटिका टाउनशिप (पी) लिमिटेड के संविधान पीठ के निर्णय को उद्धृत किया गया था:
“कानून की व्याख्या से जुड़े विभिन्न नियमों में से एक स्थापित नियम यह है कि जब तक कोई विपरीत मंशा प्रकट न हो, तब तक किसी कानून को पिछली तारीख से प्रभावी नहीं माना जाता। इस नियम के पीछे विचार यह है कि वर्तमान कानून को वर्तमान गतिविधियों को नियंत्रित करना चाहिए। आज बना कानून अतीत की घटनाओं पर लागू नहीं हो सकता। यदि हम आज कुछ करते हैं, तो हम उसे आज के और लागू कानून को ध्यान में रखकर करते हैं, न कि कल होने वाले उसके पिछले समायोजन को देखकर। कानून की प्रकृति में हमारा विश्वास इस आधार पर टिका है कि प्रत्येक मनुष्य मौजूदा कानून पर भरोसा करके अपने मामलों को व्यवस्थित करने का हकदार है और उसे यह नहीं लगना चाहिए कि उसकी योजनाएं बाद में पिछली तारीख से उलट दी गई हैं। कानून के इस सिद्धांत को ‘लेक्स प्रोस्पिसिट नॉन रेस्पिसिट’ कहा जाता है, यानी कानून आगे देखता है, पीछे नहीं।”
हाईकोर्ट ने अधीनस्थ प्राधिकारियों की विधायी सीमाओं पर सीआईटी बनाम एम.सी. पोन्नूसे फैसले का भी उल्लेख किया:
“अदालतें अधिकारों को प्रभावित करने वाले नए कानूनों को तब तक पिछली तारीख से लागू नहीं मानेंगी, जब तक कि स्पष्ट शब्दों या अनिवार्य निहितार्थ से यह न दिखे कि विधायिका की ऐसी मंशा थी। संसद अपनी विधायी शक्ति को स्वीकृत सीमाओं के भीतर प्रत्यायोजित कर सकती है। जहां कोई नियम या विनियमन किसी ऐसे व्यक्ति या प्राधिकारी द्वारा बनाया जाता है जिसे विधायिका द्वारा ऐसी शक्तियां सौंपी गई हैं, वहां इसे पिछली तारीख से लागू करना संभव हो भी सकता है और नहीं भी। यह वैधानिक प्रावधान में प्रयुक्त भाषा पर निर्भर करेगा, जो स्पष्ट शब्दों में या अनिवार्य रूप से संबंधित प्राधिकारी को पिछली तारीख से प्रभावी नियम बनाने का अधिकार दे सकती है। लेकिन जहां ऐसी कोई भाषा नहीं मिलती है, वहां अदालतों ने माना है कि अधीनस्थ विधायी शक्तियों का प्रयोग करने वाले व्यक्ति या प्राधिकारी ऐसा कोई नियम, विनियम या उप-नियम नहीं बना सकते जो पिछली तारीख से लागू हो सके।”
हाईकोर्ट ने कहा कि 3 मार्च 2025 के आदेश में ऐसा कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है कि इसे पिछली तारीख से लागू किया जाए। पी.डी. अग्रवाल के फैसले पर कोर्ट ने कहा कि 6 अप्रैल 2026 का पत्र मूल आदेश में कोई बदलाव नहीं करता, बल्कि केवल उसके लागू होने के दायरे को स्पष्ट करता है।
डॉ. सूद के मामले में समानता की मांग को खारिज करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“किसी ऐसे आदेश के तहत दिया गया लाभ जो अब समाप्त हो चुका है, केवल समानता के आधार पर दूसरों को देने का निर्देश नहीं दिया जा सकता, जब तक कि वह अंतर्निहित अधिकार मूल वैधानिक प्रावधान या 03.03.2025 के आदेश से ही प्राप्त न होता हो।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष दिया कि जिन अभ्यर्थियों ने नीति जारी होने से पहले ही अपनी स्वीकृत छुट्टी पूरी कर ली थी, वे इस छूट का दावा नहीं कर सकते:
“03.03.2025 का सरकारी आदेश उन अभ्यर्थियों के लिए एक परवर्ती छूट के रूप में कार्य करता है जिन्होंने 03.03.2025 को या उसके बाद अध्ययन अवकाश के लिए आवेदन किया था। यह आदेश याचिकाकर्ताओं जैसे उन सभी अभ्यर्थियों के लिए नहीं था जिन्होंने उक्त आदेश पारित होने से काफी पहले ही अध्ययन अवकाश का लाभ उठा लिया था। इसे याचिकाकर्ताओं द्वारा इसके जारी होने से पहले स्वीकृत और उपभोग किए गए अध्ययन अवकाश की अवधि को पिछली तारीख से बढ़ाने के लिए लागू नहीं किया जा सकता है।”
हाईकोर्ट ने माना कि सरकार की कार्रवाई में कोई मनमानापन या भेदभाव नहीं है और सभी रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: डॉ. भूमिका देवांगन बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपीएस संख्या 5391/2026
पीठ: जस्टिस बिभू दत्त गुरु
निर्णय की तिथि: 1 अक्टूबर 2026

