गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस संजीव जे. ठाकर ने पति को अपनी पत्नी को ‘तलाक’ देने के लिए उकसाने के आरोपी रिश्तेदारों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 482 के तहत अग्रिम जमानत दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आवेदकों पर मुख्य आरोप केवल पति का समर्थन करने और उसे उकसाने तक सीमित है, तथा यह कथित अपराध आजीवन कारावास या मृत्युदंड के दायरे में नहीं आता। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने कुछ शर्तों के पालन के अधीन आवेदकों को गिरफ्तारी पूर्व सुरक्षा प्रदान की।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बनासकांठा जिले के पालनपुर तालुका पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर (सी.आर. संख्या 11195035260824/2026) से जुड़ा है। यह शिकायत भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 85, 351(2) और 54 के साथ-साथ मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम की धारा 4 के तहत दर्ज की गई थी। इस आपराधिक मामले में अपनी गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए ससुराल पक्ष के पांच रिश्तेदारों ने अग्रिम जमानत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
पक्षकारों की दलीलें
आवेदकों की ओर से पेश विद्वान अधिवक्ता रियाह ज़ेड. सिंधी ने दलील दी कि आरोपों की प्रकृति ऐसी नहीं है जिसके लिए इस स्तर पर हिरासत में लेकर पूछताछ (कस्टोडियल इंटेरोगेशन) की आवश्यकता हो। उन्होंने अदालत को आश्वस्त किया कि आवेदक न्याय प्रक्रिया से नहीं भागेंगे और जांच व मुकदमे के दौरान पूरी तरह उपलब्ध रहेंगे। इसके अलावा, आवेदक अग्रिम जमानत देते समय अदालत द्वारा लगाई जाने वाली सभी शर्तों का पालन करने के लिए तैयार हैं।
दूसरी तरफ, राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त लोक अभियोजक ध्वनि आर. त्रिपाठी ने अग्रिम जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अपराध की गंभीरता और स्वरूप का हवाला देते हुए अदालत से इस आवेदन को खारिज करने का आग्रह किया।
अदालत का विश्लेषण और सुप्रीम कोर्ट के नजीर
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अग्रिम जमानत का विवेकाधिकार न्यायिक रूप से, सावधानीपूर्वक और सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित बुनियादी सिद्धांतों के पूर्ण अनुपालन में लागू किया जाना चाहिए। अदालत ने दोहराया कि जमानत पर विचार करते समय आरोपों की प्रकृति व गंभीरता, आवेदक का आपराधिक इतिहास, न्याय से भागने की आशंका, और क्या आरोप केवल अपमानित या प्रताड़ित करने के इरादे से लगाए गए हैं—जैसे कारकों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
मामले के गुण-दोषों और साक्ष्यों का विस्तृत विश्लेषण किए बिना, अदालत ने प्रथम दृष्टया राहत देने के पक्ष में महत्वपूर्ण पहलुओं को रेखांकित करते हुए कहा:
- “वर्तमान मामले के तथ्यों को देखते हुए, आवेदकों के खिलाफ एकमात्र आरोप आरोपी नंबर 1, जो कि पति है, का समर्थन करने का है;”
- “वर्तमान आवेदकों पर मुख्य रूप से आरोपी नंबर 1 (पति) को शिकायतकर्ता को ‘तलाक’ देने के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया है;”
- “कथित अपराध आजीवन कारावास या मृत्युदंड से दंडनीय नहीं हैं;”
- “आवेदकों का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है;”
- “आवेदकों की विद्वान अधिवक्ता ने यह आश्वासन दिया है कि आवेदक न्याय से नहीं भागेंगे और जांच के साथ-साथ मुकदमे के दौरान भी उपलब्ध रहेंगे।”
अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों पर भरोसा जताया। अदालत ने सिद्धराम सतलिंगप्पा म्हेत्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य (2011) मामले का संदर्भ दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा श्री गुरुबख्श सिंह सिब्बिया एवं अन्य (1980) में तय सिद्धांतों को दोहराया गया था। इसके साथ ही अदालत ने सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) (2020) के फैसले का भी उल्लेख किया।
हाईकोर्ट का निर्णय और जमानत की शर्तें
हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत अर्जी को मंजूर करते हुए निर्देश दिया कि गिरफ्तारी या पेशी की स्थिति में आवेदकों को 10,000 रुपये के व्यक्तिगत मुचलके और इतनी ही राशि की एक जमानत राशि प्रस्तुत करने पर रिहा किया जाए।
अदालत ने अग्रिम जमानत के साथ निम्नलिखित शर्तें निर्धारित की हैं:
- आवेदक जांच में पूरा सहयोग करेंगे और पूछताछ के लिए बुलाए जाने पर उपस्थित रहेंगे;
- वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी गवाह को डराने, धमकाने या कोई प्रलोभन देने का प्रयास नहीं करेंगे;
- पुलिस जांच में कोई बाधा उत्पन्न नहीं करेंगे और न ही सबूतों के साथ कोई छेड़छाड़ करेंगे;
- सभी आवेदक 28 सितंबर 2026 को सुबह 11:00 बजे से दोपहर 2:00 बजे के बीच पालनपुर तालुका पुलिस स्टेशन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे;
- मुचलका भरते समय जांच अधिकारी और संबंधित अदालत को अपना आवासीय पता देंगे तथा मामले के अंतिम निपटारे तक बिना अदालत की अनुमति के अपना निवास स्थान नहीं बदलेंगे;
- यदि उनके पास पासपोर्ट है, तो वे उसे एक सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में जमा करेंगे और अदालत की अनुमति के बिना देश छोड़कर नहीं जाएंगे।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आवेदक किसी भी शर्त का उल्लंघन करते हैं, फरार होते हैं या गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं, तो पुलिस या जांच एजेंसी बीएनएसएस की धारा 483(2) के तहत गिरफ्तारी और जमानत रद्द करने के लिए ट्रायल कोर्ट का रुख करने को स्वतंत्र है। अदालत ने अंत में जोड़ा कि इन प्रथम दृष्टया टिप्पणियों का मुकदमे के अंतिम फैसले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और न ही यह आदेश पुलिस के जांच अधिकारों को सीमित करता है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: रहीमाबेन अब्दुलकरीम मानसिया एवं अन्य बनाम गुजरात राज्य
वाद संख्या: आर/क्रिमिनल मिसलेनियस एप्लीकेशन (अग्रिम जमानत के लिए) संख्या 21522/2026
पीठ: जस्टिस संजीव जे. ठाकर
निर्णय की तिथि: 21/09/2026

