आरोपी के खिलाफ विशिष्ट आरोप न होने पर सिर्फ विस्तृत चार्जशीट के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को उचित नहीं ठहराया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक केंद्र सरकार के कर्मचारी के खिलाफ जारी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि चार्जशीट में किसी आरोपी के खिलाफ कोई विशिष्ट आरोप नहीं लगाया गया है, तो केवल उसके भारी-भरकम या विस्तृत होने के आधार पर आपराधिक मामला चलाने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें कर्मचारी की याचिका को यह कहते हुए निपटा दिया गया था कि वह निचली अदालत में राहत की मांग करे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह आपराधिक मामला एक महिला वकील (द्वितीय प्रतिवादी) द्वारा अपने ही मुवक्किल (तृतीय प्रतिवादी) के खिलाफ दर्ज कराई गई शिकायत से शुरू हुआ था। वकील का आरोप था कि उनके मुवक्किल ने 10,00,000 रुपये की कानूनी फीस का भुगतान नहीं किया। दर्ज कराई गई प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) के अनुसार, अपीलकर्ता—जो कि एक केंद्र सरकार का कर्मचारी है—ने अपने दोस्त (मुवक्किल) की मदद करने के उद्देश्य से महिला वकील को फोन किया और फीस की मांग वापस न लेने पर धमकी दी।

इसके अतिरिक्त, शिकायतकर्ता वकील ने यह भी आरोप लगाया कि 29 अप्रैल 2023 को रात लगभग 8:30 बजे उनके मुवक्किल ने अपने एक सहयोगी के साथ मिलकर उनके दफ्तर में तोड़फोड़ की, उनके साथ मारपीट की और नकद राशि तथा मोबाइल फोन छीन लिए। इस शिकायत पर हावड़ा पुलिस स्टेशन में 4 मई 2023 को भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 506 (आपराधिक धमकी) और 509 (महिला की लज्जा का अनादर करने के इरादे से शब्द या कार्य) के साथ धारा 34 के तहत प्राथमिकी संख्या 78/2023 दर्ज की गई।

जांच के पश्चात पुलिस ने 31 अक्टूबर 2023 को चार्जशीट संख्या 191/2023 दाखिल की। अपीलकर्ता ने एफआईआर और चार्जशीट को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि चूंकि चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, इसलिए उसे संबंधित विचारण अदालत (ट्रायल कोर्ट) के समक्ष अपनी बात रखनी चाहिए। इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री एस. बी. उपाध्याय ने अदालत में तर्क दिया कि एफआईआर और चार्जशीट के अवलोकन से अपीलकर्ता के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का कर्मचारी होने के बावजूद अपीलकर्ता को इस विवाद में अनावश्यक रूप से घसीटा गया है।

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दूसरी ओर, शिकायतकर्ता महिला वकील स्वयं अदालत के समक्ष उपस्थित हुईं और कार्यवाही को बंद कमरे (इन-कैमरा) में चलाने का अनुरोध किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। अपनी मौखिक दलीलों के दौरान उन्होंने अपने पेशे में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों का उल्लेख किया और अपीलकर्ता की पत्नी पर भी आरोप लगाए, जो कलकत्ता में प्रैक्टिसिंग वकील हैं। हालांकि, पीठ ने पाया कि उन्होंने अपनी बहस के दौरान खुद अपीलकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर कोई बात नहीं की।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

अभिलेखों का परीक्षण करने के पश्चात सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यद्यपि 29 अप्रैल 2023 को गंभीर घटनाएं घटने का दावा किया गया था, लेकिन शिकायतकर्ता के स्वयं एक प्रैक्टिसिंग वकील होने के बावजूद 4 मई 2023 को ही एफआईआर दर्ज कराई गई।

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चार्जशीट की समीक्षा करते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि पुलिस जांच मुख्य रूप से मुवक्किल (तीसरे प्रतिवादी) के इर्द-गिर्द केंद्रित थी। अदालत ने पाया कि प्रस्तुत की गई चार्जशीट “विस्तृत है, लेकिन इसमें अपीलकर्ता के खिलाफ कोई विशिष्ट आरोप नहीं लगाया गया है।”

पीठ ने इस बात को रेखांकित किया कि मुवक्किल के खिलाफ कई अपराध सिद्ध पाए जाने के बाद, “अचानक यह कह दिया गया कि प्रथम दृष्टया धारा 506 और 509 के साथ धारा 34 आईपीसी के तहत आरोप अन्य दो आरोपियों, यानी अपीलकर्ता और तीसरे प्रतिवादी के वृद्ध पिता, के खिलाफ अच्छी तरह से स्थापित होता है।”

एफआईआर और चार्जशीट की सूक्ष्म जांच के बाद पीठ ने निर्णय दिया: “प्राथमिकी और चार्जशीट का अवलोकन करने के बाद, हमारी यह राय है कि अपीलकर्ता के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने की अनुमति देने का बिल्कुल भी कोई औचित्य नहीं है।”

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका पर अनुमति प्रदान करते हुए अपील को स्वीकार कर लिया। शीर्ष अदालत ने आदेश दिया कि हावड़ा पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर संख्या 78/2023 और इसके परिणामस्वरूप दाखिल चार्जशीट संख्या 191/2023 को अपीलकर्ता के संबंध में रद्द और समाप्त किया जाता है। पीठ ने निर्देश दिया कि इस चार्जशीट के आधार पर अपीलकर्ता के खिलाफ कोई भी आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रखी जाएगी।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: कनाद साहा बनाम पश्चिम बंगाल राज्य व अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 3892/2026
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 17 अगस्त 2026

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