तीन महीने में झारखंड मानवाधिकार आयोग को पूरी तरह सक्रिय करें: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि झारखंड राज्य मानवाधिकार आयोग (JSHRC) के चेयरपर्सन और सदस्यों के खाली पद तीन महीने के भीतर भरे जाएं और आयोग को इस अवधि में पूरी तरह कार्यशील बनाया जाए।

चीफ जस्टिस एम एस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की बेंच ने कहा कि आयोग करीब चार वर्षों से प्रमुख पदों पर नियुक्तियां नहीं होने के कारण प्रभावी रूप से काम नहीं कर पा रहा है। कोर्ट ने माना कि लंबे समय से रिक्तियां बने रहना मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के वैधानिक प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप नहीं है।

हाईकोर्ट ने आदेश के पालन की व्यक्तिगत जिम्मेदारी झारखंड के मुख्य सचिव पर भी तय की है।

2022 से आयोग ठप

यह आदेश दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया गया। याचिकाओं में JSHRC के चेयरपर्सन और सदस्यों की नियुक्ति के साथ-साथ सहयोगी कर्मचारियों के खाली पद भरने की मांग की गई थी।

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याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट शशांक शेखर और शैलेश पोद्दार ने कोर्ट को बताया कि आयोग के चेयरपर्सन रहे जस्टिस आर आर प्रसाद का 3 जून 2018 को निधन हो गया था।

इसके बाद आयोग के सदस्य और IAS अधिकारी एस के सतपथी को चेयरपर्सन का प्रभार दिया गया। यह व्यवस्था 2022 तक जारी रही। इसके बाद से न तो चेयरपर्सन की नियुक्ति हुई और न ही सदस्यों की, जिसके कारण आयोग का कामकाज ठप हो गया।

कोर्ट ने कहा कि 2022 के बाद रिक्त पद नहीं भरे जाने से JSHRC का काम पूरी तरह रुक गया, जबकि आयोग को लेकर वैधानिक व्यवस्था और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पहले से मौजूद हैं।

राज्य ने कहा, नियुक्ति प्रक्रिया जारी

राज्य सरकार की ओर से सीनियर स्टैंडिंग काउंसिल मनीष कुमार ने कोर्ट को बताया कि नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है और मामला फिलहाल मुख्यमंत्री के समक्ष है।

सरकार ने बताया कि मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 22 के तहत चेयरपर्सन और सदस्यों की नियुक्ति की सिफारिश एक समिति करती है। इसमें मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, गृह विभाग के प्रभारी मंत्री और नेता प्रतिपक्ष शामिल होते हैं।

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हालांकि, बेंच ने कहा कि वह राज्य सरकार से कई बार स्पष्ट समयसीमा बताने को कह चुकी है, लेकिन सरकार लगातार यही कहती रही कि मामला उच्चतम स्तर पर विचाराधीन है। इसके बावजूद कोई निश्चित समयसीमा नहीं दी गई।

कोर्ट ने कहा कि इससे यह प्रतीत होता है कि राज्य सरकार अधिनियम की धारा 21 के तहत राज्य मानवाधिकार आयोग गठित करने की वैधानिक जिम्मेदारी को लेकर गंभीर नहीं है।

मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों का भी जिक्र

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि राज्य में आयोग की जरूरत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बेंच ने कहा कि झारखंड में कथित मानवाधिकार उल्लंघन के मामले सामने आए हैं, जिनमें हिरासत में मौत जैसी घटनाएं भी शामिल हैं।

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ऐसी स्थिति में राज्य यह नहीं कह सकता कि मानवाधिकार आयोग की आवश्यकता नहीं है।

मुख्य सचिव पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सभी रिक्त पद जल्द से जल्द और अधिकतम तीन महीने के भीतर भरने का निर्देश दिया।

साथ ही सरकार से कहा गया कि इसी अवधि में सभी जरूरी कदम उठाकर JSHRC को पूरी तरह कार्यशील बनाया जाए।

बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि मामला उच्चतम स्तर पर विचाराधीन होने या नियुक्ति समिति के सदस्यों की अनुपलब्धता जैसी दलीलों को आगे देरी के आधार के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

मुख्य सचिव को 8 जनवरी 2027 तक आदेश के अनुपालन का हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।

दोनों जनहित याचिकाओं को 15 जनवरी 2027 को अनुपालन रिपोर्ट पर विचार के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

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