सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि ई-नीलामी नोटिस में स्पष्ट शर्त मौजूद है, तो निर्धारित समय सीमा के भीतर शेष बिक्री राशि का भुगतान न करने पर सफल बोलीदाता की बयाना राशि (ईएमडी) और अन्य जमा राशियों की ज़ब्ती एक स्वतः और अनिवार्य परिणाम है। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह निर्णय दिया कि इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (लिक्विडेशन प्रोसेस) रेगुलेशंस, 2016 के शेड्यूल I में ज़ब्ती का स्पष्ट प्रावधान न होना नीलामी नोटिस की बाध्यकारी शर्तों को अप्रभावी नहीं करता। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) के आदेश को बरकरार रखते हुए डिफ़ॉल्ट करने वाले नीलामी खरीदार की अपील खारिज कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
कॉरपोरेट देनदार (कॉरपोरेट डेटर) के खिलाफ एक ऑपरेशनल क्रेडिटर द्वारा इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 (आईबीसी) की धारा 9 के तहत नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) का रुख करने के बाद कॉरपोरेट इन्सॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस शुरू हुआ था। पहले एक अंतरिम रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (आईआरपी) और बाद में विक्रम बजाज को रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (आरपी) नियुक्त किया गया। विस्तारित अवधि के भीतर कोई रेजोल्यूशन प्लान न मिलने पर एनसीएलटी ने परिसमापन (लिक्विडेशन) का आदेश दिया, जिसे बाद में निलंबित निदेशक की चुनौती पर एनसीएलएटी ने भी बरकरार रखा।
लिक्विडेशन प्रक्रिया के तहत 25 अक्टूबर 2021 को विभिन्न संपत्तियों के लिए ई-नीलामी का नोटिस जारी किया गया। इसमें लॉट नंबर 5 के रूप में चिह्नित संपत्ति (गांव नांगल खुर्द, तहसील सोनीपत, हरियाणा में स्थित 68 कनाल 17 मरला भूमि) की रिजर्व प्राइस 25.56 करोड़ रुपये तय की गई थी। नीलामी नोटिस में एक विशेष नोट के जरिए यह जानकारी दी गई थी कि 6 मरला भूमि के सेल डीड को लेकर एक सिविल मुकदमा लंबित है और लिक्विडेटर इसके कब्जे के लिए अर्जी दायर कर रहे हैं। यह बिक्री “जैसा है जहां है” (एज इज़ व्हेयर इज़) के आधार पर आयोजित की गई थी।
अपीलकर्ता मैसर्स एएसजे फिनसॉल्यूशन्स प्रा. लि. ने 15 नवंबर 2021 को रिजर्व प्राइस पर सफल बोली लगाई। कुल 25,56,00,000 रुपये की बोली के एवज में अपीलकर्ता ने बिना किसी आपत्ति के कुल राशि का 25% (6,39,00,000 रुपये) जमा किया, जिसमें 2.55 करोड़ रुपये ईएमडी (रिजर्व प्राइस का 10%) और 3.84 करोड़ रुपये शेष बिक्री प्रतिफल के रूप में शामिल थे।
नीलामी की शर्तों के अनुसार, शेष राशि का भुगतान 30 दिनों के भीतर (14 दिसंबर 2021 तक) या 12% वार्षिक ब्याज के साथ 90 दिनों के भीतर (14 फरवरी 2022 तक) किया जाना था। 15 दिसंबर 2021 को अपीलकर्ता ने आरपी को ईमेल भेजकर 90 दिनों के भीतर ब्याज सहित शेष 19.17 करोड़ रुपये का भुगतान करने की इच्छा जताई। हालांकि, अपीलकर्ता ने राशि जमा नहीं की। इसके बजाय, मैसर्स अग्रवाल ट्रेडिंग कंपनी द्वारा पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और एनसीएलटी के समक्ष दायर याचिकाओं का हवाला देते हुए अपीलकर्ता ने 11 फरवरी 2022 को एनसीएलटी में कंपनी आवेदन संख्या 85/2022 दायर कर पूर्व स्वामित्व दस्तावेजों (टाइटल डीड्स) की मांग की।
एनसीएलटी ने 31 मार्च 2023 को इस आवेदन को खारिज कर दिया और एनसीएलएटी ने 21 अप्रैल 2023 को अपील खारिज करते हुए माना कि अपीलकर्ता ने जानबूझकर चूक (विल्फुल डिफ़ॉल्ट) की है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी अपीलकर्ता की रिट याचिका खारिज कर दी, लेकिन कानून के अनुसार उपलब्ध उपाय अपनाने की छूट दी। इस बीच, संपत्ति की दोबारा नीलामी की गई, जिसमें वह 31.10 करोड़ रुपये में बिकी—जो अपीलकर्ता की बोली से 5.54 करोड़ रुपये अधिक थी।
हाईकोर्ट से मिली छूट के आधार पर अपीलकर्ता ने एनसीएलटी में दूसरी बार कार्यवाही शुरू की और ईएमडी ज़ब्ती को रद्द कर राशि वापस दिलाने की मांग की। एनसीएलटी ने “ट्रिपल टेस्ट” लागू करते हुए अपीलकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन एनसीएलएटी ने अपील पर इसे पलट दिया। इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने तर्क दिया कि लिक्विडेशन प्रोसेस रेगुलेशंस, 2016 के शेड्यूल I में ईएमडी की ज़ब्ती का कोई प्रावधान नहीं है और यह अनुमानित मूल्य के अधिकतम 10% तक ही ईएमडी मांगने की अनुमति देता है। उन्होंने ऑथराइज्ड ऑफिसर, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया बनाम षण्मुगवेलु (2024) 6 एससीसी 641 का हवाला देते हुए कहा कि सरफेसी (SARFAESI) कानून की तरह लिक्विडेशन नियमों में ज़ब्ती का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि एनसीएलटी ने सही रूप से “ट्रिपल टेस्ट” को अपीलकर्ता के अनुकूल पाया था, अन्य बोलीदाताओं को समय विस्तार दिया गया था और किसी भी स्थिति में ज़ब्ती रिजर्व प्राइस के 10% से अधिक नहीं हो सकती।
प्रतिवादी लिक्विडेटर/आरपी की ओर से पेश वकील अभिषेक आनंद ने दलील दी कि अपीलकर्ता ने लंबित मुकदमे की पूरी जानकारी होने के बावजूद खुली आंखों से बोली लगाई थी। उन्होंने रेखांकित किया कि ई-नीलामी नोटिस में डिफ़ॉल्ट की स्थिति में ईएमडी और जमा की गई सभी राशियों को जब्त करने की स्पष्ट एवं बाध्यकारी शर्त मौजूद थी। प्रतिवादी ने वेस्टकोस्ट इंफ्राप्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम राम चंद्र डल्लाराम चौधरी और पोटेंस ट्रांसमिशन एंड पावर प्रा. लि. बनाम एपेक्स बिल्डसिस लि. (इन लिक्विडेशन) (जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने क्रमशः सिविल अपील संख्या 4087/2023 और सिविल अपील संख्या 4116/2022 में बरकरार रखा था) का हवाला देते हुए कहा कि नीलामी नोटिस में ज़ब्ती की शर्तों को न्यायिक रूप से सही ठहराया जा चुका है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
नियामक ढांचे और नीलामी की शर्तों का परीक्षण करते हुए पीठ ने माना कि यद्यपि लिक्विडेशन प्रोसेस रेगुलेशंस के शेड्यूल I में ज़ब्ती का स्पष्ट प्रावधान नहीं है और ईएमडी 10% तक सीमित है, लेकिन टेंडर नोटिस की स्पष्ट शर्तें दोनों पक्षों पर बाध्यकारी थीं। जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने रेखांकित किया:
“रिजर्व प्राइस का 10% और उसके साथ शेष बिक्री प्रतिफल का एक हिस्सा जमा करना, अपने आप में 30 दिनों के भीतर या 12% ब्याज के साथ 90 दिनों के भीतर शेष राशि का भुगतान करने का एक वचन है। ऐसा करने में विफल रहने पर ज़ब्ती का परिणाम सामने आता है, जो कि स्वतः होता है।”
अंतिम समय में टाइटल डीड्स की मांग करने के अपीलकर्ता के रवैये पर अदालत ने कड़ी टिप्पणी की:
“पुराने विलेखों (टाइटल डीड्स) की मांग की गई थी, जो किसी भी स्थिति में इतने समय बाद स्वीकार्य नहीं थी, क्योंकि नीलामी नोटिस ‘जैसा है जहां है’ के आधार पर जारी किया गया था और इसमें स्पष्ट रूप से संपत्ति के एक हिस्से से संबंधित बिक्री विलेख की अनुपलब्धता का उल्लेख था। अपीलकर्ता ने बोली लगाने या ईएमडी जमा करने से पहले दस्तावेजों के सत्यापन की मांग नहीं की थी, इसलिए अब वह शेष बिक्री राशि के भुगतान से पीछे हटने के लिए इसे एक शर्त के रूप में पेश नहीं कर सकता। नियमों में ज़ब्ती के प्रावधान के अभाव का तर्क भी नीलामी नोटिस की विशिष्ट शर्त के सामने टिक नहीं पाता, जिसने शेष राशि जमा न करने पर ज़ब्ती को एक अनिवार्य परिणाम बना दिया था।”
अदालत ने एनसीएलटी द्वारा लागू किए गए “ट्रिपल टेस्ट” (जिसमें यह देखा जाता है कि क्या बोलीदाता की नीलामी में हेरफेर करने की गुप्त मंशा थी, क्या उसके पास वित्तीय क्षमता नहीं थी, या किसी बाहरी कारण से वह भुगतान नहीं कर सका) को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा:
“शेष बिक्री राशि का भुगतान न करने पर ज़ब्ती की चेतावनी देने वाली विशिष्ट शर्त को देखते हुए, बोली रद्द होने पर ज़ब्ती एक अनिवार्य परिणाम है। वर्तमान मामले के तथ्यों में अपीलकर्ता को ऐसी ज़ब्ती से राहत देने के लिए ‘ट्रिपल टेस्ट’ लागू नहीं होता। शेष बिक्री राशि का भुगतान न करना नीलामी प्रक्रिया में हेरफेर करने के समान था, जिसके चलते एक नई नीलामी करनी पड़ी और उस नीलामी में अधिक मूल्य प्राप्त हुआ।”
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाद की नीलामी में मिली अधिक कीमत संपत्ति के अंतर्निहित मूल्य के कारण थी, और डिफ़ॉल्ट करने वाला बोलीदाता इसे अपने नुकसान की भरपाई या सेट-ऑफ के रूप में दावा नहीं कर सकता। पीठ ने यह भी कहा कि वित्तीय क्षमता को केवल बार-बार पत्र लिखकर नहीं, बल्कि ठोस दस्तावेजों से साबित करना होता है। मैसर्स अग्रवाल ट्रेडिंग कंपनी के हस्तक्षेप को अदालत ने “महज एक बाद की सोच” करार दिया और माना कि इसे केवल नीलामी प्रक्रिया को बाधित करने और शेष भुगतान के दायित्व से बचने का बहाना बनाया गया था।
ज़ब्ती के दायरे पर अदालत ने ई-नीलामी नोटिस के क्लॉज III का उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट लिखा था कि शेष राशि का भुगतान न करने पर सफल बोलीदाता द्वारा जमा की गई पूरी राशि (ईएमडी सहित) जब्त की जा सकती है।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि अपीलकर्ता ने ज्ञात टेंडर शर्तों के तहत बिना किसी विरोध के स्वेच्छा से 6.39 करोड़ रुपये जमा किए थे:
“अपीलकर्ता ने स्वेच्छा से राशि का भुगतान किया था और ई-नीलामी नोटिस के नियमों एवं शर्तों में यह स्पष्ट प्रावधान था कि यदि सफल बोलीदाता बिक्री की शर्तों के अनुसार शेष बिक्री राशि का भुगतान करने में विफल रहता है, तो उसके द्वारा जमा की गई पूरी राशि, जिसमें ईएमडी भी शामिल है, जब्त की जा सकती है। ऐसे में रिफंड का आदेश देने का कोई कारण नहीं बनता। हमें विवादित आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नजर नहीं आता।”
इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और सभी लंबित आवेदनों को निरस्त कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मैसर्स एएसजे फिनसॉल्यूशन्स प्रा. लि. बनाम विक्रम बजाज
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 13023 / 2025
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 28 सितंबर 2026

