2017 बदायूं दोहरा हत्याकांड: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चार आरोपियों की फांसी की सजा रद्द की, तत्काल रिहा करने का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बदायूं के चर्चित 2017 दोहरे हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा चार अभियुक्तों को दी गई फांसी की सजा को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने 8 सितंबर को पारित अपने आदेश में विजय पाल, रामवीर, किशन लाल और उनकी पत्नी जलधारा की आपराधिक अपीलों को स्वीकार कर लिया। यह फैसला सोमवार को सार्वजनिक किया गया। पीठ ने निचली अदालत द्वारा पुष्टि के लिए भेजे गए मृत्युदंड संदर्भ (डेथ रेफरेंस) को खारिज करते हुए निर्देश दिया कि यदि ये चारों किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।

पीठ ने अपने निर्णय में टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य केवल संदेह पैदा करते हैं, लेकिन कानूनी रूप से महज संदेह कभी भी ठोस सबूत का स्थान नहीं ले सकता।

जांच में गंभीर खामियां और गवाहों के बयानों पर संशय

ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने जांच प्रक्रिया और गवाहों की गवाही में कई बुनियादी कमियां पाईं। खंडपीठ ने पाया कि मामले में पेश किए गए कथित चश्मदीदों के बयान संदेहास्पद हैं। इसके अलावा, जांच अधिकारी अदालत को यह बताने में विफल रहे कि घटनास्थल के ठीक पड़ोस में रहने वाले लोगों से पूछताछ क्यों नहीं की गई। साथ ही, जब्ती के गवाहों (सीजर विटनेस) का भी मुकदमे के दौरान अदालत में परीक्षण नहीं कराया गया।

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हाईकोर्ट ने वारदात में इस्तेमाल कथित हथियार को लेकर सामने आए विरोधाभासों को भी चिन्हित किया। फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट में बरामद वस्तुओं पर इंसानी खून की मौजूदगी तो पाई गई, लेकिन तकनीशियन रक्त समूह (ब्लड ग्रुप) निर्धारित करने में असमर्थ रहे, जिसके चलते यह भौतिक साक्ष्य भी अनिर्णायक साबित हुआ।

निचली अदालत का फैसला निरस्त

हाईकोर्ट के इस फैसले ने बदायूं की निचली अदालत द्वारा सितंबर 2022 में सुनाए गए फैसले को पूरी तरह पलट दिया है। बदायूं की अदालत ने 17 सितंबर 2022 को विजय पाल, रामवीर, किशन लाल और जलधारा को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या) और 34 (समान मंशा) के तहत दोषी ठहराया था।

इसके पांच दिन बाद, 22 सितंबर 2022 को ट्रायल कोर्ट ने चारों अभियुक्तों को फांसी की सजा सुनाई थी और प्रत्येक पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। इसके बाद नियम के अनुसार सजा की पुष्टि के लिए मामला हाईकोर्ट भेजा गया था।

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घटना की पृष्ठभूमि और अभियोजन के आरोप

यह मामला 14 मई 2017 का है, जब बदायूं में गोविंद और आशा की गंभीर चोटों के चलते मौत हो गई थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार गोविंद के शरीर पर 6 और आशा के शरीर पर 3 गंभीर चोटें पाई गई थीं। डॉक्टरों ने दोनों की मौत का कारण अत्यधिक रक्तस्राव और सदमा (शॉक और हेमरेज) बताया था।

घटना के बाद गोविंद के पिता पप्पू की शिकायत पर वजीरगंज थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। पुलिस ने मामले को आईपीसी की धारा 147 (बलवा), 148 (घातक हथियारों से लैस होकर बलवा) और 302 (हत्या) के तहत दर्ज किया था।

मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि गोविंद और किशन लाल की बेटी आशा के बीच प्रेम संबंध थे, जिससे आशा के परिजन नाराज थे। अभियोजन का आरोप था कि किशन के रिश्तेदार विजय पाल ने शादी की बात करने के बहाने गोविंद को अपने घर बुलाया, जहां धारदार हथियार से उसकी हत्या कर दी गई। बीच-बचाव करने पहुंची आशा की भी आरोपियों ने हत्या कर दी थी।

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