इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि एक ही साक्ष्य के आधार पर कुछ आरोपियों के बरी हो जाने से अन्य आरोपियों के खिलाफ पेश किए गए विश्वसनीय चश्मदीद गवाहों के बयान अपने आप खारिज नहीं हो जाते। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने 1984 के हत्या और जानलेवा हमले के एक मामले में जीवित बचे दोषी मान सिंह की दशकों पुरानी अपील खारिज करते हुए उसकी दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है। पीठ ने कहा कि ‘फाल्सस इन यूनो, फाल्सस इन ऑम्निबस’ (एक बात में झूठा तो सब में झूठा) का सिद्धांत भारत में साक्ष्य का कोई बाध्यकारी नियम नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी दोहराया कि मृतक के रिश्तेदारों या घायल चश्मदीदों की गवाही को केवल रिश्तेदारी या पुरानी रंजिश के आधार पर नकारा नहीं जा सकता।
पीठ की ओर से फैसला सुनाते हुए जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी ने माना कि जीवित अपीलकर्ता मान सिंह और सह-दोषी हरि राम (जिसकी अपील मृत्यु के बाद समाप्त हो चुकी है) ने एक राय होकर पूर्व-नियोजित तरीके से अपराध किया था। दोनों सरकारी हैंडपंप से पानी भरने को लेकर हुए विवाद के बाद अपने-अपने घरों से बंदूकें लेकर आए और पीड़ितों पर गोलियां चलाईं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 1 सितंबर 1984 की शाम करीब 5:00 बजे का है। घटना बरेली जिले के थाना आमला (आंवला) क्षेत्र के गिलौरी गांव की है। वादी चुन्नी लाल (पीडब्ल्यू-1) द्वारा दर्ज कराई गई जुबानी सूचना के अनुसार, उनका बेटा जगपाल और भतीजा ओंकार घर के पश्चिम में लगे सरकारी हैंडपंप पर पानी भरने गए थे। तभी गांव के ही हरि राम और मान सिंह वहां पहुंचे, उन्होंने बच्चों को डांट-डपटकर वहां से भगा दिया।
जब वादी के भाई नेम चंद, बेटे मोहन लाल और परिवार के सदस्य राम स्वरूप ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि हैंडपंप सरकारी संपत्ति है तो वे बच्चों को पानी लेने से क्यों रोक रहे हैं, तब दोनों पक्षों में विवाद हो गया। इसके बाद हरि राम और मान सिंह दौड़कर अपने घर गए और बंदूकें लेकर लौटे। आरोप के अनुसार, सह-आरोपी छदम्मी और नानकू के ललकारने पर हरि राम ने गोली चलाई, जो सीधे नेम चंद के मुंह और सीने में लगी, जिससे वह वहीं गिर पड़े और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। इसके तुरंत बाद मान सिंह ने दूसरी गोली चलाई, जिसके छर्रे राम स्वरूप के सीने और पेट में लगे।
वादी चुन्नी लाल की ओर से थाने में दी गई जुबानी सूचना पर उसी शाम 18:30 बजे थाना आमला में आईपीसी की धारा 302 और 307 के तहत एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस जांच के बाद चार आरोपियों के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दाखिल की गई।
8 जुलाई 1988 को नवें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, बरेली ने सह-आरोपी छदम्मी और नानकू को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने हरि राम को आईपीसी की धारा 302 (आजीवन कारावास) और धारा 307 सहपठित धारा 34 (सात वर्ष का कठोर कारावास) के तहत दोषी ठहराया। वहीं मान सिंह को धारा 302 सहपठित धारा 34 के तहत आजीवन कारावास और धारा 307 के तहत दोषी करार दिया। दोनों ने 1988 में हाईकोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान हरि राम की मृत्यु हो जाने पर 18 मई 2018 को उसके खिलाफ अपील समाप्त (एबेट) हो गई, जिसके बाद मान सिंह ही इस मामले में एकमात्र जीवित अपीलकर्ता बचा था।
पक्षों की दलीलें
जीवित अपीलकर्ता की ओर से नियुक्त एमिकस क्यूरी सुश्री मंजू वर्मा ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने गंभीर गलती की है, क्योंकि जिस साक्ष्य के आधार पर छदम्मी और नानकू को बरी किया गया, उसी साक्ष्य के आधार पर हरि राम और मान सिंह को दोषी ठहरा दिया गया। उन्होंने दलील दी कि एक ही साक्ष्य पर कुछ को बरी करने और दूसरों को सजा देने का कोई कानूनी औचित्य नहीं है।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष के तीनों चश्मदीद गवाह—वादी चुन्नी लाल (पीडब्ल्यू-1), घायल राम स्वरूप (पीडब्ल्यू-2) और मोहन लाल (पीडब्ल्यू-3)—मृतक के करीबी रिश्तेदार हैं। किसी स्वतंत्र गवाह के न होने से उनकी गवाही पक्षपातपूर्ण और अविश्वसनीय हो जाती है। इसके अलावा गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास होने का हवाला देते हुए दोषसिद्धि रद्द करने की मांग की गई।
इसके विपरीत, राज्य की ओर से पेश अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) ठाकुर आजाद सिंह ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि यह घटना दिनदहाड़े हुई थी और चश्मदीदों ने इसे अपनी आंखों से देखा था। उन्होंने जोर देकर कहा कि राम स्वरूप एक घायल चश्मदीद गवाह हैं, जिन्हें गोली लगी थी। स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि घायल गवाह की गवाही का विशेष महत्व होता है और इसे आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता।
एजीए ने यह भी कहा कि मौखिक साक्ष्यों की पुष्टि पोस्टमार्टम करने वाले डॉ. बलबीर सिंह (पीडब्ल्यू-4) और घायल का इलाज करने वाले डॉ. सी.पी. सिंघल (पीडब्ल्यू-5) की मेडिकल रिपोर्ट से पूरी तरह होती है। उन्होंने कहा कि केवल रिश्तेदार होना गवाही को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता और एक ही साक्ष्य पर कुछ का बरी होना दूसरों की दोषसिद्धि में बाधा नहीं बनता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
मामले के रिकॉर्ड का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि घटना के महज डेढ़ घंटे के भीतर बिना किसी देरी के एफआईआर दर्ज करा दी गई थी, जो अभियोजन की स्वाभाविक कहानी को दर्शाती है।
1. घायल चश्मदीद और रिश्तेदार गवाहों की विश्वसनीयता
रिश्तेदार और कथित तौर पर ‘इच्छुक’ (इंटरेस्टेड) गवाहों के तर्क पर पीठ ने स्पष्ट किया कि मृतक से करीबी रिश्ता होना किसी गवाह को अयोग्य नहीं बनाता। सुप्रीम कोर्ट के फैसले स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम श्रीमती कल्की एवं अन्य (1981) का उल्लेख करते हुए अदालत ने रेखांकित किया:
“रिश्तेदार होना ‘हितबद्ध’ (इंटरेस्टेड) होने के बराबर नहीं है। किसी गवाह को केवल तभी ‘हितबद्ध’ कहा जा सकता है जब उसे मुकदमे के परिणाम से कोई लाभ प्राप्त होता हो; जैसे सिविल मामले में डिक्री हासिल करना, या किसी आरोपी को सजा दिलवाने में व्यक्तिगत स्वार्थ होना। एक गवाह जो स्वाभाविक है और मामले की परिस्थितियों में अकेला संभावित चश्मदीद है, उसे ‘हितबद्ध’ नहीं कहा जा सकता।”
पीठ ने सुच्चा सिंह एवं अन्य बनाम स्टेट ऑफ पंजाब (2003) और ततीरेड्डीगारी महेश्वरा रेड्डी बनाम स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश (2024) के फैसलों का भी हवाला दिया और कहा कि रिश्तेदारी गवाह की विश्वसनीयता को प्रभावित नहीं करती, क्योंकि कोई भी रिश्तेदार असली अपराधी को छोड़कर किसी बेकसूर को झूठा नहीं फंसाएगा।
घायल गवाह राम स्वरूप (पीडब्ल्यू-2) की गवाही के संदर्भ में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय सुरेश सीताराम सुर्वे बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र (2002) पर भरोसा जताते हुए टिप्पणी की:
“घायल चश्मदीदों की गवाही को आरोपियों के प्रति शत्रुतापूर्ण भावना या वास्तविक हमले के विवरण सुनाने की असंभाव्यता के आधार पर पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता। यह सच है कि उनके साक्ष्य की सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए, जिसमें पुरानी रंजिश और बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने तथा अधिक से अधिक लोगों को फंसाने की प्रवृत्ति को ध्यान में रखा जाना चाहिए।”
पीठ ने पाया कि डॉक्टर की रिपोर्ट के अनुसार राम स्वरूप के सीने पर गोली के दो घाव पाए गए थे, जो घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी और आरोपी द्वारा जान से मारने की नीयत को पूरी तरह साबित करते हैं।
2. सामान्य आशय और पूर्व-नियोजन
घटनाक्रम का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों आरोपियों का कृत्य आईपीसी की धारा 34 के तहत सामान्य आशय को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है:
“मृतक अपीलकर्ता हरि राम और जीवित अपीलकर्ता मान सिंह का उपरोक्त कृत्य इस तथ्य का स्पष्ट संकेत है कि वे दोनों अपने-अपने घर गए और हाथों में बंदूकें लेकर अपराध करने तथा मृतक नेम चंद व राम स्वरूप (पीडब्ल्यू-2) पर गोलियां चलाकर उनकी जान लेने के लिए पूर्व-नियोजित तरीके से और पहले से बनी सहमति (मीटिंग ऑफ माइंड्स) के साथ घटनास्थल पर लौटे थे।”
अदालत ने कहा कि मृतक नेम चंद के शरीर पर सीने से लेकर सिर तक गोली के छह घाव पाए गए थे, जबकि राम स्वरूप को दो गोलियां लगी थीं। यह स्पष्ट करता है कि दोनों ने मिलकर जानलेवा हमला किया था।
3. ‘फाल्सस इन यूनो, फाल्सस इन ऑम्निबस’ सिद्धांत की स्थिति
बचाव पक्ष के इस तर्क पर कि सह-आरोपी छदम्मी और नानकू के बरी होने के कारण मान सिंह को भी बरी किया जाना चाहिए, हाईकोर्ट ने इस कानूनी सिद्धांत की पड़ताल की।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले निसार अली बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश (1957), जिसे बाद में मेनोका मलिक एवं अन्य बनाम स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल एवं अन्य (2019) और इलांगोवन बनाम स्टेट ऑफ तमिलनाडु (2020) में दोहराया गया, का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:
“इस सिद्धांत को भारत के विभिन्न क्षेत्राधिकारों में सामान्य स्वीकृति नहीं मिली है; और न ही यह सिद्धांत कानून के नियम का दर्जा प्राप्त कर सका है। यह केवल सावधानी का एक नियम है। इसका कुल अर्थ यह है कि ऐसे मामलों में गवाही को नजरअंदाज किया जा सकता है, न कि उसे नजरअंदाज किया ही जाना चाहिए… यह सिद्धांत केवल साक्ष्य के महत्व (वेट ऑफ एविडेंस) का सवाल है जिसे कोई अदालत दी गई परिस्थितियों में लागू कर सकती है, लेकिन यह कोई ‘साक्ष्य का अनिवार्य नियम’ नहीं है।”
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने छदम्मी और नानकू की मौजूदगी और ललकारने की भूमिका को संदिग्ध पाया था, जबकि हरि राम और मान सिंह के खिलाफ साक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट, सुसंगत और मेडिकल रिपोर्ट से समर्थित हैं। इसलिए अन्य आरोपियों के बरी होने का लाभ मान सिंह को नहीं मिल सकता।
हाईकोर्ट का निर्णय
ट्रायल कोर्ट के फैसले में किसी भी प्रकार की अवैधता या त्रुटि न पाते हुए हाईकोर्ट ने जीवित अपीलकर्ता मान सिंह की आपराधिक अपील खारिज कर दी और 8 जुलाई 1988 के दोषसिद्धि व सजा के आदेश को सही ठहराया।
अदालत ने मान सिंह के व्यक्तिगत मुचलके निरस्त कर दिए, जमानतियों को दायित्वमुक्त कर दिया और उसे बाकी बची सजा काटने के लिए आदेश की प्रति मिलने के एक महीने के भीतर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम), बरेली के समक्ष आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने का निर्देश दिया। पीठ ने सीजेएम, बरेली को यह भी आदेश दिया कि यदि दोषी तय समय सीमा के भीतर सरेंडर नहीं करता है, तो उसे गिरफ्तार कर जेल भेजने के लिए तत्काल गैर-जमानती वारंट (एनबीडब्ल्यू) जारी किए जाएं। इसके साथ ही, अदालत ने पुराने मामले में सहयोग के लिए एमिकस क्यूरी सुश्री मंजू वर्मा को 15,000 रुपये का मानदेय देने का भी निर्देश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: हरि राम और अन्य बनाम राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1638 / 1988
पीठ: जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी
निर्णय की तिथि: 28 सितंबर 2026

