अदालत की सुनवाई रिकॉर्ड कर शेयर करने का मामला: तेलंगाना हाईकोर्ट ने महिला के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने से किया इनकार

तेलंगाना हाईकोर्ट ने अपने पति से जुड़े मुकदमे की अदालती कार्यवाही को कथित तौर पर अवैध रूप से रिकॉर्ड करने और उसे सोशल मीडिया पर साझा करने के मामले में एक महिला को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने महिला के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने की याचिका का निपटारा करते हुए स्पष्ट किया कि उसके दावों की सच्चाई पुलिस जांच के जरिए ही सामने आ सकती है।

जस्टिस जे श्रीनिवास राव ने 14 अगस्त को दिए अपने आदेश में याचिका का निपटारा किया। महिला पर सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम, 2000 और कॉपीराइट अधिनियम, 1957 की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज है।

जांच के बाद ही तय होंगे तथ्य

यह मामला 13 नवंबर 2025 को हुई एक सुनवाई से जुड़ा है। महिला के अलग रह रहे पति को यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम से जुड़े एक मामले में जमानत मिली थी, जिसे महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। आरोप है कि सुनवाई के दौरान लाइव स्ट्रीम वीडियो को रिकॉर्ड किया गया और फिर व्हाट्सएप के जरिए दूसरों को भेजा गया।

महिला ने अपनी याचिका में कहा कि वह सुनवाई के दौरान अदालत में खुद मौजूद थी और उसने कोई वीडियो डाउनलोड या शेयर नहीं किया। हालांकि, हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि ये विवादित तथ्य हैं जिन पर अदालत इस चरण में फैसला नहीं दे सकती और जारी पुलिस जांच के दौरान ही इनका परीक्षण किया जाना चाहिए।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट अमेरिकी लड़के के बचाव में आया, दूर के भारतीय चचेरे भाई को लीवर दान करने की अनुमति दी

लाइव-स्ट्रीमिंग नियमों और गिरफ्तारी प्रक्रिया पर दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील वी रघुनाथ ने दलील दी कि उनकी मुवक्किल को झूठा फंसाया गया है। उन्होंने तेलंगाना हाईकोर्ट के लाइव-स्ट्रीमिंग नियमों के नियम 5 का हवाला देते हुए कहा कि पोक्सो कानून के तहत आने वाले मामलों की लाइव स्ट्रीमिंग प्रतिबंधित है।

बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि कथित अपराधों में सात साल से कम की सजा का प्रावधान है। इसके बावजूद जांच अधिकारी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 35(3) और अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया।

हाईकोर्ट ने दिए कानूनी प्रक्रियाओं के पालन के निर्देश

READ ALSO  न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए 3 वर्ष की वकालत अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट 

पति के वकील और अपर लोक अभियोजक जितेंदर राव वीरमल्ला ने याचिका का विरोध किया। अभियोजन पक्ष ने कहा कि चूंकि अपराधों में सजा सात साल से कम है, इसलिए अर्नेश कुमार फैसले में तय की गई गिरफ्तारी की प्रक्रिया लागू होती है।

मामले का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी को निर्देश दिया कि वे गिरफ्तारी और जांच के संबंध में वैधानिक नियमों तथा सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन करें। इसके साथ ही अदालत ने महिला को पुलिस जांच में पूरा सहयोग करने को कहा और स्पष्ट किया कि जांच अधिकारी से औपचारिक नोटिस मिलने के बाद वह कानून के तहत उपलब्ध सभी कानूनी बचाव के अधिकार का इस्तेमाल कर सकती है।

READ ALSO  अगर संवैधानिक पदाधिकारी दायित्व नहीं निभाते तो क्या अदालतें बेबस रहेंगी? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles